
अध्यात्म की रोशनी जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ती है, तो राजनीति पर भी पड़ेगी ही पड़ेगी। ऐसा कुछ नहीं है कि आध्यात्मिक आदमी राजनीति के प्रति अंधा हो जाता है। बल्कि हक़ीक़त तो यह है कि राजनीति को आध्यात्मिक लोगों की बहुत सख़्त ज़रूरत है, क्योंकि राजनेता ताक़त की ऐसी गद्दियों पर बैठते हैं, जहाँ से वो आपके जीवन को बहुत तरीके से प्रभावित करते हैं। राजनेता अगर आध्यात्मिक नहीं है, तो देश रसातल में जाएगा। राजनीति त्यागनी नहीं है, सही राजनीति करनी है।https://acharyaprashant.org/en/articles/raajneeti-mein-adhyatm-kyon-zaroori-1_795988a15

एक साधारण-सी दिखने वाली लड़की हो, स्कूल में या कॉलेज में वो जब पढ़ाई करेगी, ऊँचा स्थान लाएगी, या खेलों में जीतकर दिखाएगी या किसी और क्षेत्र में अपना हुनर दिखाएगी, उसको तब जाकर के कुछ ध्यान, कुछ अटेंशन मिलेगा। और जो सुंदर लड़की होगी वो कुछ नहीं, वो एक…

हम दूसरे की ज़िंदगी में घुसकर के उसको शांत नहीं करते, जो थोड़ी बहुत शांति उसके पास रही भी होती है पहले से, हम उसकी वो शांति भी लूट लेते हैं; मैं इसलिए कह रहा हूँ कि मत घुसो दूसरे के जीवन में।
तुम अगर वाकई ईमानदारी से यह सोचते…

जो अपनी ग़लती स्वीकारेगा नहीं, उसकी सज़ा ये होगी कि वही अपनी ग़लती दोहराएगा। ग़लती स्वीकार लो, ग़लती से मुक्त हो जाओगे। दूसरों को दोष देते रहोगे, मानोगे ही नहीं कि ग़लती तुमने करी तो उसी ग़लती को बाध्य हो जाओगे दोहराने के लिए। ग़लती मानना बड़ी बहादुरी का काम…

प्रश्नकर्ता: बोध क्या है? अबोध कौन है और आत्मबोध कब प्राप्त होता है?
आचार्य प्रशान्त: भाषा की मजबूरी यह है कि उसे वो सब भी कहना पड़ जाता है जो कहा नहीं जा सकता और जिसे कहने की चेष्टा भी नहीं करनी चाहिए। उसमें खूबसूरती तो है पर ख़तरा भी…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं नौवीं कक्षा में था तब से ओशो को, एक बुक (पुस्तक) मिली थी मुझे लाइब्रेरी (पुस्तकालय) में गाँव के, तब से मैं पढ़ रहा हूँ उनको। फिर मेरी सरकारी नौकरी लगी तो मुझे लगा कि नौकरी से सब अच्छा हो जाएगा और मैं अध्यात्म को और…

आचार्य प्रशांत: आप किसी चीज़ को अस्तित्वमान तभी कह सकते हो जब वो कहीं-न-कहीं ख़त्म होती हो। ये जो दीवार है अगर ये ख़त्म ना हो तो फिर ये दीवार हो नहीं सकती। ये बात सुनने में अजीब लगेगी पर ग़ौर करिए। ये जो दीवार है अगर ये ख़त्म ही…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम एक बोधपूर्ण जीवन जी सकें और मान्यताओं से प्रभावित ना हों इसके लिए सांसारिक ज्ञान ज़्यादा आवश्यक है या आध्यात्मिक ज्ञान?
आचार्य प्रशांत: अलग-अलग नहीं हैं दोनों भाई! बाहर से अलग हैं, अंदर से एक हैं। असल में जिसको आध्यात्मिक ज्ञान भी कहते हो, वो क्या…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपको ज्ञान कब प्राप्त हुआ?
आचार्य प्रशांत: ज्ञान किसी पल में घटने वाली कोई घटना नहीं है कि "एक सितंबर को शाम साढ़े-चार बजे ज्ञान हुआ"। ज्ञान लगातार होता रहता है, अनवरत प्रक्रिया है जिसका कोई अंत नहीं।

