
आचार्य प्रशांत:
"नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेषैव वृणुते तेन लभ्यस्तस्येष आत्मा विवृणुते तनसवाम।।"
~मुण्डकोपनिषद
बड़ी ज़बरदस्त बात बोल गए ऋषि। “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो”- प्रवचन सुन–सुन कर आत्मा नहीं मिलेगी। "नायमात्मा" न यम आत्मा, न यह आत्मा, न अयम आत्मा, "प्रवचनेन लभ्यो", प्रवचन से नहीं मिलती। “न…


◾ एक ही जाति होती है - वह है "बल"। बल विकसित करो अपने भीतर।
◾ आत्मा का इस पूरे देह व्यापार से कोई लेना देना ही नहीं।

हिंदुस्तान में अभी भी दो जगह हैं जहाँ पर लडकियाँ बहुत कम पायी जाती हैं – लड़कियाँ, स्त्रियाँ सब – एक, श्मशान घाट, दूसरा, सत्संग। दोनों ही जगहों पर सच दिख जाता है न, और दोनों ही जगहों पर देह की नश्वरता दिख जाती है न। समाज नहीं चाहता है…

किसी ने आपसे पूछा, “अरे! तुमने मुझे पाँच दिन से फ़ोन नहीं किया, तुम्हें मेरी याद नहीं आयी?” आप कहते हैं, “अगर मैं इसको सच बता दूँ तो इस बेचारे के दिल को चोट लगेगी, ये दुख जाएगा।“ तो आप कहते हैं, “नहीं याद तो बहुत आयी, वो नेटवर्क नहीं…

जब शरीर का कोई हिस्सा बड़ी माँग करने लगे किसी भी तरीके से, पेट माँग करता है कि, ‘मुझे भोजन दो’, कहीं दर्द हो गया तो वो जगह माँग करती है कि, ‘मुझे आराम दो, दवा दो।‘
कामोत्तेजना चढ़ने लगी तो जननांग माँग करते हैं कि, ‘हमपर ध्यान दो’, तो…

दुनिया अगर ताक़त की भाषा समझती है तो ताक़त अर्जित करो। दुनिया अगर पैसे की बात सुनती है तो पैसा होना चाहिए तुम्हारे पास। हाँ, शर्त बस एक है कि तुम्हारी बात सदा सच्ची रहे। यह ना हो कि पैसा आ गया तो बात में झूठ आ गया।
जितना तुम्हारी…

मैं जितने भी कपटी लोगों से मिलता हूँ, उनकी धूर्तता की कोई सीमा नहीं। उनका दिमाग चल रहा है। वो महत्वकांक्षी हैं। वो कुछ भी कर दिखाने को तैयार हैं। उनमें ऊर्जा पूरी है, वो दुनिया पर छा जाने के लिए हौसला रख रहे हैं। उनका आत्मविश्वास देखो!
और मैं…

जो लोग दस दरवाज़ों पर खटखटा रहे होते हैं न उन बेचारों की त्रासदी यही होती है, वह ऐसे होते हैं जैसे कि कोई दस जगह गड्ढा खोदे।
यह ग्रंथों का अपमान है कि उनको एक बार पढ़ कर के किनारे रख दो। “मैंने गीता पढ़ ली!” कि, “मैंने बाइबल…

प्रश्नकर्ता: इगो (अहंकार) में और सत्य में क्या अंतर है?
आचार्य प्रशांत: जितने अंतर हैं वह सब इगो में ही हैं। अंतर कुछ कर लो, समानताएँ और अंतर यह सब मानसिक परिकल्पनाएँ हैं। आत्मा में ना कोई भेद होता है, ना अभेद होता है। तुम अगर पूछोगे कि, "अहंकार और…

