प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सत्र से पहले आपसे जो बात हुई थी उसमें आपने कहा था कि जो उपनिषदों के श्लोक हैं, उपनिषदों में जो बात कही जाती है, आप उसको तथ्य की तरह देख पाते हैं; मगर हमारे लिए तो ये एक सिद्धांत की तरह है। और वैसे ही, हमारी बात जब चेतना के ऊपर हुई थी, कि हमारा वास्तविक स्वरूप जो है वो चेतना है, तो उसमें आप ने ये कहा था कि “निरंतर अभ्यास से ही ये बात अपने अंदर बैठ जाती है कि आपका स्वरूप जो है, वास्तव में चेतना ही है।" तो ये एक तरीके से एफर्मेशन (अभिपुष्टि) से कैसे अलग है ये? वैसा ही कुछ तो नहीं है?
आचार्य प्रशांत: नहीं एफर्मेशन नहीं है, प्रयोग है।
एफर्मेशन तो होता है कि तुमने कोई निष्कर्ष बस मान लिया है और तुम उसे बार-बार दोहरा रहे हो, वो तो कंडीशनिंग (अनुकूलन) हो गई। ये प्रयोग है; कि बार-बार, बार-बार कोई प्रयोग करा, भले ही वो प्रयोग तुम्हारी वृत्तियों के कितना भी विरुद्ध हो, भले ही वो काउंटर इंट्यूटिव (वृत्तियों के विरुद्ध) क्यों न हो, पर इतनी बार वो प्रयोग करा कि अंततः वो प्रयोग बिलकुल मन में जम गया। तरीके-तरीके से अपने आपसे पूछा, कि, “शरीर हूँ मैं कि चेतना हूँ मैं?” दिन में सौ-बार पूछा। और ऐसे नहीं पूछा कि पहले ही उत्तर पता है; कि पूछूँगा और फिर कहूँगा, “मैं तो चेतना हूँ," ऐसे नहीं। बिलकुल पूर्वाग्रह-रहित होकर के पूछा, “अच्छा! कौन हूँ मैं? चलो एक नया प्रयोग करके देखते हैं।"
चलो अभी एक नया प्रयोग करके देखते हैं, ठीक है? कहीं दर्द हो रहा है शरीर में?
प्र: हाँ, पीठ में।