प्रश्नकर्ता: आध्यात्मिक भ्रांतियाँ जो पुस्तक है उससे सवाल है। "अगर अज्ञान आँखों का अंधकार है तो ज्ञान है आँखों का अंधापन।"
आचार्य जी, जिस ज्ञान से मैंने इतना सबकुछ जाना है, आपको जानने का प्रयास किया है, सत्य को जानने का प्रयास कर रहा हूँ। अहम् क्या है और वहम…

प्रश्नकर्ता: छह माह पहले जब मैं पहली बार आया था तो बहुत ऊर्जा मिली, लगा कि बहुत गहरे जा रहे हैं, उसका प्रभाव भी दिखा कि डर कम हो गए, लेकिन अब एक ठहराव सा है। अब ऐसे में क्या करना है?
आचार्य प्रशांत: ऐसे में करना है। अभी तक…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, मैं ये पूछना चाहता हूँ कि आज के समय के लिए भक्ति उचित है कि ज्ञान? भक्ति मार्ग या ज्ञान मार्ग?
जितना मुझे समझ में आया है, जो शायद ग़लत हो। भक्ति से आजकल समझ में आता है कि नाम लेना, मंदिर जाना या मंत्र आदि…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, जब मैं शिविर के लिए आ रहा था तब ऐसा लग रहा था कि बहुत समस्या है, लेकिन यहाँ पर आकर जब बोला गया कि प्रश्न पूछ सकते हैं आचार्य जी से तो ऐसा हो रहा था कि कोई प्रश्न सामने ही नहीं आ रहा है।…

प्रश्नकर्ता: अगर पुनर्जन्म नहीं होता तो ईश्वर ने किस आधार पर किसी को अमीर और किसी को गरीब घर में पैदा किया है?
आचार्य प्रशांत: आप अपना जो वैल्यू सिस्टम है वो किसी ईश्वर के ऊपर क्यों आरोपित या इम्पोज़ कर रहे हो? आपके हिसाब से अमीर होना बहुत बड़ी…

प्रश्नकर्ता: प्रकृति हमें क्या सिखाती है?
आचार्य प्रशांत: कुछ सिखाती नहीं है, बस है। आप प्रकृति की बात कर रहे हैं। प्रकृति से तो यही जान लीजिए कि आपके भीतर जो प्रकृति बैठी है, वो बिलकुल वैसी ही है जैसे ये पेड़-पौधे, जानवर।

नाहं कालस्य, अहमेव कालम्। ~ नारायण उपनिषत
आचार्य प्रशांत: तथ्य तो ये है कि स्थान और समय सिर्फ़ दिमाग की उपज हैं। जगह और समय यहीं पर हैं, कहीं और नहीं। हमको ये लगता है कि समय बह रहा है, एक नदी की तरह और हम उसमें हैं। तुम्हें लगता…

प्रश्नकर्ता: ओशो ने जाति-स्मरण के बारे में काफ़ी बोला है। वे अपने शिष्यों को बोलते थे कि तुम जाति- स्मरण में जाओ, उससे तुम्हें साधना में मदद मिलेगी।
जाति-स्मरण क्या है और इसमें कैसे जाया जाए?
आचार्य प्रशांत: कल वो कुत्ता हमारे साथ बाहर निकला, बाकी सबने उसपर भौंकना शुरू

