
इतनी बड़ी भारी तुम्हारे साथ त्रासदी हो गई कि तुम आत्महत्या की सोचने लग गईं? तुम्हारा जीवन इतना फ़िज़ूल है? एक फ़िज़ूल आदमी तुम्हारी ज़िंदगी में आता है तुम्हारे साथ कुछ फ़िज़ूल की हरकतें करता है और तुम आँसुओं में डूबी हुई हो कि, “अरे! मैं डिप्रेस्ड हो गई” तुम्हें…

डिप्रेशन तब तक नहीं हो सकता जब तक अपने-आप को बहुत मजबूर अनुभव ना करो । और मजबूर हम नहीं होते, मजबूर हमें हमारी अंधी कामनाएँ बनाती हैं। अन्यथा कोई मजबूर नहीं है। कामनाओं में भी कोई दिक़्क़त नहीं है, अगर वो अंधी ना हों। कुछ ऐसा माँग रहे हो…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम स्वीकार करें। हाल ही में कश्मीर में एक छोटी बच्ची को बड़ी बर्बरता से मार दिया गया। मैं जब भी इस तरह की किसी घटना के बारे में सुनती हूँ तो बुरी तरह से बेचैन हो जाती हूँ और अपने-आप को असहाय, बेबस पाती हूँ, अवसाद…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मेरे मन में आंतरिक हलचल बनी रहती है, हमेशा ही डर-सा लगा रहता है। फोन बजता है तो लगता है कि कोई बुरी खबर ही आएगी। सोते समय यह प्रतीत होता है कि शरीर सो गया, पर मस्तिष्क लगातार चलता जा रहा है। कृपया राह सुझाएँ।…

प्रश्नकर्ता: प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार असफल होने के बाद मैं अब सांसारिक प्रयासों से अनासक्त हो गया हूँ। क्या अध्यात्म में मुझे शरण प्राप्त हो सकती है ताकि मुझे सांसारिक प्रयत्न फिर करने ही ना पड़ें?
आचार्य प्रशांत: *रॉंग नंबर*। ऐसे थोड़ी है की इधर से पिट गए, उधर से…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी ऐसा है, जब सबके साथ होते हैं या कोई काम कर रहे होते हैं तब तक तो ठीक है लेकिन जैसे ही अकेले बैठते हैं तो बेचैनी जैसा होता है। मन में ऐसा होता है कि कुछ मिसिंग है, खालीपन सा है। समझने की कोशिश करता हूँ,…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप कहते हैं कि तनाव गलत जीवन जीने का परिणाम है। पर यदि मेरा जीवन ही गलत है तो मुझे हर समय तनाव क्यों नहीं रहता?
आचार्य प्रशांत: यह हर समय मौजूद होता है नहीं तो कभी-कभार परिलक्षित क्यों होता? आपके घर में कभी-कभार साँप दिखाई देता…

स्वयंसेवकः दिल्ली से 26 वर्षीय टीपू हैं; उनकी समस्या कम शब्दों में यही है कि लगभग 5 वर्षों से अवसाद से पीड़ित हैं और दवाइयों पर रहे हैं। कह रहे हैं कि – जब-जब दवा छूट जाती है तब तक बेहतर महसूस करता हूँ पर कुछ समय बाद दवा की…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरे जीवन में कोई उपलब्धि नहीं है। बड़ा दुःख है, कैसे बाहर निकलूँ? मेहनत ख़ूब करी है लेकिन नतीजे नहीं मिले। पढ़ाई को भी पूरी ज़िंदगी बहुत महत्व दिया, लेकिन घर वालों ने हमेशा सुनाया ही है। फ़िलहाल मेरी उम्र 32 वर्ष की है।
आचार्य प्रशांत: तुम्हें…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, 2011 के आसपास मुझे डिप्रेशन की समस्या हुई थी। उस समय घर में अशांति की वजह से मानसिक संतुलन थोड़ा ख़राब हो गया। एकदम से 'डर' आ गया जीवन में, और उसके बाद से वैसे ही चल रहा है। डर एकदम से हावी होता ही रहा,…

