
प्रसंग:
भारत या इंडिया? इंडिया से नाम बदलकर भारत रखना चाहिए क्या? क्या इंडिया नाम विदेशियों ने दिया है? क्या है इंडिया और भारत का इतिहास? क्या देश का नाम बदलना आवश्यक है? कॉलोनाइजेशन और डी-कॉलोनाइजेशन क्या हैं? क्यों कहा जाता है कि भारत का कॉलोनाइजेशन हुआ है? भारत को…

◾ एक ही जाति होती है - वह है "बल"। बल विकसित करो अपने भीतर।
◾ आत्मा का इस पूरे देह व्यापार से कोई लेना देना ही नहीं।



आचार्य प्रशांत: प्रश्न है कि “क्यों नहीं मिल सकते भारत को अच्छे नेता?”
यहाँ ‘नेता’ लिखा है, मैं समझता हूँ कि राजनैतिक क्षेत्र की बात की जा रही है, तो राजनेताओं की ही बात की जा रही होगी; क्योंकि नेतृत्व तो वरना किसी भी क्षेत्र में हो सकता है, पर…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमस्ते। आचार्य जी, एक परिचित हैं मेरे, उनसे कुछ चर्चा हो रही थी तो उस चर्चा के दौरान एक बात सामने आयी, तो उन्होंने कहा कि ये सवाल आचार्य जी से अगर पूछ सकते हैं तो सामने रखिएगा। चर्चा वो इस बात पर थी कि वो कह…

प्रश्नकर्ता: पश्चिम के पास तो ना अध्यात्म था, ना वेदांत, फिर भी पश्चिम ने इतनी तरक़्क़ी कैसे कर ली? आप बार-बार अध्यात्म, वेदांत पर इतना ज़ोर डालते हैं, पश्चिम इनके बिना ही आगे कैसे बढ़ गया?
आचार्य प्रशांत: पश्चिम आधा आध्यात्मिक हो कर के ही आगे बढ़ा है। अध्यात्म का…

प्रश्नकर्ता: फ्रांस की पत्रिका है चार्ली हेबडो। व्यंग्य संबंधित ही इनकी ज़्यादातर समाग्री रहती है। अतीत में भी ये पत्रिका काफी चर्चा और विवाद में रही है। अभी हाल में ही, कल-परसों ही इन्होंने एक कार्टून छापा है जिसमें भारतीयों को ऑक्सिजन के अभाव में तड़पते और दम तोड़ते हुए…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, हिंदी से ही मेरा प्रश्न है। हिंदी की जो दुर्दशा इस देश में हो रही है कहीं-न-कहीं मुझे लगता है कि इसके जो ज़िम्मेवार हैं वो विद्यालय भी हैं या विद्यालय ही हैं। एक हिंदी के विषय को छोड़कर बाकी सभी विषय, पाठ्यक्रम इंग्लिश भाषा में…

प्रश्नकर्ता: रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ऐसे तमाम उदाहरण मिलते रहते हैं जो साबित करते हैं कि छल, कपट, बेईमानी के साथ भी सुख से जिया जा सकता है। मैं पड़ोसी देश पाकिस्तान को देखती हूँ तो पाती हूँ कि उसने हमेशा ही छल, कपट, बेईमानी, झूठ का सहारा लिया है…

प्रश्नकर्ता आचार्य जी, आप हमेशा निगेटिव बात करते हैं। अभी आपने अपने 'बचपन का प्यार' वाले वीडियो में कहा कि "इन्डिया का यूथ (जवान पीढ़ी) फ़ालतू टिक-टॉक और रील्स बनाने में बिज़ी (व्यस्त) है, इसलिए इंडिया के ओलम्पिक मेडल्स नहीं आते" पर देख लीजिए कल ही नीरज चोपड़ा ने गोल्ड…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, हम भारतवासी अपनी संस्कृति और विरासत को लेकर गौरव क्यों नहीं अनुभव करते? खासकर युवा पीढ़ी में तो गौरव छोड़िए बल्कि अपनी संस्कृति और अतीत को लेकर थोड़े अपमान का भाव है।
आचार्य प्रशांत: आप पूछ रहे हैं भारतवासी अपनी संस्कृति को और अपनी विरासत को…

प्रश्नकर्ता: मैं मूलतः बिहार से हूँ, पर पिछले पंद्रह वर्ष से दिल्ली में हूँ। मेरे छोटे बेटे ने अपनी अधिकांश शिक्षा दिल्ली से ली है, और अब वो दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ रहा है। हमारे पिताजी सेना में थे, युद्ध भी लड़े थे, और हमारे घर में फ़ौज और सेना…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा प्रश्न और मेरी समस्या यह है कि पहले जितना डर था मेरे अंदर, पहले से कम हो गया है लेकिन अब थोड़ा अलग तरीके का डर बना रहता है। डर ये रहता है कि- मतलब मैं संस्था में रहना चाहता हूँ और साधना के पथ पर…