प्रश्नकर्ता: शिवमय होना क्या है?
आचार्य प्रशांत: बहुत मुस्कुरा रहे हो बेटा! यही होता है शिवमय होना। पूछ रहे हैं कि “शिवमय होना क्या होता है?” यही है, सोमस्त हो जाओ। सोम जानते हो न क्या होता है, क्या होता है? ख़ुमार; सोमस्त हो जाओ, यही होता है शिवमय होना।…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपको सुनने से पहले मैं एक भजन सुनता था उसमें बोलते थे कि "सिर से तेरी बहती गंगा, काम मेरा हो जाता चंगा, नाम तेरा जब लेता।" तो भजन सुनते-सुनते मुझे लगता था कि मैं महादेव के कुछ नज़दीक हो गया हूँ और अब मेरा काम चंगा…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, हमारा मन शरीर से ज़्यादा बलशाली है। और आत्मा के विषय में गुरुजनों से सुना है कि मन से भी ज़्यादा बलशाली है। ऐसा क्यों होता है कि हम भूल-चूक करते हैं और क्या इसका मतलब यह हुआ कि भूलना जो कि मन के तल पर…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं यूट्यूब के माध्यम से जुड़ा हूँ आपसे करीब दो साल से। उसके बाद आध्यात्मिकता में थोड़ी रुचि बढ़ी। इन दो सालों में मेरे कुछ नज़दीकी मित्र थे जिनकी मृत्यु हो गई। उसके बाद मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं मर रहा हूँ। तो ये…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब सत्य/चेतना चुनाव करते हैं तो विवेक क्या है? चेतना और सत्य क्या भिन्न हैं? जब हम अध्यात्म की पहली सीढ़ी चढ़ते हैं, तो क्या विवेक ही नहीं है जो बढ़ता है? कृपया समझाएं?
आचार्य प्रशांत: हमारी चेतना, अशुद्ध चेतना होती है। उसका लक्ष्य होता है- सत्य।…

प्रश्नकर्ता: क्या खोज रहे हैं हम?
आचार्य प्रशांत: यह जितना कुछ हम देखते हैं, यह जो कुछ भी हम अनुभव करते हैं, सुनते हैं, इसका अनुभव हमें यूँ ही नहीं हो रहा। थोड़ा गौर करेंगें तो आपको भी दिखेगा। कुछ भी आपको व्यर्थ ही नहीं दिख रहा, अकारण ही नहीं…

आचार्य प्रशांत: यदि प्राणी हृदय से संचालित है तो वो वास्तव में परम स्रोत से ही संचालित है; पर ये शर्त बड़ी है कि उसे हृदय से संचालित होना चाहिए। जब वह हृदय से संचालित होता है तो इन्द्रियाँ वैसी हो जाती हैं जैसी श्रीकृष्ण भगवद्गीता में कहते हैं, कि,…

प्रश्नकर्ता: वेदान्त क्यों रचा गया?
आचार्य प्रशांत: ऋषियों का एक-एक शब्द सुनने वाले बेचैन मन की शान्ति हेतु ही है। यही एकमात्र उद्देश्य है उपनिषदों का। एक-एक बात जो कही जा रही है वह किसी अवस्था विशेष से कही जा रही है; सत्य, अनावलंबित सत्य, निरुद्देश्य सत्य, निष्प्रयोजन सत्य, कहा…

आचार्य प्रशांत: पूरे अस्तित्व की जहाँ से शुरुआत होती है। इस दुनिया में ही जो बिल्कुल प्रथम बिंदु है, ये याद रखना है कि उनसे भी श्रेष्ठ कोई है। तो पहले तो मन को ऊँचा-ऊँचा-ऊँचा, और ऊँचा, और ऊँचा उठाओ, अधिकतम और उच्चतम, जहाँ तक मन को ले जा सकते…

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। शरीर, मन, बुद्धि, दृश्य व अदृश्य जगत का आधार ब्रह्म हैं और वह ब्रह्म सर्वत्र है, सर्वव्यापी है, विश्वरूप है। उसकी रचना वस्तु में भी ब्रह्म है, तो फिर यह अज्ञान क्यों? क्या हम वह नहीं है या अगला ब्रह्म नहीं है?
दूसरा प्रश्न है, "कुछ…

आचार्य प्रशांत: सत्य को मायापति कहा गया है; समझते हैं। माया क्या? वो जो हमें प्रतीत होता है, जिसकी हस्ती के बारे में हमें पूरा विश्वास हो जाता है, पर कुछ ही देर बाद या किसी और जगह पर, किसी और स्थिति में हम पाते हैं कि वो जो बड़ा…

आचार्य प्रशांत: गुरु और शिष्य जब आमने-सामने बैठे हैं देह रूप में तो है तो दोनों जीव हीं। बस एक जीव है जिसकी चेतना ऊँचाई पा चुकी है और उन ऊँचाइयों से अपने द्वारा पाए गए अमृत को बिखेरना चाहती है, नीचे वालों पर उड़ेलना चाहती है ताकि जो नीचे…

आचार्य प्रशांत: पंचवर्ग क्या है -- जैसे माया के ही पाँच रूपों, पाँच वर्गों की बात की जा रही हो। आत्मा के ऊपर उपाधि बन कर -- अज्ञान, अविद्या या माया सत्य को छुपाए रहती है, ढके, आच्छादित किये रहती है। उसी अज्ञान को पाँच अलग-अलग तरीकों से कहा गया…

क्व निरोधो विमूढस्य यो निर्वन्धं करोति वै।
स्वारामस्यैव धीरस्य सर्वदासावकृत्रिमः।।
~ अष्टावक्र गीता (अध्याय 18 श्लोक 41)

तत्त्वं यथार्थमाकर्ण्य मन्दः प्राप्नोति मूढतां।
अथवा याति संकोचम - मूढः कोऽपि मूढवत्॥
~ अष्टावक्र गीता (अध्याय 18 श्लोक 32)

प्रश्नकर्ता: उपनिषद् भी कहते हैं “एकोहम् बहुष्यामि”
तो क्या ये जो कल्पना होती है, वो ईश्वर के मन में होती है? कि, "मैं एक हूँ और बहुत हो जाऊँ?"
आचार्य प्रशांत: ये उसके मन में होती है जिसे बहुत दिख रहे हैं और जिसे एक दिख रहा है। ईश्वर न…

कुत्रापिन जिहासास्ति नाशो वापि न कुत्रचित्।
आत्मारामस्यधीरस्य शीतलाच्छतरात्मनः॥
~ अष्टावक्र गीता (अध्याय १८ , श्लोक २३)

आचार्य प्रशांत: उपनिषदों की, बल्कि अधिकांश आध्यात्मिक ग्रंथों की भाषा उनके रचनाकारों की ही तरह थोड़ी-सी विशिष्ट है। वो उन्हीं शब्दों का प्रयोग करते हैं जिन शब्दों का प्रयोग हम और आप करते हैं क्योंकि भाषा में, शब्दकोश में शब्द तो वही हैं। लेकिन उन साधारण शब्दों का भी प्रयोग…

आचार्य प्रशांत: देखो प्रकृति से, संसार से भागा नहीं जा सकता, लेकिन प्रकृति और संसार तुम्हारे लिए आख़िरी चीज़ भी नहीं हो सकते। बहुत ध्यान से समझो इस बात को। ना इनसे भाग सकते हो—किससे?—दुनिया से, संसार से। अपने शरीर से बाहर निकलकर भाग सकते हो? तो संसार से बाहर…

असंसारस्य तु क्वापिन हर्षो न विषादिता। स शीतलहमना नित्यं विदेह इव राजये॥
~ अष्टावक्र गीता, अध्याय १८, श्लोक २२
अनुवाद: संसार मुक्त पुरुष को ना कहीं कोई हर्ष होता है, ना विषाद, उसका मन सदा शीतल होता है और वह विदेह के समान शोभायमान होता है।

भवोऽयं भावनामात्रो न किंचित्परमर्थतः।
नास्त्यभावः स्वभावनां भावाभावविभाविनाम्।।
~ अष्टावक्र गीता (अध्याय 18 श्लोक 4)

भवोऽयं भावनामात्रो न किंचित् परमर्थतः।
नास्त्यभावः स्वभावनां भावाभावविभाविनाम् ॥१८-४॥
~ अष्टावक्र गीता
अर्थ: विश्व तुम्हारी चेतना में उभरा हुआ एक चित्र है। विश्व तुम्हारी चेतना में उठती-गिरती एक तरंग है। जिसने जान लिया कि क्या अस्तित्वमान है, और क्या अस्तित्वहीन है वह जन्म मरण के पार चला जाता है। वह

येन विश्वमिदं दृष्टं स नास्तीति करोतु वै।
निर्वासनः किं कुरुते पश्यन्नपि न पश्यति॥१५॥
अनुवाद: जिसने इस विश्व को कभी यथार्थ देखा हो, वह कहा करें कि नहीं है, नहीं है,

