
आचार्य प्रशांत: प्रकाश से आशय होता है — वस्तुओं का संज्ञान। प्रकाश न हो तो ऑंखें किसी भी वस्तु का संज्ञान नहीं ले सकतीं; और जब प्रकाश होता है तो प्रकाश स्वयं नहीं देखा जाता, प्रकाश में वस्तु देखी जाती है। तो जैसे हम हैं, हमारे लिए वस्तु तभी है…

लड़का पच्चीस साल का, तीस साल का है और कुल एक भाई एक बहन है। अकसर माँ-बाप कार्यरत रहे थे, दोनों ही कमाते थे तो बचत है घर में। मकान अपना है। लड़का अगर पच्चीस-तीस साल का है तो माँ-बाप कितने साल के हैं?
साठ-पैंसठ।
अभी-अभी रिटायर (सेवानिवृत) हुए हैं,

जब सड़क पर निकलो न तो अपनी कमियाँ पता चलती हैं। जो व्यक्ति घर में ही बैठ गया वो बड़ा दम्भी, घमंडी, अहंकारी हो जाता है क्योंकि उसे अपनी कमियों का पता भी नहीं होता। अकसर गृहिणियों की अकड़ बिलकुल लाजवाब होती है। “मैं ही बेग़म हूँ, मैं ही रानी…

अच्छे-अच्छे लोग आप देखोगे, खूब कमा रहे होंगे, उनसे पूछो, “क्वालिटी ऑफ लाइफ? रिचनेस इंडेक्स? (जीवन की गुणवत्ता? समृधि सूचक?)” शून्य! “गाना आता है?” नहीं! “तैरना आता है?” नहीं! “संगीत सीखा कुछ?” नहीं! “कुछ और भाषाएँ सीखीं?” नहीं! “दिनभर करते क्या हो?” “कमाता हूँ, कमाता हूँ, कमाता हूँ!” अरे!…

ना किसी पैसे के प्रदर्शन के आगे दबो, झुको, ना किसी की ताक़त के आगे दबो, झुको। और किसी की अंग्रेज़ियत के आगे तो बिलकुल दबना, झुकना नहीं है। और किसी के सौंदर्य के आगे भी दबना, झुकना नहीं है। कि सुंदर लड़की आ गई या हैंडसम लड़का आ गया…

ना किसी के पैसे के प्रदर्शन के आगे दबो-झुको, ना किसी के ताक़त के प्रदर्शन के आगे दबो-झुको, और किसी की अंग्रेजियत के आगे तो बिलकुल दबना-झुकना नहीं है। और किसी के सौंदर्य के आगे भी दबना-झुकना नहीं है कि सुंदर लड़की आ गयी कि हैंडसम लड़का आ गया और…

प्रश्नकर्ता: सर, लोग दहेज क्यों लेते हैं?
आचार्य प्रशांत: कोई किसी का साथ पैसे लेकर के करेगा तो मैं कैसे बोलूँ इस पर? मैं मुश्किल पाता हूँ इस बात को कल्पित करना, उस आदमी की शक्ल को चित्रित करना जो कह रहा है कि, “मैं किसी के साथ हो सकता…

एक-से-एक पिक्चरें रिलीज़ होती हैं; दो-सौ, चार-सौ, छः-सौ करोड़ जा रही हैं, वो तुम्हारी जेब से ही तो जा रहा है। वो छः-सौ करोड़ का बिज़नेस कैसे किया पिक्चर ने? पिक्चरें जो इतना पैसा बनाती हैं उनको देखने फोर्ब्स पाँच-सौ वाले तो आते नहीं, या आते हैं? रेस चार, गोलमाल…

दुनिया अगर ताक़त की भाषा समझती है तो ताक़त अर्जित करो। दुनिया अगर पैसे की बात सुनती है तो पैसा होना चाहिए तुम्हारे पास। हाँ, शर्त बस एक है कि तुम्हारी बात सदा सच्ची रहे। यह ना हो कि पैसा आ गया तो बात में झूठ आ गया।
जितना तुम्हारी…

पैसा ख़ुद कमाना पड़ता है न तो ज़िम्मेदारी अपने-आप आ जाती है। अधिकांश मामलों में जहाँ पर आज हम महिला को शोषक के तौर पर देख रहे हैं, वहाँ बात यह है कि ख़ुद वो कमा नहीं रही है।
पैसा कमाने बाहर अगर निकलो, सड़क पर जाओ तो आटे-दाल का…

देवी जी आईं, बोलीं, “पैसा नहीं है।“
मैंने कहा, "आप का कुछ अपना खाता-वाता नहीं है?" बोलीं, “है।“
“उसमें कुछ नहीं?”

