
एक बार आप कहीं के लोगों की आदत डलवा दें, कि तुम्हें माँस-ही-माँस खाना है, बिलकुल सब और तला-भुना भी खाना है। अब क्षेत्र में अगर कोई आकर के सेहतमंद खाना बेचना भी चाहे तो उसका रेस्तराँ बंद हो जाएगा कि नहीं हो जाएगा?
तो यह लोग जो गंदगी फैला…

“माँसाहार गरीबों के लिए वरदान है क्योंकि माँसाहार के माध्यम से गरीबों को सस्ता प्रोटीन मिल जाता है।“ १ ग्राम प्रोटीन अगर आप मटन से लेते हैं तो लगते हैं ३ रुपये। उतना ही प्रोटीन, १ ग्राम, अगर आप अंडे से लेते हैं तो लगते हैं १ रुपय ३० पैसे,…

आज से १ लाख वर्ष पीछे जाओ तो अरबों-खरबों जानवर थे, हज़ारों-लाखों प्रजातियों के; और मनुष्य थे कुछ लाख, अधिक-से-अधिक। अब आदमी हो गए हैं ८ अरब और जानवर बचे हैं (हाथों से कम मात्रा दर्शाते हुए) इतने से!
साहब!
जानवर भी कौन से बचे हैं बताइए? जो मनुष्य के…

प्रश्नकर्ता: अंडा तो वेजिटेरियन (शाकाहारी) ही है, अंडा से तो होता है नॉन- फर्टीलाइज़्ड, चूजा तो निकलेगा नहीं।
आचार्य प्रशांत: बात ये थोड़े ही है कि वह पेड़ पर लटका मिला कि नहीं लटका मिला। यह भी तो देखो वह अंडा आया कहाँ से, मुर्गी स्वेच्छा से आकर के…

प्रश्नकर्ता: अगर दूध का आप बहिष्कार करते हैं तो गाय की बिलकुल ही बेकद्री हो जाएगी।
आचार्य प्रशांत: ये बात पता नहीं क्यों हमारे दूध पीने वाले भाई-बहन सोचते ही नहीं बिलकुल कि जिस दिन गाय ने दूध देना बंद कर दिया उस दिन वो गाय पालने वाले के लिए,…

जहाँ माँस खाना शुरू किया, तहाँ समझ लो कि आप कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ाने वालों की कतार में शामिल हो गए। उपभोग के माध्यमों में जो चीज़ ग्लोबल वार्मिंग (वैश्विक उष्मीकरण) के लिए सबसे ज़्यादा घातक है वो है माँस का सेवन। माँस का सेवन समझ रहे हैं सबसे ज़्यादा घातक…

एक बेज़ुबान निरीह को पकड़ कर काट दिया, उसका माँस पका कर खा गए – इससे कौन-सी परम सत्ता आपको आशीर्वाद देने वाली है, बताइए ज़रा? इससे आसमानों से फूल बरसेंगे आप पर? क्या तुक है!
जब बात की जाती है पशु बलि की, तो वास्तव में कहा जाता है…

मैं इंदिरापुरम की ओर से निकल रहा था, तीन-चार साल पहले की बात है। अचानक मेरी गाड़ी के सामने दौड़ता हुआ एक मुर्गा आ गया। वो छूट कर भागा, वो सड़क की तरफ़ आ गया कि, ‘गाड़ी से कुचल कर मर जाऊँगा तो मर जाऊँगा, पर इसके साथ रहना मंज़ूर…

पृथ्वी पर नहीं है इतने संसाधन कि तुम बच्चे पैदा करे ही जा रहे हो, करे ही जा रहे हो। और मैं जो बोलूँगा वो बात बहुत चुभेगी, बता देता हूँ!
इस समय पृथ्वी पर बच्चा पैदा होने से ज़्यादा अशुभ काम दूसरा नहीं है। मातम का काम है अगर…

