क्या भारत अपने सिद्धांतों के कारण पड़ोसी देशों से पिछड़ गया? || (2020)

प्रश्नकर्ता: रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ऐसे तमाम उदाहरण मिलते रहते हैं जो साबित करते हैं कि छल, कपट, बेईमानी के साथ भी सुख से जिया जा सकता है। मैं पड़ोसी देश पाकिस्तान को देखती हूँ तो पाती हूँ कि उसने हमेशा ही छल, कपट, बेईमानी, झूठ का सहारा लिया है और निश्चिन्त रहा है। और दूसरी ओर भारत है, भारत ने सत्य-पथ पर चलना चाहा है और दुःख झेला है। अहिंसा का रवैया रखा और हार और चोट खाई तो फिर मैं कैसे प्रेरित रहूँ कि ईमानदारी से जिऊँ?
आचार्य प्रशांत: दो-तीन बातें समझनी पड़ेंगी। सच का रास्ता आसान होता नहीं क्योंकि उसमें जाना पड़ता है अपने ही ख़िलाफ़ और झूठ और छल का रास्ता हमेशा आकर्षक लगता है क्योंकि प्रतीत ये होता है कि उस पर आसानी से सुख-सफलता वगैरह मिल जाएँगे। तो हमारे भीतर की पुरानी, आदिम, अँधेरी वृत्तियाँ लगातार खिंचती रहती हैं झूठ की ओर। लेकिन हम मान कैसे लें कि झूठ की ओर हमें बड़ा झुकाव हो रहा है, झूठ बड़ा लुभावना लग रहा है, तो फिर हम झूठ के पक्ष में कुछ तर्क गढ़ते हैं।
इसी तरीके से सच कितना भी कीमती क्यों न हो लेकिन उसकी तरफ जाना क़ुर्बानी माँगता है, साधना-श्रम माँगता है। तो भले ही हमको बौद्धिक रूप से, चैतन्य रूप से पता हो कि सच्चाई की ओर जाना ही ठीक है लेकिन फिर भी भीतर से हमारी वृत्तियाँ और मन की गहरी अँधेरी परतें कुलबुलाती हैं कि इतनी मेहनत कौन करे, कौन सच की तरफ जाए। पर सच तो सच है, उसको झुठलाएँ कैसे या उसको अस्वीकृत कैसे करें? तो फिर हम सच के ख़िलाफ़ तर्क गढ़ते हैं। झूठ की ओर जाने के लिए हमे कुछ तर्क चाहिए, नहीं तो हम अपनी ही नज़रों में गिर जाएँगे न। कोई हमसे पूछेगा या हम खुद से ही पूछेंगे, आईना हमसे पूछेगा कि “झूठ की तरफ क्यों जा रहे हो?” और हमारे पास कोई जवाब नहीं होगा तो शर्म सी आएगी। तो हमें फिर कोई तर्क चाहिए, कोई जवाब चाहिए जो हम दे सकें।
इसी तरीके से कोई हमसे पूछेगा या हम ही ख़ुद से पूछेंगे कि, "सच की तरफ क्यों नहीं जा रहे?" तो वो भी सही प्रमाणित करने के लिए, कि क्यों सच की तरफ नहीं जा रहे, हमें कोई तर्क चाहिए, नहीं तो वही होगा कि निरुत्तर हैं और शर्मसार हैं। तो हम वो तर्क कैसे गढ़ते हैं दोनों तरफ के? वैसे ही गढ़ते हैं जैसे आपने अपने सवाल में गढ़े हैं कि झूठ के रास्ते को दिखा दो, बड़ा प्यारा-प्यारा और सफलता से और आनंद से भरा हुआ, भले ही वो हो ना। और सच के रास्ते को दिखा दो, कंटकाकीर्ण और दुःख से घिरा हुआ और असफलता से भरा हुआ, भले ही वो हो ना। सुख के साथ वो सारी चीज़े जोड़ दो जो झूठ से संबंधित हैं और सच का ताल्लुक बिलकुल ठोस तरीके से दुःख से जोड़ दो। दिखा दो, प्रदर्शित कर दो खुद को भी, दूसरों को भी कि, "देखो झूठ पर जो लोग चलते हैं वो सब मौज मना रहे हैं, वही सफल हैं, उन्हीं के पास ताक़त है सत्ता है, वही अग्रणी हैं सब।" और दिखा दो कि जो लोग सच के रास्ते पर चल रहे हैं उनकी तो दुर्गति है, बुरे हाल हैं। और ये दोनों तर्क दिखा कर के खुद को ही साबित करदो कि साहब, झूठ के रास्ते पर चलना ही सही है।

