प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, फल और सब्ज़ी हम इसलिए खाते हैं क्योंकि उनके दर्द को अनुभव नहीं कर पाते, परंतु जानवर के विषय में ऐसा नहीं है। दर्द दोनों को ही होता है, फिर क्या सही है और क्या ग़लत?
आचार्य प्रशांत: जानवर वगैरह की परवाह छोड़ो, चाहे जानवर हो, सब्ज़ी हो या कुछ और हो, बात खाने की नहीं है। तुम यह पूछो कि - "जो कर रहा हूँ वह करते समय होश है मुझे?" दो ही बातें होती हैं जिनसे ज़िंदगी जीने लायक रहती है — एक होश और एक प्रेम। तुम चबाओ मच्छी; अगर प्रेम में भरे होकर चबा सकते हो तो ख़ूब चबाओ। यह ना पूछो कि - "माँस खाना सही है या ग़लत है?" तुम यह पूछो कि माँस खाते वक़्त चित्त की दशा क्या रहती है? — प्रेम में भरे हुए होते हो, या भीतर सूक्ष्म हिंसा के दाँतों से तुम किसी का माँस चिंचोड़ रहे होते हो?
कोई ग़लती नहीं है माँस खाने में अगर तुम प्रेमपूर्वक खा सको, तुम यह कर सकते हो तो ख़ूब खाओ। और अगर तुम हिंसा में भरकर माँस चबा रहे हो मछली का, तो फिर हिंसा में भरकर तुम किसी का भी माँस चबा सकते हो। फिर तुम जिसके भी माँस का स्पर्श करोगे, वो काटने, चीरने, शोषण करने के लिए ही करोगे — चाहे वह अपने बच्चे का ही क्यों न स्पर्श करो, चाहे अपनी पत्नी का ही क्यों न स्पर्श करो।
माँस से तुम्हारा फिर एक ही रिश्ता रह जाएगा कि — "मेरी भूख मिटे माँस से।"
होशपूर्वक तुम किसी का अगर क़त्ल कर सकते हो तो बेशक़ करो, प्रेमपूर्वक तुम किसी का ख़ून बहा सकते हो तो बेशक़ बहाओ। बात का सम्बन्ध उससे नहीं है कि उसको मार दिया या क्या कर दिया, बात का सम्बन्ध तुमसे है कि — तुम अपने साथ क्या कर रहे हो, तुम किस स्थिति में जी रहे हो। और अगर तुम होश में नहीं हो, तो तुम भले ही शाकाहारी हो, तुम दूसरे तरीकों से हिंसा करोगे। तुम्हें क्या लगता है, जो लोग माँस नहीं खाते वे सिर्फ़ माँस ना खाने के कारण बड़े प्रेमपूर्ण हो जाते हैं? बिलकुल झूठी बात है। एक-से-एक हिंसक होते हैं, और हैं कहने को शाकाहारी — शाकाहारी क्या फलाहारी हैं, कोई दुग्धाहारी हैं, कोई कुछ हैं।