“आज ज़रा नॉन-वेज (माँस) खाने का मन था!” अरे! नॉन-वेज क्या होता है? सीधे बोलो, “आज किसी की जान लेने का मन था। आज किसी की गर्दन पर छुरी चलाने का मन था।“ पर ये बात बोलोगे तो तुम्हें ही अच्छा नहीं लगेगा। तो कहते हो, “चलो जी थोड़ा नॉन-वेज…

आचार्य प्रशांत: बीच-बीच में मैं टि्वटर पर सब जीवों पर, पशुओं पर करुणा के पक्ष में ट्वीट करता रहता हूँ। तो प्रश्नकर्ता ने उसपर एक चर्चा आरंभ करी है। बहुत अच्छा लगा कि आपने इस संवाद की पहल करी। तो जो जो बातें आप सामने अपनी रखते रहे हैं उन…

रोबिन सिंह: बहुत से जो लोग हैं उनको होता है कि भाई अभी तो हम दूध ले रहे हैं इस चक्कर में गाय की कुछ क़दर तो है। अगर दूध को आप बहिष्कार करने को कह दो तो गाय की बिलकुल ही बेकद्री हो जाएगी।
आचार्य प्रशांत: बात तो ये…


आचार्य प्रशांत: प्रश्नकर्ता ने तर्क भेजा है, कह रहे हैं, "विटामिन बी12 सिर्फ जानवरों के माँस से ही मिल सकता है और अगर उसको कृत्रिम रूप से लेंगे तो शरीर फिर उसको सोख नहीं पाता।"
बी12 को थोड़ा समझते हैं। देखिए, कोई जानवर अपने शरीर में विशेषतया विटामिन बी12 नहीं…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी कुछ समय पहले यूनाइटेड नेशंस का एक ट्वीट आया था उसमें उन्होंने कहा था कि माँसाहार क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) के प्रमुख कारणों में से एक है इसलिए माँसाहार कम करें। तो यह ट्वीट आया और फिर कुछ घण्टों में या एक दिन के अंदर वो ट्वीट…

आचार्य प्रशांत: टीवी पर लिसियस और इस तरह की कंपनियाँ हैं वो अब सीधे-सीधे बच्चों का इस्तेमाल करके लोगों को माँस खाने की ओर ललचा रही हैं।
जो हिंदुस्तानियों के पसंदीदा फिल्मी कलाकार हैं वो इन कम्पनियों के विज्ञापन में काम कर रहे हैं और वो विज्ञापन हर घर में…

आचार्य प्रशांत: हमारा एक वीडियो है अंग्रेजी में जिसका शीर्षक है इफ किलिंग इस बैड व्हाई डस कार्निवोरस एसिस्ट? (यदि मारना बूरा है तो प्रकृति में माँसाहारी जानवर क्यों हैं?)
तो इसपर प्रश्नकर्ता ने सवाल भेजा है। कह रहे हैं कि, "मानों अगर आपके भाई को कोई मार दे जिन्हें…

प्रश्नकर्ता १: मेरा ऐसा तर्क है कि माँसाहार शाकाहार दोनों ही प्रकृति के संतुलन हेतु आवश्यक हैं। आप कल्पना करें कि यदि पूरी मानव जाति शाकाहारी हो गई तो पानी में मछलियाँ कितनी ज़्यादा हो जाएँगी? और गाँव शहर में सूअर, बकरे-बकरी कितने ज़्यादा हो जाएँगे? कल्पना करना मुश्किल है।…

प्रश्नकर्ता: जब मेरे मज़हब में कुछ जानवरों के माँस को हलाल बताया गया है तो फिर मैं माँस क्यों ना खाऊँ?
आचार्य प्रशांत: हलाल बताया गया है माने अनुमति ही तो दी गई है न, अनिवार्य तो नहीं कर दिया गया। अलाउड और कंपलसरी में अंतर होता है न। और…

प्रश्नकर्ता: बकरीद आ रही है, और मैं उन संस्थाओं का समर्थन करता हूँ जो कि पी.सी.ए. एक्ट (अधिनियम) है, प्रीवेंशन ऑफ क्रुएलिटी टुवर्ड्स एनिमल्स ( पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण अधिनियम- 1960), उसके सेक्शन अट्ठाईस को हटाने की माँग कर रहे हैं। उसका जो सेक्शन अट्ठाईस है वो कहता…