प्रश्नकर्ता: मैंने बहुत घिनौने पाप किए हैं, क्या मेरा कुछ हो सकता है?
आचार्य प्रशांत: तुम्हारा ही कुछ हो सकता है। उनका नहीं हो सकता जो अपने आप को बड़ा पुण्यात्मा या धर्मी समझते हैं। देखो, पापी तो हम सारे ही हैं। जीसस कह गए हैं कि "सफरिंग इज़ सिन…

प्रश्नकर्ता: आत्मा क्या है? आत्मा को कैसे अभिव्यक्त करें?
आचार्य प्रशांत: फूल खिलकर झड़ जाए, कोई बात नहीं, सुंदर घटना है। पर कली को ही मसल दिया जाए तो? और उसमें कली का ही सहयोग हो, कली की हामी हो तो, कि —"हाँ, मसल दो मुझे।" उसे पता है अच्छे…

स्वयंसेवक (प्रश्न पढ़ते हुए): आचार्य जी, जिस तरीक़े के परिवेश में मैं पला-बढ़ा हूँ और अभी-भी अपना दिन बिताता हूँ, और जैसा समाज भी है, उसमें छोटे-छोटे क़दमों पर असफलता और छोटे होने का भाव लगातार मेरे सामने आता रहता है। इतनी असफलताएँ दैनिक रूप से देखने के बाद मुझ…

प्रश्नकर्ता: अर्जुन की भक्ति और सौभाग्य है कि उन्हें श्रीकृष्ण का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ, वो कर्म और कर्त्तव्य के मार्ग पर चल सके। पर साधारण मन और जीवन के लिए ये इतना सरल नहीं लगता। अपनों के विरुद्ध जाकर विजय-उत्सव मनाना कैसे सहज है, कृपया कुछ स्पष्ट करें।
आचार्य प्रशांत:…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, शिविर का तीसरा और आखिरी दिन है आज। इन तीन दिनों में खुद के बारे में बहुत कुछ जाना और समझा। इसके लिए मैं आपका बहुत धन्यवाद देता हूँ। मुझसे कहा गया कि शिविर तो अब शुरू होगा जब हम घर जाएंगे। मेरा सवाल है कि…

प्रश्नकर्ता: आत्मिक आज़ादी की ओर कैसे बढ़ें?
आचार्य प्रशांत: कसाई के पिंजड़े देखे हैं न? उसमें कुक्कड़ मुर्गा और गुटरी मुर्गी बैठकर चर्चा कर रहे हैं कि, "क्या महाराष्ट्र का हाल भी कर्नाटक जैसा होगा?” और थोड़ी ही देर पहले उन्होंने देखा है कि पिंजड़े में एक हाथ भीतर आया…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं साँस भी लेता हूँ तो हवा शरीर के अंदर जा रही है, हवा कोई और है, तो ऐसे तो मैं कभी अकेला हो ही नहीं सकता।
आचार्य प्रशांत: साँस किसके अंदर जा रही है?
प्र: शरीर के अंदर जा रही है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी मैं पढ़ नहीं पा रहा हूँ, और हमेशा बेचैन रहता हूँ। क्या नहीं पढ़ना ही मेरी बेचैनी का कारण है? या कोई और कारण है जिसे मैं समझ नहीं पा रहा हूँ?
आचार्य प्रशांत: पढ़ाई तो आप करते ही नहीं आए हो न। और आप इंजीनियरिंग में…

प्रश्न: आज से पचास-साठ साल पहले एक मानसिक रोगी को जितनी एंग्जायटी(उत्कंठा) महसूस होती थी, उतनी आज एक सामान्य युवा को महसूस होती है। आचार्य जी, मेरा सवाल ये है कि आपके अनुसार इसके कारण क्या हैं। और अगर हम इस समस्या का हल नहीं निकाल पाते हैं, तो हमारा…

प्रश्न: आचार्य जी, क्या संकोच न करने का अर्थ है कि कुछ भी कर सकते हैं, बोल सकते हैं?
आचार्य प्रशांत जी: संकोच न होने का अर्थ यह है कि – “मुझे जो करना है वो भी बे-खटके करना है, और जो नहीं करना है उसमें भी मुझे दिक्कत…

