प्रश्नकर्ता: प्रिय आचार्य जी, प्रणाम। भारत के अधिकतर विद्यालयों ने अंग्रेज़ी को शिक्षा का माध्यम बना लिया है। लोगों में भी यह भावना बैठ गयी है कि उनकी क्षेत्रीय भाषा को हीन माना जाता है, और यह मान्यता है कि उच्चतम शिक्षा अंग्रेज़ी माध्यम में ही दी जा सकती है। इसी कारण से जो ज्ञान का अपार साहित्य पूर्वजों ने छोड़ा है, उससे भी दूरी बढ़ती ही जा रही है। आचार्य जी, भाषा का शिक्षा में क्या महत्व है? क्या कारण है कि इतनी उच्चतम शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी भ्रष्टाचार संसार को खाए जा रहा है? कृपया इस विषय पर रोशनी प्रदान करें।
आचार्य प्रशांत: पहली बात तो शिक्षा क्या है, यह समझिए। आप जिसको शिक्षा कह रही हैं, उच्च शिक्षा कह रही हैं, वो बस रोज़गार पाने का माध्यम है। शिक्षा होती है वो, जो बच्चे को जानवर से इंसान बनाए, ठीक है? रोज़गार पाने के लिए अंग्रेज़ी भाषा में वो शिक्षा दे रहे हैं, तो देते रहें। रोटी की भाषा अंग्रेज़ी होती है तो होती रहे।
हर बच्चे को, हर व्यक्ति को एक दूसरी शिक्षा भी चाहिए। उस शिक्षा का माध्यम हिंदी बनेगी, दूसरी क्षेत्रीय भाषाएँ बनेंगी, घबराने की क्या बात है?
अगर आप यह सोचेंगी कि एक ही शिक्षा है, वो जो स्कूल-कॉलेज में दी जा रही है, तो आपको लगेगा, "अरे, अरे, अरे, अंग्रेज़ी छा गयी, अंग्रेज़ी छा गयी!" वही भर शिक्षा थोड़े ही है। हम भी तो शिक्षा दे रहे हैं, और यह असली शिक्षा है। और ये जो असली शिक्षा है, यह भारत की मिट्टी की भाषाओं में ज़्यादा खूबसूरती से दी जा सकती है। बहुत अंग्रेज़ी पढ़ा-लिखा इंसान होगा हिंदुस्तान में, ऐसा भी होगा जो देवनागरी लिखना ही भूल गया हो, 'क' न लिख पाता हो अब, वो भी गाने तो मोहम्मद रफ़ी के ही सुनता है। भारत के एक-से-एक भूरी चमड़ी वाले अंग्रेज़ हैं, गाली तो वो भी हिंदी में ही देते हैं।
तो आप चिंता मत करिए।