प्रश्नकर्ता: पौधों में भी तो जान होती है, पौधों में भी तो भावनाएँ होती हैं, और पौधे भी तो दर्द का अनुभव कर सकते हैं। तो हमें उन्हें भी तो फिर भोजन के लिए नहीं मारना चाहिए। तो आप चाहे शाकाहारी हों, वीगन हों या माँसाहारी हों, एक ही बात…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ये तो साफ है कि जो वैश्विक समस्याऍं हैं, बड़ी समस्याऍं, जैसे ग्लोबल वॉर्मिंग (भूमंडलीय ऊष्मीकरण) या क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन), उनका कारण ये गलत खोज ही है, कि इंसान गलत जगह पर खोज रहा है। तो एक आइडियल वर्ल्ड (आदर्श विश्व) तो यही होगा कि ये…

प्रश्नकर्ता: पश्चिम में जानवरों का मांस और जानवरों से उत्पन्न उत्पाद को खाने में प्रचूरता से उपयोग में लाया जाता है। पश्चिम के लोग शारीरिक दृष्टि से भी संमृद्ध हैं और आर्थिक दृष्टि से भी।
तो क्या प्रकृति को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता? और अगर पड़ता है तो किस…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमस्ते! हाल ही में एक हथिनी की हत्या के संबंध में देश में बहुत खलबली रही। आचार्य जी उस हथिनी में ऐसा क्या था कि पूरा देश ही भावुक हो गया? वो लोग भी जो रोज़ जानवर खाते हैं वो सोशल मीडिया पर आकर बयान देने लग…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी हिंसा की जो बात हो रही थी अभी उसके बारे में एक प्रश्न था कि कभी ऐसी स्थिति बन जाए कि आत्मरक्षा के लिए, या किसी निर्दोष की रक्षा के लिए हिंसा करनी पड़ जाए या हो जाए अचानक से, तो वह हिंसा होगी या नहीं?
आचार्य…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आम जन मानस में ये धारणा घर करती जा रही है कि कोरोनावायरस ईश्वरीय प्रकोप है। कृपया कुछ कहें।
आचार्य प्रशांत: नहीं, ईश्वरीय प्रकोप वगैरह तो नहीं है। कोई ईश्वर नहीं बैठा है ऊपर आसमानों में जो वहाँ से वायरस बरसा रहा हो। लेकिन ये जो बात…

प्रश्नकर्ता: मुझे आपके गुरु के बारे में जानना था। आपने एक वीडियो में बताया था कि आपके टीचर एक मुर्गे हुआ करते थे। उनका नाम 'जीतू' था। तो उन्हीं के बारे में जानना था।
आचार्य प्रशांत: नहीं, ऐसा नहीं है कि जैसे लोग किसी को अपना गुरु मानते हैं, उसी…

प्रश्नकर्ता: माँस खाना कैसा है? क्या दूसरों के बारे में सोचना ज़रूरी है?
आचार्य प्रशांत: माँस खाना कैसा भी नहीं है — न अच्छा है, न बुरा है — खा सकते हो, कुछ भी खा सकते हो। बहुत-बहुत पुराने जो मनुष्य के पुरखें थे, वो माँसाहारी ही थे। आज भी…

