उद्धरण: अपने साथ सहजता से रहो; ये स्वीकार करना बहुत ज़रूरी होता है कि, ‘मैं तो ऐसा ही हूँ।’ जब ये स्वीकार शुरू हो जाता है कि मेरी हालत ऐसी ही है तब फिर बदलाव आने लग जाता है। बड़ी अजीब बात है—जो बदलाव लाने की कोशिश करता है वो पाता है कि सिर्फ उसे अटकाव मिल रहा है, जैसा है वहीं अटक गया और जो स्वीकार कर लेता है अपनी वस्तुस्थिति को उसके जीवन में बदलाव आने लग जाते हैं।
प्रश्नकर्ता: सर, आपने बताया कि आध्यात्मिकता में हम चीज़ों को वैसा देखते हैं जैसी वो होती हैं। जब हम चीज़ों को वैसा देखते हैं जैसी वो हैं तो हम कह रहे हैं कि जो भी मैं हूँ उन नज़रों से देख रहा हूँ। तो अगर कोई लाल रंग हैं और मैं उसको बचपन से काला बोलता आया हूँ, तो मैं उसको काला ही बोलूँगा न?
आचार्य प्रशांत: ये अनिवार्य नहीं है। अगर तुम इतनी कल्पना कर सकते हो कि, "मैं तो हमेशा से काला ही बोलता आ रहा था तो आगे भी काला ही बोलूँगा।" इसकी कल्पना भी अगर कर सकते हो तो इतना तो तुमको भास हो ही रहा है कि ये गड़बड़ होती है। हो रहा है न? तो जैसे अभी हो रहा है, वैसे देखते वक़्त भी ख्याल रखो।
ऐसी कोई गड़बड़ तुम्हारे साथ नहीं हो रही है जिसका तुम्हें गहरे में पता ना हो इसीलिए आध्यात्मिकता संभव है, इसीलिए आदमी के लिए कोई उम्मीद है।
तुम्हारे साथ कुछ भी ऐसा नहीं हो रहा है, जिसको जानने में तुम पूर्णतया असमर्थ हो। कुछ बातें सतह पर होती हैं तो वो तुमको जल्दी दिख जाएँगी, जैसे, मेरे हाथ पर मान लो यहाँ घाव है तो वो मुझे जल्दी से दिख जाएगा। तुम्हारे मन में घाव है, तुम सोच रहे हो किसी ने तुम्हें नुकसान पहुँचा दिया, चोट दी है, तुम बदला लेना चाहते हो— वो ज़रा सा ध्यान दोगे तो दिख जाएगा। इसपर तो ध्यान नहीं भी दोगे तो भी जब मैं तुमसे बात कर रहा हूँ, हाथ ऐसे किया, घाव दिख गया, बिना ध्यान दिए ही दिख गया।


