इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः। निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः।।
जिनका मन समभाव में स्थित है, उनके द्वारा उस जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया है, क्योंकि सच्चिदानंदघन परमात्मा निर्दोष और सम है, इससे वे सच्चिदानंदघन परमात्मा में ही स्थित हैं।
—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ५, श्लोक १९
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने कहा है कि “जिनका मन समभाव में स्थित है, उनके द्वारा उस जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया है, क्योंकि सच्चिदानंदघन परमात्मा निर्दोष और सम है, इससे वे सच्चिदानंदघन परमात्मा में ही स्थित हैं।“ इसे अपने जीवन में कैसे उतारें?
आचार्य प्रशांत: समभाव का अर्थ है – कोई ऐसा भाव जिसके विपरीत ना जाना पड़े, कोई ऐसा भाव जो इतना आकर्षक हो और इतना विराट हो कि तुम्हें पूरा ही सोख ले अपने में, तुम्हें उससे हट करके किसी और भाव की ज़रूरत ना पड़े।
चलो समझो। संसार में जो कुछ भी करते हो, उसे चलाए रखने के लिए तुम्हें उसके विपरीत की शरण में जाना होता है। जो पढ़ाई करते हैं, वे बोलते हैं कि पढ़ाई बहुत हो गई, अब ज़रा बाज़ार घूमकर आते हैं, थोड़ा खेलकर आते हैं—पढ़ाई करनी है तो बाज़ार जाना पड़ेगा। तुमने किसी दिन दस-बारह घण्टे पढ़ाई कर ली या तीन-चार दिन ऐसे हो गए कि दस-बारह घण्टे काम कर लिया, तो फ़िर दूसरे दिन, चौथे दिन, दसवें दिन तुम यह कहते हो कि, “आज आराम, या कि आज थोड़ा कहीं पर मन बदलकर आते हैं, टहलकर आते हैं।“