प्रश्नकर्ता: एक सवाल था। बेवकूफ़ी वाला है।
आचार्य प्रशांत: बड़ा वाला सवाल है! गम्भीरता देख रहे हो? पहले ही बता देंगे कि बेवकूफ़ी वाला सवाल है।
प्र: आचार्य जी, मैंने किताबें कुछ ज़्यादा पढ़ी नहीं हैं। कहीं से कुछ मिल जाता है तो, कभी कुछ चीजें ध्यान करते हुए अपने…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। ओशो ने हमें ध्यान की विधियाँ दी, आप वो भी छीन रहे हैं। अब हम क्या करें?
आचार्य: नहीं, मैं छीन नहीं रहा विधियाँ। मैं कह रहा हूँ कि विधियों को विधियों जितनी ही महत्ता दो, बस। विधि द्वार है। द्वार को द्वार जितनी ही अहमियत…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं जिसके प्रेम में हूँ उसका मन बहुत अशांत रहता है, उसकी वजह से मैं अशांत हो जाती हूँ तो इससे कैसे निजात पाया जाए?
आचार्य प्रशांत: अपने प्रेम में से स्वार्थ कम करते जाओ। तुम प्रेम में हो, यही सबसे बड़ा इलाज है। और किसी ईलाज…

व्यामोहमात्रविरतौस्वरूपादानमात्रतः।
वीतशोका विराजन्ते निरावरणदृष्टयः ॥६॥
अनुवाद: अज्ञान मात्र की निवृत्ति होते ही, तथा स्वरूप का बोध होते ही, दृष्टि का आवरण भंग हो जाता है और तत्वज्ञ पुरुष शोकरहित होकर शोभायमान होते हैं।

प्रश्न: आचार्य जी, क्या पुनर्जन्म होता है?
आचार्य प्रशांत जी: किसका?
किसका?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आज के समय में हमारे जीवन में रोल-मॉडल (प्रेरणास्रोत) अनुपस्थित हैं। घर में, ऑफिस में, ऐसा कोई नहीं दिखता जिसको मैं अपना रोल-मॉडल मान सकूँ।
आचार्य प्रशांत: रोल-मॉडल (आदर्श) क्यों नहीं हैं? रोल-मॉडल, जैसा युग है वैसे ही हैं। कौन कह रहा है कि रोल-मॉडल नहीं…

प्रश्न: आचार्य जी, प्रणाम! तत्व-बोध एवं आत्म-बोध में शंकराचार्य जी द्वारा ब्रह्म को निराकार, गुणातीत आदि बताया गया है। परन्तु उनके द्वारा स्थापित आश्रमों को शक्तिपीठ कहा जाता है, तथा उनके द्वारा ‘शिव’, विष्णु आदि पर भी श्लोकों की भी रचना की गयी है।
कृपया उपरोक्त सम्बन्ध में मार्ग-दर्शन की…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरी मृत्यु के बाद मेरी आत्मा का क्या होगा?
आचार्य प्रशांत:
आत्मा के साथ कभी कुछ नहीं होता। आत्मा अद्वैत है। कौन आएगा उसके साथ कुछ करने, जब दूसरा कोई है ही नहीं?

प्रश्नकर्ता: ख़ुद को बदलना अगर आवश्यक लेकिन असंभव लगता हो तो?
आचार्य प्रशांत: मान लो कि असंभव है।
प्र: लेकिन वो हल नहीं है। बहुत सारी परेशानियाँ हो रही हैं।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अभी आपने कहा था कि जो विपरीत पर खड़ा है वो हमेशा पहचानेगा कि राजनीति क्या चल रही है या ये सब। पर ऐसा हम सुनते हैं न कि जो भोला रह जाता है उसका ज़माना भी नहीं रहता। तो अगर हम अपने ऑफिस में ही हैं…

वक्ता: मन का ये बड़ा ही शातिर खेल होता है कि जिस भी चीज़ से उसे डर लगता है, वो उसे इमप्रैक्टिकल लेबल कर देता है और फिर कहता है कि, ‘’ये कार्य किया नहीं जा सकता क्योंकि ये इमप्रैक्टिकल है’’ कार्य इमप्रैक्टिकल है या तुमने उसे ऐसा लेबल दे…

बिरहिन ओदी लाकड़ी, सकुचे और धुन्धाये ।छुटी पड़ी यह बिरह से, जो सगरी जली जाये ।।
~ संत कबीर
वक्ता: नियति तो उसकी जलना ही है। और नहीं जलेगी तो इतना ही करेगी कि, खूब धुआं देगी। कोई रोशनी नहीं, कोई ऊष्मा नहीं, सिर्फ़ धुआं। गंदगी फैलाएगी। जलेगी,

