प्रश्नकर्ता: मैं बचपन से ही देशभक्ति के माहौल में पला-बढ़ा हूँ, और ख़ुद भी देशभक्त हूँ। पर साथ-ही-साथ मेरे मन में विदेश जाने की भी इच्छा रहती थी। मैंने स्वयं को बहुत समझाया और ये विचार अपने मन से निकाल दिया। मैं वेस्टर्न क्लासिकल म्यूज़िक (पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत) का बहुत शौक़ीन हूँ, और इसी कारण मेरा मन यह सोचकर व्यथित रहता है कि मेरी देशभक्ति सच्ची नहीं है, क्योंकि मैं पाश्चात्य संगीत पसंद करता हूँ, और मेरा मन अब भी विदेश जाने का करता है।
आचार्य जी, कृपया समाधान सुझाएँ।
आचार्य प्रशांत: हम अभी कह रहे थे कि भारत की मूल पहचान अध्यात्म है।
अध्यात्म सीमाएँ नहीं सिखाता। अध्यात्म नहीं कहता कि किसी वर्ग, जगह, धारणा, या व्यवसाय से बंधकर पड़े रहो। अध्यात्म का संबंध सत्य और शांति से है। आध्यात्मिक व्यक्ति की निष्ठा सच्चाई और शांति की तरफ़ होती है। उसकी निष्ठा और किसी चीज़ से नहीं होती; इससे-उससे किसी चीज़ से नहीं होती।
तो यह जो तुमने कहा देशभक्ति के बारे में, यह देशभक्ति की बड़ी ही सीमित और संकुचित धारणा है कि देश से बाहर नहीं जाना है। उससे भी ज़्यादा संकुचित और छोटी बात तुमने यह कर दी कि - "वेस्टर्न क्लासिकल म्यूज़िक पसंद है, लेकिन लगता है कि कहीं मैं राष्ट्रद्रोही ना हो जाऊँ अगर मैंने पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत सीख लिया।" भारत से ज़्यादा खुला देश कोई हुआ है? विचार की जितनी मुक्त उड़ान भारत ने भरी है, उतनी और किसने भरी है? तो यह मुझे बात ही सुनने में बड़ी अजीब, बल्कि हास्यास्पद लग रही है कि तुम वेस्टर्न क्लासिकल सीखोगे तो तुम्हारी देशभक्ति पर कोई सवाल खड़ा हो जाएगा।