प्रश्नकर्ता: नमस्कार, आचार्य जी।
सरकार और जितने भी चिकित्सा प्रमुख हैं, जानकार हैं, उन्होंने एक बात साफ-साफ कह दी है कि इस बीमारी का निवारण बहुत साफ है—'सोशल डिस्टन्सिंग'। जबतक एंटीडोट नहीं आ जाता और उसको न जाने कितने साल लगेंगे, तब तक आप एक दूसरे से दूर रहें और…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या चिकित्सा के क्षेत्र को अपवाद मानकर जीव-हत्या करना ठीक है? क्या मानव की जान, किसी और जीव से ऊपर है? और अगर नहीं है तो क्या स्वयं को एलोपैथिक के इलाज से दूर रखना स्वयं पर हिंसा नहीं है? कृपया स्पष्टता प्रदान करें।
आचार्य प्रशांत: टेढ़ी…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ईश्वर को करुणा का सागर कहा गया है, परंतु दुनिया में हर तरफ़ हिंसा ही दिखाई देती है। जीवों की रचना में एक ओर तो हिरण है और दूसरी ओर शेर है। हिरण मासूम है फिर भी शेर उसे बहुत बुरी तरह मारकर खा जाता है। हिरण…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बचपन से ही मेरे साथ ये समस्या रही है कि मेरा मन बहुत विचलित हो जाता है, जैसे ही उसे किसी के दुःख का अनुभव होता है — किसी की मृत्यु, जानवरों का शोषण इत्यादि। ये बातें मेरे मन में पैठ जाती हैं और मैं इसने बाहर…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक ओर मेरे घर में चूहे आते हैं तो मैं मार देता हूँ, और दूसरी ओर मेरी माँ गणेश जी से प्रार्थना करती हैं; ये हम दोनों की अलग-अलग प्रकृतियाँ हैं। क्या प्रकृति पर चलना अनुचित है?
आचार्य प्रशांत: जिसको तुम प्रकृति कह रहे हो, वास्तव में…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जो कंपनियाँ बहुत बड़े तल पर, अंतर्राष्ट्रीय तल पर फैल चुकी हैं, लेकिन गलत काम कर रही हैं, जैसे, चिकन के विज्ञापन दे देकर लुभा रही हैं लोगों को। और चूँकि लोग ऐसे हैं कि विज्ञापन देखकर जाते हैं। अब अगर इतनी बड़ी कंपनियों से मुझे पंगा…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, पर्यावरण को लेकर के बचपन से ही रुझान रहा है और जैसे-जैसे बड़े हुए हैं, उसको विनाश की ओर बढ़ते हुए ही देखा है। काफ़ी इच्छा थी कि इसके लिए कुछ किया जाए पर फिर अपने काम-धाम में ही लग गए। जब कभी भी गाड़ियों में से…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कुछ लोग बोलते हैं कि दूध नहीं पीना चाहिए, परंतु पुराने विचारों के लोग बोलते हैं कि दूध पीने से ताक़त आती है। वो तो घर पर भैंस बाँध लेते हैं और दूध का उपभोग करते हैं। कुछ समय पहले आपका एक वीडियो देखा था इसी विषय…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरे हाथों, मतलब काम करते समय मुझसे ग़लती से एक घोड़े की हत्या हो गयी थी। उस बात को आज ४ साल हो चुके हैं पर आज भी रात को बेचैनी में जाग उठता हूँ उसके ख़्याल से। मैं उसे बहुत प्यार करता था, मेरे बच्चे जैसा…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बच्चों को माँसाहार से कैसे दूर रखें?
आचार्य प्रशांत: बच्चे को बोलिए कि ऐसा करते हैं कि जो भी खाएँगे, शुरू से खाएँगे — सेब खाना है या भाजी खानी है तो चलो वहाँ से लेकर आते हैं जहाँ वो उगता है — भाजी ज़मीन से तोड़ी…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या माँस-मदिरा, तंबाकू आदि का यदा-कदा सेवन करना गलत है? मैंने सुना है रामकृष्ण, विवेकानंद, जीज़स आदि मांसाहारी थे, और बुद्ध ने भी प्राकृतिक मौत से मरे जानवरों का माँस खाने के प्रति आपत्ति नहीं की है। तो क्या माँसाहार अध्यात्म में बाधक है? यदि बाधक है…