हिंदी की क्या औकात? अपमानित भाषा! तो भौतिक कारण समझ में आ रहा है? नल की टोटी ठीक करने की शिक्षा भी अंग्रेजी में हीं मिलेगी। डॉक्टर तो डॉक्टर तुम कंपाउंडर भी अंग्रेजी में ही बन सकते हो और यदि बहुत हठ दिखाओगे तो 'भाषायी-आतंकी' कहलाओगे। "देखो इनको! ये भाषा…

प्रश्नकर्त्ता: आचार्य जी, भारत अब कोरोना महामारी से संक्रमित लोगों की संख्या में चौथे स्थान पर आ चुका है। अमेरिका लंबे समय से सबसे ऊपर, पहले स्थान पर है ही। भारत और अमेरिका दोनों ही जनतंत्र की मिसाल माने जाते हैं। अमेरिका सबसे शक्तिशाली जनतंत्र, और भारत सबसे बड़ा जनतंत्र।…

ऋषियों की विरासत को,
क्रांतिकारियों की शहादत को,
आज कौन कमज़ोर कर रहा मेरे देश की युवा ताक़त को?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम एक छोटे गाँव से बारहवीं करे। अब दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदु कॉलेज में दाखिला पाए। एक साल हो गया है, अच्छा नहीं लग रहा है कुछ। पढ़ाई छूट गई है। यहाँ सुंदर लड़की और अमीर लड़का का ही चलता है। हम सुंदर और अमीर दोनों नहीं…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नमस्ते। इतिहास है कि ईस्ट इंडिया कंपनी के कारण हमने बहुत ग़ुलामी झेली। आज अनेकों विदेशी कंपनियाँ हैं बाज़ार में, क्या वो भी ग़ुलाम बना रही हैं हमें? आर्थिक पक्ष तो एक तरफ़ है, मैं आपसे समझना चाहता हूँ कि इन कंपनियों का हम पर मानसिक और…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, लोग संस्कृत का मज़ाक उड़ाते हैं, बड़ा दुःख होता है। हाल में भी कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर संस्कृत का अपमान किया।
आचार्य प्रशांत: मैं बहुत सारी बातें बोल सकता हूँ संस्कृत के पक्ष में और वो बातें पारंपरिक तौर से बोली भी गई हैं; कोई…

दिनांक ५ अक्टूबर’ १९ की शाम, विश्रांति शिविर, मुंबई के प्रतिभागियों द्वारा आचार्य जी का हर्ष व उल्लास के साथ स्वागत किया गया। फूलों से सुसज्जित सत्संग भवन में आचार्य जी का स्वागत प्रतिभागियों ने गुरु वंदना का एक स्वर में जाप करके किया।
आगमन के उपरांत आचार्य जी का…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, संस्कृत भाषा का महत्व क्या है?
आचार्य प्रशांत: आध्यात्मिक साहित्य सारा संस्कृत में है। अंग्रेज़ी व्यापार की भाषा है। और भाषा सिर्फ़ भाषा नहीं होती, भाषा एक पूरा संस्कार होती है। अगर किसी के मन पर अंग्रेज़ी छा गई है तो उसका मन व्यापारी हो जाएगा, गणित…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, इस देश में हज़ारों सालों से अध्यात्म की परम्परा रही है, फिर भी हज़ारों सालों से यह देश लगातार अनेक क्षुद्र चुनौतियों और विषमताओं से जूझता रहा है, क्या कारण है?
आचार्य प्रशांत: आप में से कौन-कौन लोग अपने घर की नियमित रूप से सफ़ाई करते हैं?…

स्वयंसेवी: अनिल ठाकुरी और अनिकेत तमराकर से दो अलग-अलग प्रश्न हैं, जिनको संयुक्त कर दिया गया है। कह रहे हैं कि हाल में आपका वीडियो सुना, शीर्षक था: "वेदान्त के ज्ञान से, सेना के सम्मान तक"। मेरे मन में कई प्रश्न उठ रहे हैं। पहला, देशों की और जमीन के…

प्रश्न: नमस्कार, राष्ट्रवाद के बारे में आपका क्या कहना है?
आचार्य प्रशांत: शब्द एक है, राष्ट्रवाद, पर मोटे तौर पर इसके अर्थ दो हैं। दोनों को अलग-अलग समझना पड़ेगा।
इंसान के पास हमेशा दो रास्ते होते हैं न, वैसे ही समझ लो बहुत सारे शब्द हैं जिनके उन्हीं दो रास्तों

प्रश्नकर्ता: प्रिय आचार्य जी, प्रणाम। भारत के अधिकतर विद्यालयों ने अंग्रेज़ी को शिक्षा का माध्यम बना लिया है। लोगों में भी यह भावना बैठ गयी है कि उनकी क्षेत्रीय भाषा को हीन माना जाता है, और यह मान्यता है कि उच्चतम शिक्षा अंग्रेज़ी माध्यम में ही दी जा सकती है।…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, भारत अध्यात्म की राजधानी है और वहाँ इतने सारे आध्यात्मिक गुरु हैं। फिर भी भारत में इतनी परेशानियाँ क्यों हैं?
आचार्य प्रशांत: दो-तीन बातें हैं। पहली बात तो अध्यात्म संख्या का खेल नहीं है कि सौ या पाँच-सौ गुरु हो गए तो ज़्यादा संतोषजनक स्थिति हो जाएगी।…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम।
हम लोगों का देश के प्रति जो लगाव होता है, जो प्रेम होता है, और जैसा कि हम सब कहते भी हैं कि हमारा देश महान है, मुझे अपने देश के लिए ये करना है, वो करना है—सर्वप्रथम, आख़िर यह देश है क्या?
क्या हमारा देश,

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा सवाल ब्यूरोक्रेसी (नौकरशाही) से है। हमारे ऊपर जो अधिकारी हैं, क्या उन्हें जागरूक नहीं होना चाहिए? हम लोग भी सोचते हैं कि अगर हमारा बॉस थोड़ा जागरूक होता, तो वो और अच्छे निर्णय ले सकते था।
आचार्य प्रशांत: ऐसा आप सोचती हैं अपने बॉस के बारे…

प्रश्नकर्ता: मैं बचपन से ही देशभक्ति के माहौल में पला-बढ़ा हूँ, और ख़ुद भी देशभक्त हूँ। पर साथ-ही-साथ मेरे मन में विदेश जाने की भी इच्छा रहती थी। मैंने स्वयं को बहुत समझाया और ये विचार अपने मन से निकाल दिया। मैं वेस्टर्न क्लासिकल म्यूज़िक (पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत) का बहुत…

प्रश्न: आचार्य जी प्रणाम। हाल ही में एक घटनाक्रम हुआ, जिसमें भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा चंद्रयान-२ प्रक्षेपित किया गया। पूरे विश्व की उसपर नज़रें थीं। यह भारतीय वैज्ञानिकों की ओर से एक बहुत बड़ा कदम था। बिलकुल अंतिम क्षणों में भारतीय वैज्ञानिक इस पूरे मिशन में थोड़ी सी…

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ग्रेटर नोएडा। जीबीयू में आयोजित एक कार्यक्रम में पहुंचे आचार्य प्रशांत ने कहा कि महाशिवरात्रि केवल अनुष्ठान का पर्व नहीं, बल्कि यह मनुष्य को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने कहा कि शिव को केवल मूर्ति या रूप में सीमित कर देना उनकी व्यापकता को संकुचित करना…


इन सब से मुक्ति का एक ही तरीका है, वो बचो ही नहीं जो मूर्ख जाकर के दुनिया से, जगत से, प्रकृति से कामना पूर्ति की आशा रखता था, वो बचो ही नहीं। उसके अलावा और तुम कितने भी हथकंडे लगा लो, अतीत तो लौट-लौट के बार-बार आएगा और सर पर चढ़ेगा ही चढ़ेगा।

◾ आत्मा का विकृत सिद्धांत ही भारत की दुर्दशा…
भारतीयों को शायद यह लगता है कि हिंदुस्तान से बाहर जहाँ कहीं कोई मिलेगा वह ‘अंग्रेज़ी’ ही बोल रहा होगा। एक तो यह बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है – बाहर जैसे ही हम निकलेंगे वैसे ही जो मिल रहा होगा अंग्रेज़ी ही बोल रहा होगा। हिंदुस्तान बेचारा बस पिछड़ा हुआ है,…
The UGC regulations are only a spark. The explosive material is something far more intimate: the unexamined conviction, lodged in the deepest chamber of the collective psyche, that birth determines worth and that this determination carries divine sanction. The atmosphere itself is the disease; the regulation is at best a painkiller. India’s foundational scriptures contain the strongest possible arguments against caste. The Upanishadic view begins where hierarchy ends.
अध्यात्म की रोशनी जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ती है, तो राजनीति पर भी पड़ेगी ही पड़ेगी। ऐसा कुछ नहीं है कि आध्यात्मिक आदमी राजनीति के प्रति अंधा हो जाता है। बल्कि हक़ीक़त तो यह है कि राजनीति को आध्यात्मिक लोगों की बहुत सख़्त ज़रूरत है, क्योंकि राजनेता ताक़त की ऐसी गद्दियों पर बैठते हैं, जहाँ से वो आपके जीवन को बहुत तरीके से प्रभावित करते हैं। राजनेता अगर आध्यात्मिक नहीं है, तो देश रसातल में जाएगा। राजनीति त्यागनी नहीं है, सही राजनीति करनी है।https://acharyaprashant.org/en/articles/raajneeti-mein-adhyatm-kyon-zaroori-1_795988a15



