प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। आप कहते हैं कि जीवन सुधारो। जो अभी है जीवन में, मैं उसे छोड़ना चाहती हूँ, जैसे अहंकार, क्रोध इत्यादि। ये सब तो छूट ही नहीं रहा है। जब समझ में आता है कि अहंकार है, तो भी क्रोध आ जाता है किसी बात पर। जब समझ आता है कि क्रोध है, तो ख़ुद पर और आता है कि मुझे क्रोध क्यों आ रहा है।
मन चलता रहता है, वृत्तियाँ आती रहती हैं। ये सब होता तो थोड़ी देर के लिए ही है, पर फिर भी होता है, इनसे नहीं बचा जाता। फिर जीवन कैसे सुधरेगा? कृपया समझाएँ।
आचार्य प्रशांत: जैसे कि पुराने कैंसर (कर्क रोग) का कोई रोगी आए, चार दिन गोली खाए और कहे कि, “क्या मेरी व्याधि जड़-मूल से मिट गयी है?”
अभी शायद तुम्हें एहसास ही नहीं है कि हमारी वृत्तियाँ कितनी गहरी होती हैं और हम कितने पानी में हैं; अरे! पानी तो साफ़ होता है, हम किस दलदल में धँसे हुए हैं, इसीलिए बहुत त्वरित परिणामों की अपेक्षा कर रही हो, और परिणाम नहीं मिल रहे हैं तो शिकायत उठ रही है।
इंसान पैदा हुई हो न? इंसान मुक्ति के लिए नहीं पैदा होता। इंसान दुःख-दर्द, तड़पने के लिए पैदा होता है। मुक्ति तो एक असंभावना होती है; मुक्ति तो एक विरल घटना होती है। नहीं तो भाग्य में तो यही बँधा होता है कि जैसे सब कीड़े-मकौड़े, पशु-पक्षी और दुनिया भर के इंसान हैं—आते हैं, खाते हैं, गंदगी फैलाते हैं, अपने ही जैसी बंधक संतानें पैदा करते हैं और मर जाते हैं—वैसे ही तुम्हारा और सबका भी जीवन बीते। यही होना चाहिए।
लेकिन कभी-कभार, अनायास, अकारण ऐसी घटना घट जाती है कि कोई जीवनमुक्त हो जाता है, कोई विदेहमुक्त हो जाता है। वो इतनी सरल और साधारण बात नहीं है कि तुम दो-चार दिन प्रयास करो और जब अपने प्रयासों में अपेक्षित सफलता ना पाओ तो शिकायत करने लग जाओ। मुक्ति बहुत बड़ी माँग है। और अगर मेरी बात पर यक़ीन ना हो रहा हो तो अपने चारों तरफ़ देख लो और गिन लो कि कितने मुक्तपुरुष दिखाई दे रहे हैं। जब मुक्तपुरुष नहीं दिखाई देते, तो जान लो कि मुक्ति बड़ी मुश्किल ही चीज़ होगी।