माँस माँस सब एक है मुर्गी हिरणी गाय
आंख देखी नर खात है, ते नर नरकहि जाय
~ कबीर साहब
आचार्य प्रशांत: माँस सारे एक हैं , मुर्गी, हिरणी, गाय — इसमें मनुष्य और जोड़ लीजिए।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, यह जो जानवरों को काटते हैं, खाते हैं, पिंजरों में बंद करते हैं, भर-भर के ट्रकों में ले जा रहे होते हैं और पता ही होता है कि कुछ समय में इन्हें मारकर खा जाएँगे, मेरा सवाल है कि क्या प्राकृतिक आपदाएँ, भूकम्प वगैरह, इसी कारण आते…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम शाकाहारी क्यों हैं?
आचार्य प्रशांत: देखो, वहाँ तार के ऊपर एक चिड़िया बैठी है, दिख रही है? काहे को खाना उसे?
प्रश्नकर्ता: पेड़-पौधों में भी तो जान होती है, वो भी महसूस करते हैं।

आचार्य प्रशांत: हिंसा क्या है? हिंसा की क्या परिभाषा है? हिंसा की हर परिभाषा से सबसे पहले ‘दूसरों’ को निकाल दें। हिंसा दूसरों से जुड़ी हुई चीज़ बहुत बाद में है, हिंसा का सर्वप्रथम आपसे ताल्लुक है। क्या है हिंसा?
श्रोतागण: दूसरे को कष्ट पहुँचना।
आचार्य प्रशांत: मैं जानता हूँ…

प्रश्न: आचार्य जी, 'भोजन' और 'अध्यात्म' बहुत बातें होती है इस पर — यह मत खाओ, वह मत खाओ, शरीर शुद्धि इत्यादि। कृपया प्रकाश डालें इस विषय पर।
आचार्य प्रशांत: "जल्दी से खाओ और आगे बढ़ो, बहुत काम करना है" — मेरे देखे तो अध्यात्म और भोजन का यही संबंध…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, कुछ दिनों पहले मैं असम के गुवाहाटी शहर में स्थित एक देवी मंदिर में दर्शन की अभिलाषा से गया था। कुछ घण्टों तक लाइन में लग कर अपने नंबर का इंतज़ार कर रहा था। जैसे ही लगा कि शायद अब दर्शन हो जाएँगे तो देखता हूँ…

प्रश्न: आचार्य जी, मैं कुछ समय पहले वीगन (शुद्ध-शाकाहारी) हो गया था, तो मेरा वज़न बहुत काम हो गया और विटामिन की कमी भी हो गई थी। क्या वीगन हो जाने से ऐसा भी होता है?
आचार्य प्रशांत: किसने कहा है कि तुम कुछ भी अंधाधुंध हो जाओ? वीगन होने…

प्रश्न: आचार्य जी, रमण महर्षि की एक डॉक्यूमेंटरी (वृत्त चित्र) देख रही थी। उसमें दिखाया था कि जब भी वह कुछ बोलते थे, तो एक गाय सामने आकर खड़ी हो जाती थी। जब उसकी मृत्यु हुई, तो उस दिन सामने नहीं आई, फिर रमण महर्षि ख़ुद उसे देखने गए थे।…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, फल और सब्ज़ी हम इसलिए खाते हैं क्योंकि उनके दर्द को अनुभव नहीं कर पाते, परंतु जानवर के विषय में ऐसा नहीं है। दर्द दोनों को ही होता है, फिर क्या सही है और क्या ग़लत?
आचार्य प्रशांत: जानवर वगैरह की परवाह छोड़ो, चाहे जानवर हो, सब्ज़ी…

प्रश्नकर्ता: पशुओं का परिवार नियोजन कैसे करें, और क्या नियोजन करना सही है?
आचार्य प्रशांत: प्रकृति इस बात से बिलकुल सरोकार नहीं रखती कि तुम्हारे जीवन की गुणवत्ता क्या है। उसको सरोकार बस इस बात से होता है कि जीव कितने हैं। जीवन की गुणवत्ता क्या है, इससे प्रकृति को…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अकसर सड़कों पर जानवरों को मृत देखता हूँ, देखकर वेदना भी उठती है। और यह भी देखता हूँ कि मैं किस प्रकार उस वेदना का गला घोट देता हूँ और आगे बढ़ जाता हूँ। कहाँ चूक हो रही है?
आचार्य प्रशांत: चूक यह हो रही है कि…
आचार्य प्रशांत: बेटा, किस …