
Questioner(Q): What is the process of clarity? Is it just listening with immersion and no resistance? What is Truth? How we decide it?
Acharya Prashant (AP): Listening without effort, plus if there is Truth in what you hear, there is change and transformation, and that Truth becomes the master. We…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक तरफ़़ तो फ़िल्में हमें मनोरंजन देती हैं, हँसाती हैं, रुलाती हैं और दूसरी ओर उसी इंडस्ट्री से दुःखद और चौका देने वाली खबरें भी आती रहती हैं। कुछ कहिए।

यह सब अय्याशियाँ होती हैं, “मन कर रहा है, मन नहीं कर रहा है, आज दिल तन्हा सा है, उदास सा है।“ यह क्या है? मन गया भाड़ में! इधर काम रखा हुआ है, जो ज़रूरी चीज़ है वह करेंगे न, मन का क्या है!

दूसरे आपका हाथ मरोड़ रहे हैं, समझिए क्यों। क्योंकि आप हाथ मरोड़वाने के लिए तैयार खड़े हैं।
धोखा एक बार हो सकता है न, बार-बार हो तो इसका क्या मतलब है? कोई व्यक्ति आपके साथ एक बार दुर्व्यवहार कर गया, ठीक। बार-बार कर रहा है, क्या मतलब है इस बात…

ये तुम्हारी ज़िन्दगी को समझने की उम्र है। कहाँ तुम ये रिश्तेबाज़ी में फँस रही हो? उसके लिए बहुत समय पड़ा है। पहले थोड़ा मन को जान लो, जीवन को जान लो। समझ तो लो तुम्हारे भीतर वो कौन-सी वृत्ति बैठी है जो खिंची जा रही है लड़कों की ओर।…

यही जीवन जीने की कला है, मौज करो, मस्ती करो! गंभीर मत हो जाना। बिलकुल हल्के रहो, क्योंकि रखा क्या है?
आज तुम जिस बात को गंभीरता से लेते हो, कल वो तुम्हारे लिए दो पैसे की हो जाएगी। याद है, जब चौथी-पाँचवी में रिज़ल्ट आया था तो तुम कैसे…

१० साल पीछे जाना और देखना है कि उस समय मन पर कौन से मुद्दे हावी थे, याद करो! कहाँ गए वह मुद्दे? और पीछे जाओ, अब तुम १५ साल के हो, याद करो मन पर कौन से मुद्दे हावी थे, कहाँ गए मुद्दे?
कितने लोगों को दसवीं के बोर्ड…

बताओ प्रतियोगी परीक्षा क्यों दे रहे हो? अगर तुम्हें साफ़-साफ़ पता हो कि तुम क्यों दे रहे हो परीक्षा तो ऐसा कैसे होगा कि तुम फिर उसमें मेहनत नहीं करोगे? या तो मेहनत करोगे पूरी या फिर परीक्षा छोड़ ही दोगे। पर तुम ये कभी पता ही करने की कोशिश…

पढ़ाई में मन नहीं लगता क्योंकि वो पढ़ाई शायद तुम्हारे लिए है ही नहीं। वो पढ़ाई तुम कर ही रहे हो उनके दबाव में जो तुमको एक तरह से स्पॉन्सर कर रहे हैं कि ‘तू घर बैठ, तुझे रोटी-पानी की फ़िक्र करने की अभी कोई ज़रूरत नहीं साल-दो-साल, तू बैठ…

तुम ग़लत राहों को ठुकरा कर तो देखो, सही राह खुलती है कि नहीं खुलती। और यह घटिया और झूठा तर्क बिलकुल मत दे दो कि, “मुझे सही राह मिली नहीं मैं इसलिए ग़लत राह चल पड़ा।“ बात यह नहीं है, सही राह हमेशा खुली होती है और उपलब्ध होती…

तुम मुझे एक आदमी दिखा दो जो इन दोनों कामों के अलावा कोई तीसरा काम करता हो। आम व्यक्ति का सारा जीवन इन्हीं दो कामों में जा रहा है कि नहीं? पहला, ठूसना – और मैं सिर्फ़ मुँह से ठूसने की बात नहीं कर रहा, जेब में ठूसना, आँख में…

