प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरी मृत्यु के बाद मेरी आत्मा का क्या होगा?
आचार्य प्रशांत:
आत्मा के साथ कभी कुछ नहीं होता। आत्मा अद्वैत है। कौन आएगा उसके साथ कुछ करने, जब दूसरा कोई है ही नहीं?
क्या कहीं से सुनकर आए हो ये सब – आत्मा की यात्रा वगैरह, कि आत्मा भी यात्रा करती है? जो यात्रा होती होगी, वो भी किसी गति से ही होती होगी। कितने किलोमीटर प्रति घण्टे, ये भी बता देना। सॉनिक है, या अल्ट्रा-सॉनिक है, ये सब भी बताकर रखो आत्मा की यात्रा के बारे में।
यात्रा तो हमेशा किसी सीमित वस्तु की होती है, जगत में ही कहीं-से-कहीं तक की होती है, और सीमित गति होती है। और एक सज्जन हुए हैं जो हमें ये भी बता गए हैं कि जगत में जो भी वस्तु यात्रा करेगी, उसकी गति प्रकाश की गति से ज़्यादा नहीं हो सकती। तो ये तो तुमने आत्मा के ऊपर भी बाध्यता डाल दी। अगर वो यात्रा करेगी तो उसके ऊपर भी एक नियम लग गया, पर आत्मा के ऊपर तो कोई नियम लगता नहीं।
कभी ज़रा-भी विचार नहीं करते न कि क्या सोच रहे हैं, किस बात को मान लिया, क्या धारणा बना ली?
तुम पूछो कि तुम्हारे मरने के बाद तुम्हारे दोस्त का क्या होगा, तो मैं बता सकता हूँ। उसका कुछ नहीं होगा, दो दिन रोएगा, फिर मौज करेगा। पर तुम पूछो कि तुम्हारे मरने के बाद तुम्हारा क्या होगा, तो ये सवाल ही बेतुका है। तुम अपने-आप को जितना जानते हो, उसके नष्ट हो जाने को ही तुम कहते हो – ‘मृत्यु’। तो एक तरफ़ तो तुम कह रहे हो कि – “मैं नष्ट हो गया”, दूसरी तरफ़ पूछते हो कि- “मेरा क्या होगा?”


