आचार्य प्रशांत: हिंसा क्या है? हिंसा की क्या परिभाषा है? हिंसा की हर परिभाषा से सबसे पहले ‘दूसरों’ को निकाल दें। हिंसा दूसरों से जुड़ी हुई चीज़ बहुत बाद में है, हिंसा का सर्वप्रथम आपसे ताल्लुक है। क्या है हिंसा?
श्रोतागण: दूसरे को कष्ट पहुँचना।
आचार्य प्रशांत: मैं जानता हूँ कि हिंसा की यही परिभाषा हमने सुनी है, यही हमें दी गई हैं कि ‘दूसरे को कष्ट पहुँचाना, दूसरे के प्रति वैमनस्य रखना’ — यही हिंसा है। मैं आपसे निवेदन कर रहा हूँ, हिंसा का ‘दूसरों’ से ताल्लुक बहुत बाद में है, सबसे पहले हिंसा का संबंध किससे है?
श्रोतागण: खुद ही टुकड़ों में जीना — इच्छा, डिजायर।
आचार्य प्रशांत:
थोड़ा और गहरे जाइये। अपने को किसी भी तरह से हीन मानना, छोटा मानना, सीमित मानना, परिभाषेय मानना — यही हिंसा है।
इस परिभाषा में यह तो शामिल है ही कि आप अपनेआप को ‘छोटा’ मान रहे हैं क्योंकि यदि आपने अपनेआप को छोटा माना तो आपने अपने इर्द-गिर्द एक सीमा खींच दी, इस परिभाषा में यह भी शामिल है कि आप अपनेआप को बहुत ‘बड़ा’ मान रहे हैं क्योंकि आप अपनेआप को जितना भी बड़ा मान लें, उस बड़प्पन की भी सीमा ज़रूर होगी। आप जब भी अपनेआप को कुछ भी मानेंगे तो एक सीमा ज़रूर खीचेंगे। जहाँ सीमा खिंचती है, उस सीमा के पार ‘दूसरे’ शुरू हो जाते हैं। दूसरे बाद में आते हैं, सीमा आप पहले खींचते हैं, और जहाँ सीमा खिंची, और