‘तुम अपने थे, अब पराये हो गए हो’, ऐसा कोई क्यों बोलता है?
वो ‘पराया’ है, इसलिए बोलता है!
पहले छुपा-छुपा परायापन था, अब दिखा-दिखा परायापन है। जो पहले परोक्ष था, अब समक्ष है, प्रत्यक्ष है। परायापन सदा से था, अपनेपन का पर्दा था, अपनेपन का भ्रम था। कई बार

माया दो प्रकार की, जो जाने सो खाए|
एक मिलावे राम से, दूजी नरक ले जाए||
~संत कबीर

प्रश्नकर्ता: सर, जब आपसे पहली बार मिला था तो उस समय जीवन में बहुत परेशानियाँ थीं। अनुकम्पा थी कि आपसे मिल पाया। उसी कारण उस समय बातें भी समझ आती थीं। पर मन अभी डरता है, कि जीवन ध्यान से देख तो रहा हूँ न, कहीं कुछ छूट तो नहीं…

प्रश्न: कुछ महीने पहले जीवन की हर गतिविधि के प्रति उत्तेजना थी, अब नहीं है, समझ नहीं पा रहा हूँ कि चल क्या रहा है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि सब पता है लेकिन बार-बार सवाल उठता है, ”क्या मैं इतना कमज़ोर हूँ जीवन को जानने के लिए? मैं ख़ुद…

वक्ता : कबीर एक न जन्या, तो बहु जनया क्या होई।
एक ते सब होत है, सब ते एक न होई।।
– संत कबीर

उद्धरण: अपने साथ सहजता से रहो; ये स्वीकार करना बहुत ज़रूरी होता है कि, ‘मैं तो ऐसा ही हूँ।’ जब ये स्वीकार शुरू हो जाता है कि मेरी हालत ऐसी ही है तब फिर बदलाव आने लग जाता है। बड़ी अजीब बात है—जो बदलाव लाने की कोशिश करता है वो…

उद्धरण: आप मान्यताओं को ही आधार बनाते हो। पहले तो आप यह घोषित करते हो कि आपकी मान्यताएं यथार्थ हैं और फिर उन मान्यताओं को आधार बनाकर आप कुछ और आगे का तूफानी सवाल करते हो। जो मुमुक्षु मन होता है वो जिज्ञासाओं की बुनियाद पर खड़ा होकर आगे नहीं…

वक्ता: तुम्हारे अतीत की जितनी सभ्यताएँ रही हैं, संस्कृतियाँ रही हैं, वो निकली तो अँधेरे से ही हैं। आदमी था तो बंदर ही न? उसी बंदर ने धीरे-धीरे करके जानना शुरु किया। शुरु में उसके जानने का हिसाब-किताब वैसा ही था जैसा किसी भी बंदर का हो सकता है। आधा-अधूरा।…

प्रश्न: सर, उदाहरण के लिए दो व्यक्ति हैं, दोनों भाई हैं। एक इंजीनियर बनता है और दूसरा पढ़ा-लिखा नहीं है और ऑटोरिक्शा चलाता है। दोनों ही व्यक्ति एक ही घर में पैदा हुए, दोनों भाई हैं, माँ-बाप एक ही हैं। लेकिन एक इंजीनियर बन गया और एक नहीं बना।…

पढ़ा, सुना, सीखा सभी, मिटी न संशय शूल। कहें कबीर कैसों कहूँ, यह सब दु:ख का मूल।।
~ संत कबीर
आचार्य प्रशांत: पढ़ने, सुनने, सीखने के बाद भी एक संशय बच जाता है। एक ही संशय होता है। और वह संशय सदा यही होता है कि "क्या यह मेरे लिए

