प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं साँस भी लेता हूँ तो हवा शरीर के अंदर जा रही है, हवा कोई और है, तो ऐसे तो मैं कभी अकेला हो ही नहीं सकता।
आचार्य प्रशांत: साँस किसके अंदर जा रही है?
प्र: शरीर के अंदर जा रही है।
आचार्य: तो शरीर तो अकेला हो ही नहीं सकता।
प्र: तो अगर मैं कहूँ कि मुझे अकेले रहना पसंद है तो मैं सबसे पहले तो ख़ुद से ही झूठ बोल रहा हूँ।
आचार्य: उससे पहले तुम और बड़ा झूठ बोल चुके हो कि तुम शरीर हो। पहले ख़ुद ही परिभाषित करते हो कि ‘मैं शरीर हूँ’ और हवा मेरे साथ है, फिर कहते हो, "इससे सिद्ध होता है कि मैं कभी अकेला हो ही नहीं सकता।" जो तुम्हारे पूरे तर्क का आधार है, पहले उसको तो परख लो। शरीर कभी अकेला होता है क्या? जब हम अकेलेपन की बात कर रहे हैं तो किसकी बात कर रहे हैं?
प्र: मन की।
आचार्य:


