श्रोता: सर, हमारी क्लास में एक एक्टिविटी हुई थी, ‘हु ऍम आई?’| उसमें हमने आइडेंटिफिकेशन के बारे में जाना था| उसके अंत में यही समझ आया था कि हम जिससे भी अपनी पहचान रखते हैं, हम वो नहीं हैं| उसके बाद एक दूसरी एक्टिविटी हुई, ‘आई इन आइडेंटिटीज़’, जिसमें ये था कि अपनी आइडेंटिफिकेशन लिखो जो तुम हो, और जो तुम नहीं हो| तो जब हमें पहली एक्टिविटी से पता चल ही गया कि हम कुछ हैं ही नहीं तो फ़िर दूसरी एक्टिविटी का क्या औचित्य?
वक्ता: आप ये नहीं हो, ये आप मानने के लिए तैयार कहाँ हो! (एक चॉक का टुकड़ा उठाते हुए) अगर मुझे साफ़-साफ़ पता ही हो कि मैं ये चॉक नहीं हूँ, तो फ़िर ठीक है| पर अगर किसी ने ये मान ही रखा हो, मान लो हो कोई ऐसा तीरंदाज जिसने ये मान ही रखा है कि मैं चॉक हूँ; “कौन हो तुम? मैं ये चॉक का टुकड़ा हूँ|” तो उसके साथ तो ये एक्टिविटी पूरी करानी पड़ेगी न| एक पूरा इंस्ट्रूमेंट बनाना पड़ेगा, जो उसे ये दिखा पाए कि तुम ये चॉक नहीं हो| जिसको पहले से ही पता हो कि मैं ये चौक नहीं हूँ, निश्चित रूप से उसके किसी काम की नहीं है ये एक्टिविटी| अब मैं ये एक्टिविटी कराऊँ, जिसमें ये बात निकल कर आये कि ‘तुम ये चॉक नहीं हो’, तो तुम कहोगे, “लो, ये तो हमें पहले से ही पता था कि ‘मैं ये चौक नहीं हूँ’ |”
(सभी हँस पड़ते हैं)
वक्ता: पर तुम्हारी जो एक्टिविटी है, उसमें तो जो बातें निकलती हैं कि ‘तुम ये नहीं हो, तुम वो नहीं हो’, वो तो वैसी बातें हैं जिनके बारे में तुम मन में माने बैठे रहते हो कि ‘तुम तो वो हो ही’|
क्या नाम है तुम्हारा?