श्रोता: सर, हमारी क्लास में एक एक्टिविटी हुई थी, ‘हु ऍम आई?’| उसमें हमने आइडेंटिफिकेशन के बारे में जाना था| उसके अंत में यही समझ आया था कि हम जिससे भी अपनी पहचान रखते हैं, हम वो नहीं हैं| उसके बाद एक दूसरी एक्टिविटी हुई, ‘आई इन आइडेंटिटीज़’,…

तवैवाज्ञानतो विश्वं त्वमेकः परमार्थतः। त्वत्तोऽन्यो नास्ति संसारी नासंसारी च कश्चन॥ -अष्टावक्र गीता (१५.१६)
अनुवाद: अज्ञानवश तुम ही यह विश्व हो पर, ज्ञान दृष्टि से देखने पर केवल एक तुम ही हो, तुमसे अलग कोई दूसरा संसारी या असंसारी किसी भी प्रकार से नहीं है।

*सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।*मुनेर्जानत आश्चर्यं ममत्वमनुवर्तते॥
– अष्टावक्र गीता(३.५)
वक्ता: जब उस योगी ने जान ही लिया है कि वही समस्त भूतों में निवास करता है और समस्त भूत उसमें हैं, तब ये बड़े आश्चर्य की बात है कि अभी भी उसमें ममत्व बचा है। जिस मुनि ने यह

प्रश्न: सर, ईगो(अहंकार) और सेल्फ-रेस्पेक्ट(स्वाभिमान), ये दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं, या ये सिर्फ हमारे सोचने के ऊपर है?
वक्ता: ‘सेल्फ-रेस्पेक्ट’ तो बाद में आता है। हम जिसको रेस्पेक्ट ही कहते हैं, वही क्या है? तुम किसी की इज्ज़त करती हो उस बात का अर्थ क्या होता है? ध्यान से बताना।…

प्रश्नकर्ता: ब्रह्मचर्य क्या होता है?
आचार्य प्रशांत: ब्रह्मचर्य के दो अर्थ होते हैं। जो ज़्यादातर लोग जानते हैं वो ये होता है कि संभोग (सेक्स) नहीं करना और ये बड़ी तुच्छ बात है। तुमने तो ब्रह्म को बिलकुल लंगोटे से बाँध दिया है। ब्रह्म को क्या पड़ी है…

वक्ता: पहला हिस्सा है सवाल का कि हम वही सब कुछ तो जानते हैं जो हमें बचपन से अब तक बताया गया है। और दूसरा हिस्सा है, कि अगर यह सब ना हो तो होगा क्या?
अंकित, पहली बात यह कि जो कंडीशनिंग है तुम्हारी वह दो माध्यमों से होती…

test articel. test articel. test articel. test articel. test articel. test articel. test articel. test articel. test articel. test articel. test articel.
test articel. test articel. test articel. test articel. test articel. test articel. test articel. test articel. test articel. test articel. test articel. test articel. test articel. test articel.…



ग्रेटर नोएडा। जीबीयू में आयोजित एक कार्यक्रम में पहुंचे आचार्य प्रशांत ने कहा कि महाशिवरात्रि केवल अनुष्ठान का पर्व नहीं, बल्कि यह मनुष्य को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने कहा कि शिव को केवल मूर्ति या रूप में सीमित कर देना उनकी व्यापकता को संकुचित करना…

पुनर्जन्म होता है। किसका?
प्रश्नकर्ता: आत्मा का।
आचार्य प्रशांत जी: हाँ ठीक। आत्मा का होता है।
आप आत्मा हो?
प्रश्नकर्ता: आत्मा और शरीर।
आचार्य प्रशांत जी: आत्मा जगह छोड़ती है…
इस सूत्र को अच्छे से पकड़ लीजिए।
मुक्ति…
The UGC regulations are only a spark. The explosive material is something far more intimate: the unexamined conviction, lodged in the deepest chamber of the collective psyche, that birth determines worth and that this determination carries divine sanction. The atmosphere itself is the disease; the regulation is at best a painkiller. India’s foundational scriptures contain the strongest possible arguments against caste. The Upanishadic view begins where hierarchy ends.