प्रश्न: हमें पता होता है कि जो लोग हैं उन्हें हमसे कोई मतलब नहीं है, तब भी हमारे मन में ये ख़याल आ जाता है कि लोग क्या सोचेंगे। ऐसा क्यों होता है?
आचार्य प्रशांत: ये सिर्फ़ तुम्हारे नहीं, मेरे मन में भी आ जाता है। इसमें कौन-सी बड़ी बात…

लकड़ी जल डूबे नहीं, कहो कहाँ की प्रीति।
अपनी सीची जानि के, यहीं बड़ने की रीति।।
~ गुरु कबीर

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या विचारों का आना असहज है?
आचार्य प्रशांत: आप कहिए न! अभी आप यहाँ बैठे हुए हैं, तल्लीनता से सुन रहे हैं, कितने विचार उठ रहे हैं? कुछ ही समय पूर्व, करीब एक-डेढ़ घण्टे का सत्र हुआ था, विचार-मग्न थे क्या? या ध्यान-मग्न थे? दोनों का अंतर…

प्रश्न: आचार्य जी, ऐसा क्यों होता है कि लोग बहुत परेशान, दुःखी और तनाव से भरे हुए रहते हैं?
आचार्य प्रशांत: तनाव कहाँ से आता है?

श्रोता: आचार्य जी, जब भी हमें खाली समय मिलता है, हम बातें शुरू कर देते हैं । ऐसा क्यूँ ?
आचार्य प्रशांत: मन को लगातार करने के लिए कुछ चाहिए, कुछ तो चाहिए । वो जो कुछ भी करता है उसका कोई विषय होता है; सब्जेक्ट । मन की ये…

श्रोता: आपने बोला कि गलत या बुरे को गलत बोलना सही होता है, लेकिन जब भी मैं ये करती हूँ, तो मैं ज़्यादा अशांत करती हूँ, जितनी किताबें मैंने अभी पढ़ी हैं या फिर पेरेंट्स ने जो सिखाया अगर आप कुछ गलत में भी अच्छाई ढूंढ सकते, तो वो ज़्यादा…

आचार्य प्रशांत: सिर्फ़ आदमी है जो दुःख में जिये जा रहा है वरना अस्तित्व में दुःख कहीं भी नहीं है। ये सब कुछ तुमको अपने चारों ओर दिखाई देता है, ये कहाँ से आ रहा है? ये आ कहाँ से रहा है, इसको समझो, ध्यान से देखो।
तुम सब सुख…

श्रोता: एक हँसता हुआ जीवन क्या है?
वक्ता: तीन स्थितियां होती हैं मन की:
दुःख- जहाँ पर आंसू हैं, जहाँ मन रोता है। दुःख से मन हमेशा बचना चाहता है।





Questioner(Q): What is the process of clarity? Is it just listening with immersion and no resistance? What is Truth? How we decide it?
Acharya Prashant (AP): Listening without effort, plus if there is Truth in what you hear, there is change and transformation, and that Truth becomes the master. We…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक तरफ़़ तो फ़िल्में हमें मनोरंजन देती हैं, हँसाती हैं, रुलाती हैं और दूसरी ओर उसी इंडस्ट्री से दुःखद और चौका देने वाली खबरें भी आती रहती हैं। कुछ कहिए।




“माँसाहार गरीबों के लिए वरदान है क्योंकि माँसाहार के माध्यम से गरीबों को सस्ता प्रोटीन मिल जाता है।“ १ ग्राम प्रोटीन अगर आप मटन से लेते हैं तो लगते हैं ३ रुपये। उतना ही प्रोटीन, १ ग्राम, अगर आप अंडे से लेते हैं तो लगते हैं १ रुपय ३० पैसे, उतना ही प्रोटीन, १ ग्राम, अगर आप चिकन से लेते हैं तो लगता हैं १ रुपया।

आचार्य नागार्जुन की जीवन कथा का आंरभिक विवरण चीनी भाषा में उपलब्ध है, जिसे क़रीब 405 ई. में प्रसिद्ध बौद्ध अनुवादक कुमारजीव ने उपलब्ध कराया। यह अन्य चीनी एवं तिब्बती वृत्तांत से सहमत हैं कि नागार्जुन दक्षिण भारत में एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। ऐतिहासिक रूप से बचपन की…