पृथ्वी को बचाने के लिए यूनाइटेड नेशंस की सीओपी ने यह शर्त रखी थी कि 2030 तक वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री से अधिक नहीं बढ़ना चाहिए। हमने वह सीमा 2025 में ही लांघ दी है। यह आने वाले बहुत-बहुत बड़े विनाश का संकेत है। आदमी के इतिहास में इससे ख़तरनाक पल कभी नहीं आया। उस ख़तरे को चुनौती देने के लिए ही यह "ऑपरेशन 2030" है, जिसका उद्देश्य है कि आम आदमी में चेतना जगाई जाए — “देखो, तुम्हारा ग्रह विनाश की ओर कितनी तेज़ी से बढ़ रहा है। तुम अपने बच्चों के लिए एक ऐसा ग्रह छोड़कर जा रहे हो, जहाँ आफ़तें ही आफ़तें होंगी।”


अब देखिएगा, क्या हो रहा है। कोई कृतज्ञ कब अनुभव करेगा? जब पहले उसकी हालत ख़राब हो और कोई बचाए। आपके भीतर अभी यह इच्छा शेष है कि आप कृतज्ञ अनुभव करती रहें और कृतज्ञता अनुभव करने के लिए ज़रूरी है कि कुछ गड़बड़ हो और फिर उस गड़बड़ से आप उबार ली जाएँ। तो फिर आप कृतज्ञ अनुभव करेंगी कि, अरे, मेरा सौभाग्य कि मुझे किसी ने बचा लिया।

“माँसाहार गरीबों के लिए वरदान है क्योंकि माँसाहार के माध्यम से गरीबों को सस्ता प्रोटीन मिल जाता है।“ १ ग्राम प्रोटीन अगर आप मटन से लेते हैं तो लगते हैं ३ रुपये। उतना ही प्रोटीन, १ ग्राम, अगर आप अंडे से लेते हैं तो लगते हैं १ रुपय ३० पैसे, उतना ही प्रोटीन, १ ग्राम, अगर आप चिकन से लेते हैं तो लगता हैं १ रुपया।

प्रश्नकर्ता: कृष्ण अध्याय नौ में बताते हैं कि वे सब भूतों में समभाव से व्यक्त हैं, वहीं अध्याय दस में बताते हैं कि जो कुछ भी विभूतियुक्त, कांतियुक्त और शक्ति युक्त है, वो कृष्ण की अभिव्यक्ति है। अध्याय नौ में कृष्ण कहते हैं कि ऋग्वेद, सामवेद, अथर्ववेद मैं ही हूँ…

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने:।।
जो सब जीवों के लिए रात्रि है, वह आत्मसंयमी के जागने का समय है और जो समस्त जीवों के जागने का समय है, वह आत्मनिरीक्षक मुनि के लिए रात्रि है।
—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ६९
प्रश्नकर्ता: जब…

प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल फिर से मृत्यु के ऊपर ही है। आम ज़िन्दगी में जीवन के बारे में बोला जाता है कि जीवन आनन्द है या जीवन यह है, पर इसमें मृत्यु की कोई बात नहीं आती। जैसे आध्यात्मिकता में भी आप देखें तो लोगों ने मृत्यु पर ज़्यादा चर्चा नहीं…

श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय: | ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति || ४, ३९ || जितेन्द्रिय, साधनापरायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप शान्ति को प्राप्त हो जाता है। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक ३९प्रश्नकर्ता: आचार्य जी,…

प्रश्नकर्ता: पिछली बार चंडीगढ़ तरफ़ से आया था जी,। आप से जुड़ा था। तबजब मैं अकेला आया था, बिलकुल हताश, परेशान था। आज मेरीमेरे साथ श्रीमती जी भी आईं हैं। मेरा प्रश्न यह है जी, जैसे संतों ने कहा है—
प्रेम-गली अति सांकरी, तामे दो न समाहिं। जब मैं था…