व्यामोहमात्रविरतौस्वरूपादानमात्रतः।
वीतशोका विराजन्ते निरावरणदृष्टयः ॥६॥
अनुवाद: अज्ञान मात्र की निवृत्ति होते ही, तथा स्वरूप का बोध होते ही, दृष्टि का आवरण भंग हो जाता है और तत्वज्ञ पुरुष शोकरहित होकर शोभायमान होते हैं।
आचार्य प्रशांत: तीन बातें हैं तीनों एक हैं। तीनों में से कोई किसी का कारण नहीं है। कौन सी तीन बातें हैं; अज्ञान मात्र की निवृत्ति, स्वरूप का बोध, दृष्टि का आवरण भंग होना। इनमें से ऐसा नहीं है कि कोई घटना पहले होती हैं फिर दूसरी आती है फिर तीसरी आती है। इनमें कोई क्रम नहीं है और इनमें से कोई किसी का कारण नहीं है। तीनों ही अकारण है। तीनों ही सत्य के परमात्मा के ही नाम हैं। अतः तीनों ही अकारण है।क्योंकि अकारण कितने होते हैं, एक। उसके अलावा बाकी सब का कारण होता है और वो कारण जाना जा सकता है। परमात्मा के अलावा जो कुछ है, सत्य और शून्य के अलावा जो कुछ है उसका कारण निःसंदेह होता है और वो कारण बुद्धि से जाना जा सकता है। इसलिए बुद्धि का उपयोग करना होता है। आध्यात्मिकता बुद्धिहीनता का नाम नहीं है। ये जो तीनों है, ये तीनों एक है। ये तीनों ही मनातीत हैं, ये तीनों ही बुद्धि से आगे की बातें हैं और जो बुद्धि से आगे का है वहां न कोई क्रम है, न विकास है, न श्रृंखला है, न समय है, न कारण है।
क्यों होती है अज्ञान मात्र की निवृत्ति, भगवान जाने। इसलिए उसे कहा जाता है - अनुकंपा। कोई नहीं बता पाएगा अचानक किसी की बत्ती क्यों जल गई? कोई नहीं बता पाएगा। ऊपर-ऊपर देखोगे तो कारण मिलेंगे, गहराई में जाओगे तो नहीं पाओगे। ऊपर-ऊपर देखोगे तो बिल्कुल लगेगा, लगेगा कि कोई किताब पढ़ ली, लगेगा कोई घटना घट गई थी, लगेगा पत्नि से डांट खा ली, लगेगा गुरु ने उपदेश दे दिया, लगेगा अपनी समझ थी बुज थी कुछ अनुभव हुए। ऊपर-ऊपर से देखने पर कारण मिलेंगे की अज्ञान की निवृत्ति क्यों हुई, वास्तव में कोई कारण नहीं है।