प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम लोग कुछ भी करने बैठें, जैसे पढ़ने बैठें, योग करें, मैडिटेशन करें, यहाँ तक कि जब मैं आपसे ये सवाल भी पूछ रहा हूँ तो ये सवाल पूछते हुए भी मेरे दिमाग में कुछ और चल रहा है। तो प्रश्न ये है कि मन को नियन्त्रित…

यदा नाहं तदा मोक्षो
यदाहं बन्धनं तदा।
मत्वेति हेलया किंचिन्-
मा गृहाण विमुंच मा॥८- ४॥


कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मानिवर्तितुम्। कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥३९॥
"तो कुल क्षय से होने वाले दोष को देख-सुन कर भी हम लोगों को इस पाप से निवृत्त होने का विचार क्यों नहीं करना चाहिए?"

प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। मैं ईशावास्य उपनिषद् पढ़ रहा था जिसमें नौवाँ, दसवाँ, ग्यारहवाँ श्लोक था विद्या और अविद्या पर। तो उसमें यह लिखा था कि अविद्या

ना ब्रह्म से मतलब, ना गीता से मतलब, ना उपनिषदों से मतलब। अंधविश्वासों से मतलब है, कुट्टू के आटे से मतलब है।
"क्या चबा रही हो भाभी?" कहेंगी, "ये फलाहारी लड्डू हैं।" ये फलाहारी लड्डू कौन-से होते हैं? अब यह धार्मिकता का प्रमाण दिया जा रहा है कि, "हम फलाहारी…

अजीब सी स्थिति यह है कि एक साधारण दिखने वाली लड़की से शायद ज़्यादा मुश्किल है एक सुंदर लड़की की ज़िंदगी, क्योंकि उसके खरीददार बहुत ज़्यादा हैं और उसे बहुत कुछ मिल जाएगा। और यह जो तुमको मिल जाएगा न अपनी सुंदरता के कारण, यही नर्क है तुम्हारा। तुमको लगेगा,…

लड़कीवाले लड़की देने को राज़ी नहीं होते अगर सरकारी नौकरी नहीं है। और कोई वजह हो-न-हो, वंश चलाने की ख़ातिर हमें यूपीएससी निकालना पड़ेगा। ‘वंश चलाने के लिए यूपीएससी निकालना पड़ेगा!’ यह सब तो तुम्हारे सारे कारण हैं सरकारी नौकरी के पीछे जाने के, नहीं तो और तुम क्यों इतने…

दिल में जिसको बैठाना था उसकी जगह और बहुत कुछ बैठा लिया। अब सरकारी नौकरी का लालच बैठा हुआ है दिल में, क्यों? सब जानते हैं क्यों! गाड़ी मिल जाएगी, सरकारी बंगला मिल जाएगा, कोई निकाल नहीं सकता। कोई निकाल नहीं सकता बड़ा आनंद रहता है, अज़ीम-ओ-शान-शहंशाह। ग्यारह बजे जाओ,…
आचार्य प्रशांत: सबसे पहले तो हमें इस धारणा से बाहर आना होगा कि फ़िल्में हमें मात्र मनोरंजन…
प्रश्नकर्ता: आज सुबह के सत्र में चर्चा हुई थी भय और सम्मान के बारे में। उस चर्चा में कुछ लोगों का कहना था कि हम अपने अभिभावकों की बात इसलिए मानते हैं क्योंकि हमें उनसे भय है, और कुछ का कहना था कि हम उनकी बात इसलिए मानते हैं क्योंकि…
श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय: | ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति || ४, ३९ || जितेन्द्रिय, साधनापरायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप शान्ति को प्राप्त हो जाता है। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक ३९प्रश्नकर्ता: आचार्य जी,…
भारतीयों को शायद यह लगता है कि हिंदुस्तान से बाहर जहाँ कहीं कोई मिलेगा वह ‘अंग्रेज़ी’ ही बोल रहा होगा। एक तो यह बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है – बाहर जैसे ही हम निकलेंगे वैसे ही जो मिल रहा होगा अंग्रेज़ी ही बोल रहा होगा। हिंदुस्तान बेचारा बस पिछड़ा हुआ है,…
आचार्य प्रशांत: इसी आशय के तर्क आगे भी…
तो…