प्रश्नकर्ता: ओशो ने जाति-स्मरण के बारे में काफ़ी बोला है। वे अपने शिष्यों को बोलते थे कि तुम जाति- स्मरण में जाओ, उससे तुम्हें साधना में मदद मिलेगी।
जाति-स्मरण क्या है और इसमें कैसे जाया जाए?
आचार्य प्रशांत: कल वो कुत्ता हमारे साथ बाहर निकला, बाकी सबने उसपर भौंकना शुरू कर दिया। ये काम क्या सिर्फ़ कुत्ते ही करते हैं? कोई बाहर वाला आ गया तो उसपर भौंकना शुरू कर दिया। ये काम क्या सिर्फ़ कुत्ते ही करते हैं? इंसान भी करते हैं। तो बस कुत्तों को देख कर तुम्हें याद आ जाएगा कि कभी तुम भी कुत्ते थे। यही है जाति-स्मरण। बीज को वृक्ष बनते देख रहे हो न? देखा है न! तो तुम भी तो छोटे-से बीज थे इतने बड़े वृक्ष हो गए हो। दिख नहीं रहा कि बात एक ही है?
आमतौर पर तुम मुहावरा भी तो ऐसे ही इस्तेमाल करते हो, “क्यों बिल्लियों की तरह झगड़ रही हो?” जब दो लड़कियों को लड़ते देख कर के तुम्हें तुरंत याद आ जाता है कि बिल्लियाँ भी ऐसे ही लड़ती हैं। तो याद आ गया न तुम्हें कि कभी तुम बिल्ली ही थे। और वो बिल्ली तुम्हारे भीतर से अभी तक निकली नहीं है। तभी जैसे बिल्लियाँ लड़ती हैं वैसे ही तुम लड़ रहे हो। और जैसे कुत्ते लड़ते हैं वैसे ही तुम लड़ रहे हो। और जैसे नर पशु मादा पशु का पीछा करता है वैसे ही तुम मादाओं का पीछा कर रहे हो। और जैसे पशु रोटी के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाता है वैसे ही तुम रोटी के लिए कुछ भी करने को तैयार हो। यही है जाति-स्मरण।
व्यक्तिगत कुछ भी याद नहीं रहेगा। तुम्हें ये तो साफ़ दिखाई पड़ सकता है कि तुम कभी बिल्ली थे पर तुम्हें ये नहीं साफ़ दिखाई दे सकता कि कभी तुम पिंकी नामक बिल्ली थे। व्यक्तिगत नहीं कुछ याद आएगा। जो कुछ व्यक्तिगत होता है वो तो देह के साथ मिट जाता है। तुम्हें अपना पशुत्व तो याद आ सकता है। समझो। तुम्हें अपना पशुत्व तो साफ़ दिखाई पड़ जाएगा पर तुम कौनसे विशिष्ट विलक्षण पशु थे वो तुम्हें नहीं याद आएगा। कि तुम कहो कि, “मैं कभी मेहू नामक गाय हुआ करता था।" ना! ये नहीं। ना तुम ये कह सकते हो कि, “मैं कभी सुंदर नगर में एक बंदर हुआ करता था।” बंदर थे तुम ये पक्का है पर अगर तुम ये याद करने लग गए कि तुम सुंदर नगर में बंदर थे तो ये तुम ग़लत बोल रहे हो। तुम बंदर मात्र थे। तुममें वानरत्व है। तुममें सभी बंदरो की मूल वृत्ति मौजूद है। वो एक बात होती है। बात समझ रहे हो न?