प्रश्नकर्ता: सर, मैं भविष्य में नहीं जीता, वर्तमान में जीता हूँ। लेकिन मैं वर्तमान में देखता हूँ, क्या सफलता, सक्सेस सिर्फ़ पैसे से सम्बंधित है? इज़ सक्सेस रिलेटेड टु ऑनली मनी एंड नथिंग एल्स? क्योंकि मैं वर्तमान में यही देखता हूँ, जब भी किसी को सक्सेसफुल (सफल) होते हुए…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जो आप कमाई की बात कर रहे हैं कि "जो समय बीत रहा है उसमें कमाई क्या करी?" तो, क्या इसका मतलब सिर्फ जो ये षडरिपु हैं, इनसे छुटकारा है?
आचार्य प्रशांत: बस यही, और कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं। असल में, कमाई का और कोई…

प्रश्नकर्ता: गुरुदेव, मैं पूछना चाहता हूँ कि कुछ महापुरुष ध्यान साधना करके मुक्ति पाना चाहते हैं, और कुछ आत्मज्ञान होने के बाद भी बार-बार धरती पर आना चाहते हैं दुनिया के सुधार के लिए, ताकि दुनिया उनका अनुसरण कर सके और सुधार हो सके। तो, दोनों में से कौन-सा ठीक…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैंने अपने जीवन में असफलताओं की पराकाष्ठा को प्राप्त कर लिया है। मेरे सातवें सशस्त्र सीमा बल के साक्षात्कार में असफल होने के बाद अब जीवन काली स्याही हो गया है। अतः मेरे मन में कई बार आत्महत्या के भी ख्याल आए पर इतनी हिम्मत नहीं…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, हमे अपने कैरियर का चुनाव किस आधार पर करना चाहिए? क्या हमें अपना कैरियर अपने व्यक्तित्व के आधार पर चुनना चाहिए या जिसमे रुचि हो और सफलता मिले उस आधार पर?
आचार्य प्रशांत: नहीं, आमतौर पर हम, जिसे कैरियर कह रहे हैं, वो चुनते ही ऐसे…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम! जी मेरा नाम सूरज है और मैं उत्तरांचल का रहने वाला हूँ। अभी मैं चार-पाँच साल से एक जॉब कर रहा हूँ। जो ब्लूटोकाई नाम की कंपनी है उसमें कॉफ़ी का काम होता है। उसमें सर्विंग का काम, होटल उद्योग ये सभी है। तो इसकेे साथ-साथ…

प्रश्नकर्ता: ऐसे जीवन में मौके आते हैं जैसे ग्रेजुएशन (स्नातक) के बाद आया था वैसे ही अभी भी चुनाव करने की स्थिति में हूँ। एक काम से सम्बंधित है कि कुछ काम करना है लेकिन बहुत ज़्यादा स्पष्ट नहीं है, एक आहट है हल्की सी, लेकिन और कोई मुझे ऑप्शन…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं अभी जॉब कर रहा हूँ और घर वालों के हिसाब से, समाज के हिसाब से नौकरी की जो स्थिति है, वो ठीक है, पैसे ठीक-ठाक मिल रहे हैं। पर मुझे संतुष्टि नहीं मिल रही उससे। संतुष्टि काम के मामले में नहीं क्योंकि मैनें देखा है कि…

प्रश्नकर्ता: कुछ सार्थक कर्म करना चाहता हूँ लेकिन आजीविका और भविष्य की चिंता मुझे बहुत सताती है, आजीविका के लिए तो कुछ करना ही होगा न?
आचार्य प्रशांत: तो ठीक है, शरीर है तो शरीर को तो रोटी, कपड़ा देना पड़ेगा न? वह बंदोबस्त करके अलग रख दो। कबीर साहब…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या हमें सिर्फ़ इतना कमाना चाहिए कि जिससे मात्र पेट भर सके? क्या इससे अतिरिक्त पैसा बंधन है?
आचार्य प्रशांत: तुमने कहा ज़्यादा कमाना नहीं; ज़्यादातर लोग ज़्यादा नहीं कमाते। पर वो ज़्यादा क्यों नहीं कमाते? क्या इसलिए कि वो संन्यस्थ हैं? या इसलिए कि तेजहीन हैं,…

