आचार्य प्रशांत: कभी कोई ऐसी समझ आई है जिसको शब्दों में व्यक्त न कर सको? और जिसको शब्दों में व्यक्त कर सको वह ख़्याल है। हमें समझ कुछ नहीं आता, हमारे पास सिर्फ़ निष्कर्ष होते हैं और इसीलिए हम उसको एक वाक्य में अभिव्यक्त कर सकते हैं।
हम कहते हैं, "मुझे समझ में आया कि ये सब कुछ दिव्य है, मुझे समझ में आया कि अभी मैं अपना मालिक हूँ, मुझे समझ में आया कि"—कुछ-न-कुछ होता है न? जो 'कि' के बाद होता है वह क्या होता है? वह विचार है, वह निष्कर्ष है।
हमारी समझ कभी समझ होती ही नहीं है, समझ का मतलब होता है निष्कर्षों का विलोप। जब तक तुम्हें लग रहा है कि तुम्हें समझ में आया तब तक तुम्हें कुछ समझ नहीं आया। वास्तविक समझ बड़ी अदृश्य घटना होती है। वह चुपचाप होती है। तुम्हें नहीं पता लगेगा कि तुम्हें समझ में आ रहा है।
हाँ, तुम्हें समझ के परिणामों से पता लगेगा कि कुछ हुआ है। बाद में तुम पाओगे कि मन ज़रा शांत-सा हो गया है, आसानी से प्रतिक्रिया नहीं कर रहा, दुनिया के रंग ही जैसे कुछ बदल गए हों। यही पेड़ होते हैं बारिश के बाद कैसे लगते हैं? पेड़ वही हैं रंग बदल गए। होता है न? अभी यही बारिश हो जाए देखना ये सब बदल जाएगा। समझ का प्रभाव ये होता है। समझ को मात्र उसके प्रभावों से जाना जा सकता है, समझ को समझ कर नहीं जाना जा सकता। जहाँ प्रभाव पाओ वहाँ जान लेना कि पीछे समझ मौजूद है। जहाँ प्रभावों को पाओ वहाँ पर मुस्कुराकर मान लेना कि, "अच्छा! तो पीछे समझ मौजूद है" तभी तो ये प्रभाव आ रहे हैं, नहीं तो आ ही नहीं सकते थे।
समझदारी के चक्कर में मत पड़ो समझदारी बड़ी गड़बड़ चीज़ है। इसीलिए तो कहता हूँ चुपचाप सुना करो, कोशिश ही मत किया करो समझने की। चुपचाप सुन लो, बाद में कोई पूछे भी कि, "क्या समझ में आया?" तो बुद्धू की तरह मुँह बना देना, "कुछ समझ में नहीं आया!" या बस ऐसे (भौचक्का होकर) उसका मुँह देखना कि, "ये कोई पूछने वाली बात है कि क्या समझ में आया? हम समझने थोड़ी गए थे, हम तो सुनने गए थे। बैठे, सुने, आ गए।" समझ काम है समझाने वाले (परमात्मा) का, तुम्हारा काम नहीं है समझना। तुम्हारा काम है सुनना, तुम पूरी तन्मयता से सुनो।



