प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, कुछ दिनों पहले मैं असम के गुवाहाटी शहर में स्थित एक देवी मंदिर में दर्शन की अभिलाषा से गया था। कुछ घण्टों तक लाइन में लग कर अपने नंबर का इंतज़ार कर रहा था। जैसे ही लगा कि शायद अब दर्शन हो जाएँगे तो देखता हूँ कि मंदिर के मुख्य द्वार के पास ही कुछ बकरियों के साथ-साथ कुछ दो माह के छोटे बकरियों के बच्चों, कबूतरों और भैसों को काटा जा रहा था। यह सब देखकर मन अशांत हो गया और दर्शन करने की अभिलाषा ख़त्म ही हो गई। मगर मंदिर में व्यवस्था ऐसी है कि जो एक बार मुख्य द्वार तक पहुँच गया उसको दर्शन कर के ही बाहर जाना पड़ता है।
अब जब मैंने मुख्य मंदिर में प्रवेश किया तो देखा कि कटे हुए जानवरों के सर वहाँ माँ को समर्पित किए गए थे। आचार्य जी, इतने बड़े धाम में मैंने परम अशांति और दुःख का अनुभव किया, ऐसा क्यों? यह सब प्रथाएँ क्या हैं समझ नहीं आता, सही हैं भी या ग़लत हैं, यह भी समझ नहीं आता, पर एक बात स्पष्ट हो गई इस अनुभव से कि शांति की अभिलाषा लेकर गया था और अशांत हो कर लौट आया।
आचार्य प्रशांत: आदमी बड़ा करामाती जीव है। कुछ रच पाने की उसकी हैसीयत हो, न हो, विध्वंस की उसकी क्षमता लाजवाब है। उलझन को सुलझा वो भले न पाता हो, पर सीधी सरल बात को भी उलझा लेने में उसका कोई सानी नहीं। कोई ग्रन्थ नहीं है, कोई शास्त्र नहीं है जो कहता है कि जानवर को मारोगे तो उससे तुम्हें आध्यात्मिक तल का कोई लाभ हो जाना है। बिलकुल साफ़ समझ लीजिए इस बात को। इस बात का कोई प्रमाण नहीं है, इस बात के लिए कोई शास्त्रीय वैधता नहीं है कि पशुबलि से किसी भी तरह का कोई लाभ हो सकता है। कहीं-कहीं पर बात की गई है अजमेध, अश्वमेध इत्यादि की। वो बात जिस सन्दर्भ में है उसको समझना आवश्यक है।
अध्यात्म का पूरा क्षेत्र ही जानवर को इंसान बनाने की कोशिश है। शरीर से तो हम पशु ही हैं, वृत्तियों से भी हम पशु ही हैं और पशुओं की ही भाँति हम भी नए ताजे जंगल से ही निकल कर आए हैं। तो कूट-कूट कर पशुता हममें भरी हुई है। जब बात की जाती है पशुबलि की तो वास्तव में कहा जाता है कि अपनी पशुता को मारो। किसी पशु को मारने की बात नहीं हो रही है, अपने भीतर की पशुता को मारने की बात हो रही है।


