क्या सिखाना चाहती है कोरोना महामारी? || आचार्य प्रशांत, कोरोनावायरस पर (2020)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आम जन मानस में ये धारणा घर करती जा रही है कि कोरोनावायरस ईश्वरीय प्रकोप है। कृपया कुछ कहें।
आचार्य प्रशांत: नहीं, ईश्वरीय प्रकोप वगैरह तो नहीं है। कोई ईश्वर नहीं बैठा है ऊपर आसमानों में जो वहाँ से वायरस बरसा रहा हो। लेकिन ये जो बात लोगों को प्रतीत हो रही है, उसमें थोड़ा यथार्थ तो है। समझना पड़ेगा बात क्या है।
देखिए, कहाँ से आया वायरस और उसके आने के फलस्वरूप क्या हुआ है? पहले भी कहा था, मैं फिर दोहरा रहा हूँ, वायरस अपनी इच्छा से या कोई साज़िश, षड्यंत्र करके तो नहीं आया है न? नहीं। बहुत बीमारियाँ होती हैं जो हमें यूँ ही लग जाती हैं। ये जो महामारी फैली है, वो हमें ‘यूँ ही’ नहीं लग गई। मानव जाति पूरी तरह से उत्तरदाई है इस बीमारी को आमंत्रित करने के लिए, बल्कि आविष्कृत करने के लिए।
एक बात तो ये है कि हम गए हैं और इस बीमारी को जंगल से खींचकर लाए हैं, और अभी जैसे-जैसे तथ्यों पर से पर्दा हटेगा, ये भी पता चल सकता है कि हम इसको जंगल ही भर से खींचकर नहीं लाए हैं, हमने इस बीमारी का शायद आविष्कार ही किया है। अभी कुछ पक्का पता नहीं। पर चाहे आमंत्रित किया हो, चाहे आविष्कृत किया हो, किया तो काम हमने ‘आ बैल, मुझे मार’ का ही है। तो मुश्किल है ये न देख पाना कि यहाँ कर्मफल का सिद्धांत काम कर ही रहा है।
हम जिन तरीक़ों से जी रहे थे, मैं पूरी मानवता की बात कर रहा हूँ, हम जिन आधारों पर, जिन सिद्धांतों पर अपनी सभ्यता, संस्कृति आधारित कर रहे थे, जीवन को आगे बढ़ा रहे थे, वो ग़लत तो हैं ही, झूठे तो हैं ही न? प्रकृति का क्रूर दोहन, विकास की झूठी और खोखली परिभाषा, उपभोग की अंतहीन कामना, ये आम आदमी का जीवन है। मैं दुनिया भर के लोगों की बात कर रहा हूँ, मैं सब आठ-सौ करोड़ लोगों की बात कर रहा हूँ। मैं सब देशों की बात कर रहा हूँ।