"हम इतना प्यार करते हैं उधर से कुछ आता नहीं।" जब यह प्रश्न उठे तो अपने-आप से पूछिए कि, "मैं माँग क्या रही हूँ?"
'आई हियर बाय रिक्वेस्ट यू टू लव मी' (मैं तुमसे मुझे प्रेम करने की प्रार्थना करती हूँ)
"महोदय, सविनय निवेदन है कि कृपया थोड़ा…

जब भी कभी मन में यह प्रश्न आए, “क्या करूँ?” – कोई भी मुद्दा, कोई भी किस्सा हो सकता है, उस किस्से के अंत में अगर प्रश्न है कि, “क्या करूँ?” तो क्या करना है? यह सब अच्छे से समझ लीजिए, जो कर रहे हैं उस पर ग़ौर करना है;…

आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) मूलतः बात ये पूछी है कि “आत्मा को कहा तो निर्गुण जाता है, और निर्गुण का अर्थ हुआ कि कोई एट्रिब्यूट (गुण) नहीं, कोई उपमा-उपाधि नहीं। तो फिर आत्मा को निर्गुण के साथ ही निर्विकार, निर्मल, निराकार, अविनाशी, नित्य, शुद्ध, अजर-अमर इत्यादि क्यों कहा जाता…

हरि है खांड रेत मांहि बिखरी, हाथी चुनी न जाई। कहैं कबीर गुरु भली बुझाई, चींटी होय के खाई।। ~ संत कबीर
आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) कबीर साहब का एक श्लोक भेजा है, कह रहे हैं कि इसका अर्थ बताएँ। और कहते हैं कि “इन्होंने भी नित्य और अनित्य…

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः। छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः।।
जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके सब संशय ज्ञान के द्वारा निवृत्त हो गए हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चलभाव से परमात्मा में स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत मन को प्राप्त…

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः। निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः।।
जिनका मन समभाव में स्थित है, उनके द्वारा उस जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया है, क्योंकि सच्चिदानंदघन परमात्मा निर्दोष और सम है, इससे वे सच्चिदानंदघन परमात्मा में ही स्थित हैं।

प्रश्नकर्ता: बोध क्या है? अबोध कौन है और आत्मबोध कब प्राप्त होता है?
आचार्य प्रशान्त: भाषा की मजबूरी यह है कि उसे वो सब भी कहना पड़ जाता है जो कहा नहीं जा सकता और जिसे कहने की चेष्टा भी नहीं करनी चाहिए। उसमें खूबसूरती तो है पर ख़तरा भी…

आचार्य प्रशांत: आप किसी चीज़ को अस्तित्वमान तभी कह सकते हो जब वो कहीं-न-कहीं ख़त्म होती हो। ये जो दीवार है अगर ये ख़त्म ना हो तो फिर ये दीवार हो नहीं सकती। ये बात सुनने में अजीब लगेगी पर ग़ौर करिए। ये जो दीवार है अगर ये ख़त्म ही…

प्रश्नकर्ता: क्या ऐसा जीवन सम्भव है जिसमें मान्यताओं का कोई भी स्थान ना हो? ना अपने बारे में कोई मान्यता और ना ही दूसरों के बारे में। मैं छवियों में जीती हूँ। ऐसा लगता है जैसे जीवन जीने के लिए, लोगों को परखने के लिए मेरे पास आँखें नहीं हैं,…

प्रश्नकर्ता: मेरी दूसरों पर निर्भरता बहुत है। अगर दूसरे लोग मेरे प्रति अप्रिय व्यवहार करते हैं तो मुझे बहुत बुरा लगता है। यदि किसी का कहा ना मानूँ तो वह व्यक्ति नाराज़ हो जाता है और इससे मैं बहुत प्रभावित हो जाता हूँ। तो ये जो दूसरों से बंधन है…

