प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, मन सही समय पर सही निर्णय ले पाने में अक्षम है और तरह-तरह के लक्ष्यों में भटकता रहता है।
आचार्य प्रशांत: मन बाहर तरह-तरह के लक्ष्यों में इसीलिए भटकता रहता है क्योंकि मन को भीतर यह नहीं पता कि कौन सी एक चीज़ है जो उसको चाहिए। बाहर जितने भी लक्ष्य बनाते हो, बाहर जितनी भी चीज़ें आकर्षित करती हैं वह भीतर बैठे किसी चीज़ का प्रतिबिंब होती हैं।
अगर भीतरी तौर पर यह नहीं पता है कि कौन सी चीज़ जीवन में कीमती है तो बाहर भी कौन सी चीज़ कीमती है, क्या पाना चाहिए, किस लक्ष्य के पीछे समय, जीवन, ऊर्जा लगानी चाहिए यह स्पष्ट नहीं होगा। पर कुछ-न-कुछ तो करना ही है। मन, शरीर, ज़िंदगी यह सब गति के ही नाम हैं तो फिर उल-जलूल और अस्थाई लक्ष्यों के पीछे आदमी भागने लग जाता है। समझ में आ रही है बात?
पता नहीं है कि बाहर क्या चाहिए, किसकी तरफ बढ़े और चूँकि जीवन है तो एक जगह खड़े भी नहीं रह सकते तो फिर व्यक्ति किसी भी उटपटांग दिशा में बढ़ने लग जाता है और दिशा चूँकि मूल्यहीन है, व्यर्थ है तो उसकी तरफ बहुत देर तक चल भी नहीं पाता है। थोड़ी देर में रास्ते बदल कर, लक्ष्य बदल कर, मन बदल कर किसी और तरफ देखने लग जाता है, उधर को बड़ लेता है। और सवाल हम यही पूछते हैं कि हमें अपना लक्ष्य बाहर का पता नहीं चल रहा।
इसमें जो मूल सिद्धांत हैं उस पर ध्यान दो। बाहर तुम क्या लक्ष्य बनाते हो यह इस पर निर्भर करता है कि भीतर तुम किस चीज़ को मूल्य देते हो। सीधी सपाट बात है। और बाहर अगर तुम्हारे पास तीस-चालीस-पचास लक्ष्य हैं जो बनते बिगड़ते रहते हैं तो इसका अर्थ यह है कि भीतर भी तुम पचास चीज़ों को मूल्य देते हो और उन पचासों चीज़ों में से किसी भी एक चीज़ को बहुत मूल्य नहीं देते, पूरा मूल्य नहीं देते।



