प्रश्नकर्ता: कुछ सार्थक कर्म करना चाहता हूँ लेकिन आजीविका और भविष्य की चिंता मुझे बहुत सताती है, आजीविका के लिए तो कुछ करना ही होगा न?
आचार्य प्रशांत: तो ठीक है, शरीर है तो शरीर को तो रोटी, कपड़ा देना पड़ेगा न? वह बंदोबस्त करके अलग रख दो। कबीर साहब कहते हैं कि मन जब आकर भौंके तो उसे रोटी डाल दो। मन को कहते हैं कि यह जो मन है यह काली कुतिया की तरह है, जैसे ही तुम ध्यान में बैठते हो बगल में आकार के भौंकने लग जाती है। यहाँ तुमने भजन शुरू किया, कुतिया ने भौंकना शुरू किया। तो कहते हैं कि ऐसा किया करो कि भजन, ध्यान से पूर्व या उनके समय उसको रोटी डाल दिया करो कि तू अपना काम कर, मगन रह, हमें अपना काम करने दे। जिसको कबीर साहब काली कुकरी कह रहे हैं वह वास्तव में हमारा शरीर है। तन-मन है इसी को वह कह रहें हैं काली कुकरी।
तो इसको एक न्यूनतम तल की सुरक्षा तो चाहिए वह दे दिया करो। देखो बात बिलकुल ठीक है, तुम्हें बहुत दर्द होगा देह में, या पेट खाली होगा, या बहुत ताप होगा, गर्मी लग रही होगी, तुम्हारे लिए बहुत मुश्किल हो जाएगा यहाँ बैठकर मुझे सुनना। यहाँ भी बैठे हो तो मौसम, माहौल, गद्दा, पानी इनका ख्याल रखा गया है। अभी जून का महीना हो और तपती धूप दोपहर में कहा जाए कि, "आ जाओ चौराहे पर बैठेंगे", होगा सत्संग, भजन? नहीं हो सकता। कुछ चीज़ों का ख्याल रखना पड़ता है क्योंकि मिट्टी का पुतला है न? पानी पड़ता है तो गलने लगता है, धूप पड़ती है तो चटकने लगता है।
लेकिन इतना ही बस ख्याल रखो कि न गले, न चटके, यह न हो कि जीवन ही तुमने समर्पित कर दिया माटी के पुतले को। इस बात में बिलकुल कोई बुराई नहीं है कि तुम एक निश्चित धनराशि का प्रबंध करके रखो, इस बात को अध्यात्म के ख़िलाफ मत मान लेना। मैं क्या कभी किसी संत ने नहीं कहा कि यह बात अध्यात्म के ख़िलाफ है। अभी-अभी कबीर साहब की बात बताई न? वो भी कहते हैं कि, "कबीरा इतना दीजिये जामे कुटुम्ब समाए", मेरे लिए भी रहे और जो मेरे आश्रित लोग हैं, कुटुम्बी हैं उनके लिए भी रहे। और फिर आगे यह भी कहते हैं, "मैं भी भूखा न रहूँ, साधु भी भूखा न जाए"। और इतना भी दीजिए कि अगर घर में दस रोटी की आवश्यकता है तो मैं बारह बना पाऊँ। द्वार पर साधू आया है दो रोटी उसको भी देनी हैं।