प्रश्नकर्ता: छह माह पहले जब मैं पहली बार आया था तो बहुत ऊर्जा मिली, लगा कि बहुत गहरे जा रहे हैं, उसका प्रभाव भी दिखा कि डर कम हो गए, लेकिन अब एक ठहराव सा है। अब ऐसे में क्या करना है?
आचार्य प्रशांत: ऐसे में करना है। अभी तक…

प्रश्नकर्ता: वशिष्ठ जी राम जी को कह रहे होते हैं कि, “हे राम! मनुष्य का हाल उसी तरीके से है जो मैं आगे बताने जा रहा हूँ। एक बहुत बड़े जंगल में एक जानवर होता है, बहुत बड़ा जानवर होता है। उसके बहुत बड़े-बड़े पैर होते हैं। बड़े-बड़े हाथ होते…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं यूट्यूब के माध्यम से जुड़ा हूँ आपसे करीब दो साल से। उसके बाद आध्यात्मिकता में थोड़ी रुचि बढ़ी। इन दो सालों में मेरे कुछ नज़दीकी मित्र थे जिनकी मृत्यु हो गई। उसके बाद मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं मर रहा हूँ। तो ये…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मन, बुद्धि और आत्मा में क्या अंतर है?
आचार्य प्रशांत: बुद्धि मन का एक अंग समझ लीजिए और आत्मा सत्य है आपका। मन सो जाता है तो बुद्धि भी सो जाती है। मन के माहौल के अनुसार बुद्धि काम करने लग जाती है, तो बुद्धि छोटी चीज़…

प्रश्नकर्ता: आप कहते हैं कि जीवन में मुक्ति, आनंद और चैन आए उससे पहले बंधनों का, दुःख और बेचैनी का अनुभव अनिवार्य है, पर मेरे जीवन में तो कोई ख़ास दुःख या बेचैनी दिखती नहीं मुझे। तो मैं बेईमान हूँ क्या या सचमुच दुःख है ही नहीं?
आचार्य प्रशांत: समझते…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, मन सही समय पर सही निर्णय ले पाने में अक्षम है और तरह-तरह के लक्ष्यों में भटकता रहता है।
आचार्य प्रशांत: मन बाहर तरह-तरह के लक्ष्यों में इसीलिए भटकता रहता है क्योंकि मन को भीतर यह नहीं पता कि कौन सी एक चीज़ है जो उसको…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी जब मैं आध्यात्मिकता के बारे में किसी और से बात कर रहा होता हूँ तो एक शानदार ऊर्जा शब्दों के माध्यम से बह रही होती है। मैं दो घण्टे लगातार बिना सोचे-समझे बोल रहा होता हूँ। लेकिन जब मैं खुद को प्रतिबिम्बित करता हूँ उन्हीं शब्दों पर,…

प्रश्नकर्ता: संसार में फैलने की उक्तियाँ और विधियाँ तो हमें पता पड़ जाती हैं पर ऊपर उठने की कौन सी विधियाँ हैं? वो कौन से प्रैक्टिसेस हैं जिनसे हम अपने को ऊँचा उठा सकें ?
आचार्य प्रशांत: नहीं, प्रैक्टिसेस कोई नहीं है। अपने दर्द का पता होना चाहिए। जब आप…

प्रश्नकर्ता: हम ऐसा क्यों करते हैं कि बड़े लोगों से हम अपनी तुलना करते हैं जैसे संत कबीर हो गए, आप हो गए, कृष्णमूर्ति जी हो गए, जबकि हमको पता है कि हमारी औकात क्या है, फिर भी?
आचार्य प्रशांत: इसीलिए, क्योंकि तुम्हें पता है कि तुम्हारी क्या औकात है।…

आचार्य प्रशांत: कभी कोई ऐसी समझ आई है जिसको शब्दों में व्यक्त न कर सको? और जिसको शब्दों में व्यक्त कर सको वह ख़्याल है। हमें समझ कुछ नहीं आता, हमारे पास सिर्फ़ निष्कर्ष होते हैं और इसीलिए हम उसको एक वाक्य में अभिव्यक्त कर सकते हैं।
हम कहते हैं,…

