आचार्य प्रशांत: बीच-बीच में मैं टि्वटर पर सब जीवों पर, पशुओं पर करुणा के पक्ष में ट्वीट करता रहता हूँ। तो प्रश्नकर्ता ने उसपर एक चर्चा आरंभ करी है। बहुत अच्छा लगा कि आपने इस संवाद की पहल करी। तो जो जो बातें आप सामने अपनी रखते रहे हैं उन पर चर्चा करते हैं।
तो प्रश्नकर्ता कह रहे हैं कि *नोन वेज कंज़म्प्शन, मीन्स फ़्लेश कंज़म्प्शन इज एज़ ओल्ड एज़ दि एग्जिस्टेंस ऑफ ह्यूमन्स*। (पशुओं को मारना, उनका माँस खाना तबसे चल रहा है जबसे इंसान अस्तित्व में आया है।)
बिलकुल ठीक बात कही है आपने। लेकिन आज क्या आप वो सब कुछ कर रहे हैं या करना चाहते हैं जो इंसान अपनी हस्ती में आने के वक़्त किया करता था?
भई इंसान अचानक से तो पृथ्वी पर प्रकट हो नहीं गया। इंसान आया उसके बाद उसने सभ्यता-संस्कृति सीखी फिर गाँव आए, खेत आए फिर शहर आए, विज्ञान आगे बढ़ा, भाषा आगे बढ़ी, कलाएँ आगे बढ़ीं। ऐसा तो हुआ नहीं था कि जिस दिन इंसान पृथ्वी पर प्रकट हुआ था उसी दिन उसके साथ में गाँव, खेत, शहर, गाड़ियाँ, भाषा, संस्कृति ये सब भी आ गए थे। ऐसा तो आप भी नहीं मानते होंगे या स्वीकार करेंगे कि आदमी ज़मीन पर प्रकट हुआ और आदमी के साथ-साथ गाड़ियाँ खड़ी हुई हैं, खेत हैं और खेतों में कैसे बीज डालना है इसका ज्ञान भी है आदमी को और कपड़े भी हैं आदमी के पास।
ज़ाहिर सी बात है आदमी पहले आया, उसके बाद आदमी ने धीरे-धीरे कपड़े बनाना सीखा। आग जानी, पहिया जाना, इतिहास की बातें हैं ये सब। मामूली स्कूल के बच्चे भी जानते हैं। तो इंसान जब नया-नया ज़मीन पर आया, उसको आया कहना चाहते हैं तो आया कह दीजिए या उसको इवोल्वड (विकसित) कहना चाहते हों तो इवोल्वड (विकसित) कह दीजिए।

