प्रश्नकर्ता: आत्मिक आज़ादी की ओर कैसे बढ़ें?
आचार्य प्रशांत: कसाई के पिंजड़े देखे हैं न? उसमें कुक्कड़ मुर्गा और गुटरी मुर्गी बैठकर चर्चा कर रहे हैं कि, "क्या महाराष्ट्र का हाल भी कर्नाटक जैसा होगा?” और थोड़ी ही देर पहले उन्होंने देखा है कि पिंजड़े में एक हाथ भीतर आया था, एक को उठाया था, वहाँ ले जाकर के पत्थर पर रखा था, और खच! या वो मुर्गा-मुर्गी बैठकर के कहें कि, "माता का व्रत रखते हैं, क्या होगा रे! आरती गाते हैं।" क्या? वहाँ अंदर एक ज्योतिषी भी है। वो कहता है, "मैं पंजे देखता हूँ।" वो सबको उनके पिछले जन्म और अगले जन्म का हाल बता रहा है।
क्या करोगे ये सब जानकर? तुम्हारे लिए इनकी कोई प्रासंगिकता? कुछ मिलेगा?
थोड़ा बड़ा पिंजरा है। उसके भीतर भूरी मुर्गी ने ब्यूटी पार्लर भी खोल रखा है। वहाँ चार-पाँच लाइन (कतार) लगाकर के खड़ी हुई हैं। कह रही हैं, "मेरे पंख वगैरह ज़रा चमका दो अच्छे से।" अभी ये नोचे जाएँगे! वहाँ पंख चमकाने के लिए खड़ी है। कह रही है, "नाखून अच्छे से क्लिप कर देना।" अभी इन्हें कुत्ते खा रहे होंगे सड़क के।
होश का मतलब यही होता है — अपनी वर्तमान हालत के प्रति ईमानदारी।
असल में जानना भी नहीं, सिर्फ़ ईमानदारी। क्योंकि भाई जानते तो हम हैं ही। कौन है जो नहीं जानता?