प्रश्नकर्ता: क्या भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज की दिन-प्रतिदिन हो रही दुर्गति का कारण घरों से आध्यात्मिक ग्रंथों का विलुप्त होना है?
आचार्य प्रशांत: हाँ, बिलकुल। देखिए, अगर हम बड़े प्रचलित अर्थों में अर्थव्यवस्था की बात करें तो भारतीय अर्थव्यवस्था की दुर्गति हो नहीं रही है। किसी अर्थशास्त्री से पूछेंगे तो…

प्रश्नकर्ता (प्र): आचार्य जी, जैसे हमारी संस्कृति है, सनातन धर्म है वो कहता है कि सबसे पहले जीवन में धर्म होना चाहिए और जब धर्म होगा तो उसी से फिर अर्थ, काम और मोक्ष भी होगा। जैसे मेरे व्यक्तिगत जीवन में सत्य बोलना धर्म है, तो सामान्य और व्यापक रूप…

आचार्य प्रशांत: यदि प्राणी हृदय से संचालित है तो वो वास्तव में परम स्रोत से ही संचालित है; पर ये शर्त बड़ी है कि उसे हृदय से संचालित होना चाहिए। जब वह हृदय से संचालित होता है तो इन्द्रियाँ वैसी हो जाती हैं जैसी श्रीकृष्ण भगवद्गीता में कहते हैं, कि,…

प्रश्नकर्ता: जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय ये चार अवस्थाएँ क्या हैं?
आचार्य प्रशांत: इसका जो शास्त्रीय तरीक़ा है बताने का, शुरुआत वहाँ से करेंगे। दस तो मानी गई हैं इंद्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ। और उसके अलावा होता है अन्तःकरण। अन्तःकरण क्या? अन्तःकरण चतुष्टय, जिसमें चार आते हैं। कौन…

आचार्य प्रशांत: पूरे अस्तित्व की जहाँ से शुरुआत होती है। इस दुनिया में ही जो बिल्कुल प्रथम बिंदु है, ये याद रखना है कि उनसे भी श्रेष्ठ कोई है। तो पहले तो मन को ऊँचा-ऊँचा-ऊँचा, और ऊँचा, और ऊँचा उठाओ, अधिकतम और उच्चतम, जहाँ तक मन को ले जा सकते…

आचार्य प्रशांत: क्षेत्रज्ञ क्या? साक्षी क्या? समझते हैं। क्षेत्रज्ञ का सम्बन्ध निश्चित रूप से, किसी क्षेत्र से ही होगा। 'क्षेत्रज्ञ' माने क्षेत्र का ज्ञाता। अच्छा, किस क्षेत्र की बात हो रही है? वो जो क्षेत्र है, वो हमारे अनुभव का क्षेत्र है। ठीक है? जो कुछ भी अनुभूत है, जो…

आचार्य प्रशांत: मन में सब कुछ विनाशी है पर कामना बहुत है मन को अविनाशी की। मन अज्ञान से भरा हुआ है, उसी को अंधकार कहते हैं पर कामना बहुत रहती है हमको ज्ञान की, प्रकाश की। देखा है कितने सवाल पूछते हैं हम? देखा है छोटा बच्चा भी इधर-उधर…

आत्मा ब्रीति निश्चित्य भावाभावी च कल्पिती।
निष्कामः कि विजानाति किं ब्रूते च करोति किम्॥
~ अष्टावक्र गीता

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सत्र से पहले आपसे जो बात हुई थी उसमें आपने कहा था कि जो उपनिषदों के श्लोक हैं, उपनिषदों में जो बात कही जाती है, आप उसको तथ्य की तरह देख पाते हैं; मगर हमारे लिए तो ये एक सिद्धांत की तरह है। और वैसे ही, हमारी…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आज दोपहर में बुल्लेशाह जी की काफ़ियाँ गा रहे थें, और गाते-गाते हम बहुत रम गए, और मन बहुत शुद्ध होता सा महसूस हुआ; और जब से यहाँ पर हैं तब भी बहुत मन शुद्धता महसूस करता है। तो एक बात, जब अवलोकन लिख रहे थे, तो…