प्रश्नकर्ता: जो मेरे संगी-साथी हैं उनसे बातचीत होती है तो वो लोग बताते हैं कि उन्होंने किस तरह से आगे के लिए रुपया-पैसा जोड़ लिया है। और वो ये भी बताते हैं कि उस रुपये-पैसे की आवश्यकता पड़ती ही है, आत्मसम्मान को बचाने के लिए, आगे आने वाले खर्चों को…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम! आपके सानिध्य में मन की ताकत तो बढ़ी है लेकिन पिछले एक सप्ताह में पैसे का काफ़ी नुक़सान हो जाने के कारण थोड़ा विचलित हूँ।
आचार्य प्रशांत: विचलित तो हम सब पैदा ही होते हैं। वो जो छोटा बच्चा पैदा होता है वो क्या आपको शांत,…

प्रश्नकर्ता: बाहर की दुनिया में सबसे ज़्यादा मूल्य ताकत को और नाम-पहचान को दिया जाता है तो ऐसे में सत्य के साधक का ताकत, पावर, और पहचान, प्रसिद्धि या ख्याति के प्रति क्या रवैया होना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: आपको एक मंज़िल तक पहुँचना है और जिस मंज़िल तक आप…

प्रश्नकर्ता: क्या भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज की दिन-प्रतिदिन हो रही दुर्गति का कारण घरों से आध्यात्मिक ग्रंथों का विलुप्त होना है?
आचार्य प्रशांत: हाँ, बिलकुल। देखिए, अगर हम बड़े प्रचलित अर्थों में अर्थव्यवस्था की बात करें तो भारतीय अर्थव्यवस्था की दुर्गति हो नहीं रही है। किसी अर्थशास्त्री से पूछेंगे तो…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी सत्-सत् नमन, आज से एक साल पहले मुझे एक शिविर के द्वारा आपका सानिध्य प्राप्त करने का मौका मिला था। व्यवसाय से मैं एक डेंटिस्ट हूँ, शिविर के पश्चात कुछ महिनों तक मन काफ़ी शांत रहा और यहाँ तक कि अपने व्यवसाय में भी कुछ बदलाव देखने…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आध्यात्मिक दृष्टिकोण से सफल जीवन क्या है? एक इंसान का दुनिया में आने का उद्देश्य क्या है? जीवन की सफलता निर्धारित करने में पैसे का कितना महत्व है?
आचार्य प्रशांत: आध्यात्मिक दृष्टिकोण से सफल जीवन क्या है? यह जानना है तो देखिये कि जीवन असफल कब हो…

प्रश्न: आचार्य जी, युवा लोगों को सबसे पहले अपने करियर (व्यवसाय) पर ध्यान देना चाहिए, या मुक्ति पर ध्यान देना चाहिए? जब अंतिम लक्ष्य मुक्ति है तो क्या उसके बारे में प्रयत्न करते रहना चाहिए या नहीं?
आचार्य प्रशांत: दोनों अलग-अलग आयाम की बातें हैं, बेटा।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं पढ़ना भी चाहता हूँ, लेकिन फिर भी मन नहीं लगता। ऐसा क्यों? क्या करना चाहिए कि पढ़ाई में मन लगे?
आचार्य प्रशांत: क्यों लगे मन?
प्र: परीक्षा पास (उत्तीर्ण) करने के लिए।

खान खर्च बहु अंतरा, मन में देख विचार
एक खवावे साध को, एक मिलावे छार
संत कबीर

वक्ता: छात्रों से अब यह बात कह रहा हूँ| तुम्हें शिक्षक से ऐसे नहीं मिल पायेगा कि तुम वहाँ यह सोच कर जाओ कि देखो मैं तो छात्र हूँ, कॉलेज की फीस देता हूँ, कॉलेज ने कोर्स चलाया है, तो मैं ज्ञान खरीदने जा रहा हूँ| ऐसे नहीं मिल पायेगा|…

वक्ता : बेटा पैसे का वहाँ तक महत्व है, जहाँ तक शरीर का महत्व है।
मंजीत ने कहा, ‘पैसे का कितना महत्व है जीवन में?’ ठीक उतना ही जितना शरीर का है। अगर उससे ज़्यादा महत्व देने लग गए, तो गड़बड़ हो जाएगी। शरीर चलाने के लिए जितना चाहिए पैसे…

प्रश्न: सर, पैसा कितना ज़रूरी है? ग़रीबी क्या है?
वक्ता: जिसको और चाहिए – वो गरीब है। जिसे और नहीं चाहिए- वो अमीर है। जिसे ही और चाहिए, बात सीधी है, जो भी कह रहा है कि और मिल जाए, इसका मतलब है कि वो गरीबी अनुभव कर…

