प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अगर शांति के लिए कोई कर्तव्य या वादा तोड़ना पड़े, तो उससे क्या कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता?
आचार्य प्रशांत: शांति के लिए वादे रखने भी पड़ सकते हैं।
प्र: जैसे मैं भीष्म की बात कर रहा हूँ।
आचार्य: हाँ, ठीक है। शांति इतनी ऊँची चीज़ है कि उसके सामने कोई नियम नहीं बनाया जा सकता, ये नियम भी नहीं बनाया जा सकता कि नियम तोड़ने हैं। शांति के लिए अगर नियमों का पालन करना पड़े तो? पालन भी कर लेंगे। तोड़ना पड़े तो? तोड़ भी देंगे। आख़िरी बात सिर्फ़ एक है। क्या? शांत रहे या नहीं रहे।
तुमने बहुत कुछ अच्छा-अच्छा किया, ठीक-ठीक किया, पर जो कुछ भी कर रहे थे, वो करने के दौरान भी, वो करने से पहले भी, वो करने के बाद भी रह गए उछलते-कूदते, चंचल और विकल ही, तो जो कुछ भी किया…?
प्र: सब बेकार।
आचार्य: सब बेकार।
प्र: परिणाम के लिए नहीं कर रहा।