प्रश्नकर्ता: भावनाओं से अनछुए नहीं रह पाती हूँ। विवेक कहता है कि भावनाओं को देखो, उनसे प्रभावित नहीं हो लेकिन फ़िर भी मैं प्रभावित हो जाती हूँ। कभी चिल्ला देती हूँ, कभी रो देती हूँ, तो इससे कैसे निजात पाएं कि मन एकदम स्थिर हो जाए।
आचार्य प्रशांत: दो तरीके…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मन के बारे में बहुत बोला जाता है कि मन चंचल है, ये है, वो है, लेकिन अगर हम मूल की बात करें तो मन क्या है, क्या वह बुद्धि है या अहंकार? जब हम पैदा हुए, तब से लेकर अब तक की जो याददाश्त है, वो…

क्यों देश-विदेश फिरे मारा क्यों हाल-बेहाल थका हारा क्यों देश-विदेश फिर मारा तू रात-बीरात का बंजारा ओ नादान परिंदे घर आजा घर आजा… घर आजा… घर आजा आ आ… नादान परिंदे घर आजा…
~ फ़िल्म (रॉकस्टार)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, संस्कृत भाषा का महत्व क्या है?
आचार्य प्रशांत: आध्यात्मिक साहित्य सारा संस्कृत में है। अंग्रेज़ी व्यापार की भाषा है। और भाषा सिर्फ़ भाषा नहीं होती, भाषा एक पूरा संस्कार होती है। अगर किसी के मन पर अंग्रेज़ी छा गई है तो उसका मन व्यापारी हो जाएगा, गणित…

प्रश्न: आजकल यूट्यूब और आम ज़िन्दगी में गालीगलौज इतनी क्यों बढ़ गई है? कारण क्या है? अभी यूट्यूब और टिकटॉक पर पिछले कुछ दिनों से एक वीडियो वायरल हो रहा है जो गालियों से ही भरपूर है, उसमें और कोई मुद्दे की बात की नहीं गई है।
आचार्य प्रशांत: बेटा,…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं उपनिषद् पढ़ रहा था, तो उसमें मन को एकाग्र करने की बात स्पष्ट नहीं हुई। हमें मन को कहाँ एकाग्र करना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: मन जब भी एकाग्र होना चाहता है तो वो किसी वस्तु की तलाश करता है, किसी छवि की तलाश करता है। जब…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मन को कैसे संयमित करें?
आचार्य प्रशांत: हम आमतौर पर ‘संयम’ का अर्थ समझते हैं धैर्य से, या नियंत्रण से। अच्छा शब्द आपने प्रयोग किया है–‘संयम’। पतंजलि योग-सूत्र में आप जाएँगे तो पाएँगे कि ‘संयम’ का अर्थ है मन को किसी विषय में दृढ़ता से स्थापित कर…

प्रश्न: आचार्य जी प्रणाम! मेरा प्रश्न कि – मन तो कैसे एकाग्र रखें? मैं कोई एक विषय पढ़ता हूँ तो दूसरे विषय में चला जाता हूँ। मन को कैसे एकाग्र रखूँ?
आचार्य प्रशांत: क्यों पढ़ते हो?
प्रश्नकर्ता: पढ़ाई में आगे बढ़ने के लिए।

प्रश्न: मन सही लक्ष्य से क्यों भटक जाता है? जीवन के लक्ष्य के प्रति हमेशा एकनिष्ठ कैसे रहें?
आचार्य प्रशांत: प्रेम।
कामना इतनी तीव्र होनी चाहिए कि एक पल को भी भूलो नहीं, कुछ और याद ही न आए। अपनी पीड़ा के प्रति बड़ी संवेदनशीलता होनी चाहिए। तुम्हें पता होना
आचार्य प्रशांत: सबसे पहले तो हमें इस धारणा से बाहर आना होगा कि फ़िल्में हमें मात्र मनोरंजन…
मनचलों के लिए दुनिया की…
अनुवाद: आत्मा ही ब्रह्म है और भाव - अभाव कल्पित हैं, ऐसा निश्चय होते ही निष्काम ज्ञानी फिर क्या जाने, क्या कहे, क्या करे?
अचार्य प्रशांत: जो…