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ग्रेटर नोएडा। जीबीयू में आयोजित एक कार्यक्रम में पहुंचे आचार्य प्रशांत ने कहा कि महाशिवरात्रि केवल अनुष्ठान का पर्व नहीं, बल्कि यह मनुष्य को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने कहा कि शिव को केवल मूर्ति या रूप में सीमित कर देना उनकी व्यापकता को संकुचित करना…



इन सब से मुक्ति का एक ही तरीका है, वो बचो ही नहीं जो मूर्ख जाकर के दुनिया से, जगत से, प्रकृति से कामना पूर्ति की आशा रखता था, वो बचो ही नहीं। उसके अलावा और तुम कितने भी हथकंडे लगा लो, अतीत तो लौट-लौट के बार-बार आएगा और सर पर चढ़ेगा ही चढ़ेगा।

Questioner(Q): What is the process of clarity? Is it just listening with immersion and no resistance? What is Truth? How we decide it?
Acharya Prashant (AP): Listening without effort, plus if there is Truth in what you hear, there is change and transformation, and that Truth becomes the master. We…

प्रश्नकर्ता: पिछली बार चंडीगढ़ तरफ़ से आया था जी,। आप से जुड़ा था। तबजब मैं अकेला आया था, बिलकुल हताश, परेशान था। आज मेरीमेरे साथ श्रीमती जी भी आईं हैं। मेरा प्रश्न यह है जी, जैसे संतों ने कहा है—
प्रेम-गली अति सांकरी, तामे दो न समाहिं। जब मैं था…


Text in the middle to test if 2nd image is considered in truncated. or not
\n\n29 अप्रैल से 1 मई, 2022 तक आयोजित हुए वेदांत महोत्सव के एक प्रतिभागी की प्रेरणास्पद कहानी\n\nमेरा नाम राकेश कुमार है। मैं कानपुर नगर से हूँ। पिछले चार माह से मैं हर…

हम कहते हैं कि अब कुछ नया करते हैं, फ़ूड योगा , मूड योगा * । कोई ऐसा शब्द नहीं है जो अब * योगा के साथ नहीं जोड़ दिया गया है। नई-नई क्रियाएँ निकल रही हैं, नई-नई प्रक्रियाएँ निकल रही हैं। ये मुद्रा, ये आसान, ये करते हैं, वो

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम लोग कुछ भी करने बैठें, जैसे पढ़ने बैठें, योग करें, मैडिटेशन करें, यहाँ तक कि जब मैं आपसे ये सवाल भी पूछ रहा हूँ तो ये सवाल पूछते हुए भी मेरे दिमाग में कुछ और चल रहा है। तो प्रश्न ये है कि मन को नियन्त्रित…

संघर्ष में हम सभी हैं; ज़िंदगी युद्ध तो है ही। दूसरे को क्या दिखाना चाहते हो? अपनी चोट, अपनी हार या अपना हौसला? अपना हौसला दिखाओ न दूसरे को!

लड़कीवाले लड़की देने को राज़ी नहीं होते अगर सरकारी नौकरी नहीं है। और कोई वजह हो-न-हो, वंश चलाने की ख़ातिर हमें यूपीएससी निकालना पड़ेगा। ‘वंश चलाने के लिए यूपीएससी निकालना पड़ेगा!’ यह सब तो तुम्हारे सारे कारण हैं सरकारी नौकरी के पीछे जाने के, नहीं तो और तुम क्यों इतने…

दिल में जिसको बैठाना था उसकी जगह और बहुत कुछ बैठा लिया। अब सरकारी नौकरी का लालच बैठा हुआ है दिल में, क्यों? सब जानते हैं क्यों! गाड़ी मिल जाएगी, सरकारी बंगला मिल जाएगा, कोई निकाल नहीं सकता। कोई निकाल नहीं सकता बड़ा आनंद रहता है, अज़ीम-ओ-शान-शहंशाह। ग्यारह बजे जाओ,…
“फिर?”
“नहीं, वो ए. टी. एम एक ही है, वह उनके पास रहता है।“
मैंने कहा, “ले!”
अपना खाता रखो, और ए. टी. एम का पासवर्ड पतिदेव…
प्र: नौकरी के लिए।
आचार्य: क्यों करनी है…
The UGC regulations are only a spark. The explosive material is something far more intimate: the unexamined conviction, lodged in the deepest chamber of the collective psyche, that birth determines worth and that this determination carries divine sanction. The atmosphere itself is the disease; the regulation is at best a painkiller. India’s foundational scriptures contain the strongest possible arguments against caste. The Upanishadic view begins where hierarchy ends.