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कई रिश्ते ऐसे होते हैं जो न चाह कर भी पीछे छूट जाते हैं, क्या उन्हें दोबारा पाया जा सकता है?
आचार्य प्रशांत:
“जिस समय निर्विकल्प समाधि द्वारा आत्मा का दर्शन होता है, उसी समय हृदय की अशानरूप गांठ का पूर्णत: नाश होता है।”

आचार्य प्रशांत (आचार्य): थोड़ी विचित्र है मनुष्य की स्थिति। रहना उसे शरीर में ही है, रहना उसे जगत के साथ ही है। पर सिर्फ़ शरीर बनकर रहता है तो मौत का डर सताता है, अपने चारों तरफ़ और ऊपर और नीचे अगर सिर्फ़ जगत को ही पाता है तो बेचैन…

प्रश्नकर्ता: मेरे जीवन में सांख्य और वेदांत दर्शन के पढ़ने के बाद काफ़ी बदलाव आया है। मैं आभारी हूँ कि जो मुझे पढ़ने का अवसर मिला, परन्तु दोनों दर्शन में कुछ मूल विरोध दिखाई देता है। मेरे सम्मत में आप नहीं दिखते, आप में सांख्य और वेदांत एक होते दिखते…

प्रश्न: आचार्य जी, नचिकेता बिलकुल निडर होकर ब्रह्म के पास चले जाते हैं और कबीर जी के 'आई गँवनवा की सारी' के भजन का पात्र रो-रोकर जाता है। तो क्या ऐसा होता है कि बाल्यपन में आसान होता है, और समय बीतने पर स्वयं जाना मुश्किल है, या फ़िर घसीटना…

आचार्य प्रशांत: देवता ज़रूर आदमी का ही एक परिवर्धित संस्करण है, ब्रह्म नहीं। उपनिषद और भारतीय दर्शन विशेष इसीलिए रहा है क्योंकि उपनिषदों ने विश्व को वो दिया जो कहीं और से नहीं आया। क्या? कुछ ऐसा जो आयामगत रूप से तुमसे भिन्न है, कुछ ऐसा नहीं जो तुम्हारा ही…

आचार्य प्रशांत: श्लोक संख्या ५ है, प्रथम मुण्डक, द्वितीय खंड से, “जो पुरुष यज्ञ में आहुतियाँ देता है यथासमय, अनुशासन का पालन करता है, उसे सूर्य की किरणें वहाँ ले जाती हैं जहाँ देवताओं का एकमात्र स्वामी इंद्र निवास करता है।“
बात बहुत सीधी है। यज्ञ का अर्थ होता है,…

ॐ तस्य निश्चिन्तनं ध्यानम्।
~ आत्मपूजा उपनिषद (प्रथम श्लोक)
हिंदी अनुवाद: उस आत्म तत्त्व का सतत चिन्तन ही उसका ध्यान है।
श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय: | ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति || ४, ३९ || जितेन्द्रिय, साधनापरायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप शान्ति को प्राप्त हो जाता है। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक ३९प्रश्नकर्ता: आचार्य जी,…
◾ आत्मा का विकृत सिद्धांत ही भारत की दुर्दशा…
आचार्य…
आचार्य प्रशांत: यह श्लोक कहता है कि…
प्रकृत्या शून्यचित्तस्य कुर्वतोऽस्य यदृच्छया।…
आचार्य प्रशांत: पहली पंक्ति कह रही है कि…
~ अष्टावक्र गीता (…
आचार्य प्रशांत: पहला क्या कह रहा है?
प्रश्नकर्ता १: आचरण वाला हीं, ॐ का निरंतर स्मरण..।
आचार्य: कैसे करोगे ये आचरण? ये आचरण कैसे हो सकता है?
किसका स्मरण?…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, मेरा नाम विक्की है, युवा हूँ। मैंने घर की आर्थिक स्थिति के कारण अपनी पढ़ाई छोड़ दी और मैं तीन साल से मल्टी लेवल मार्केटिंग व्यापार में हूँ। मुझे सब कुछ अपने ही दम पर करना है, समृद्ध बनना है। मेरे मित्र नौकरी छोड़कर ध्यान में…

प्रश्नकर्ता: आध्यात्मिक और धार्मिक ग्रंथों को लेकर वर्तमान समय में एक उपेक्षा का भाव है बल्कि कहीं-कहीं तो घृणा का। लोग कहने लग गए हैं, "ज्ञान तो हम अपने अनुभव से ही ले लेंगे। समझ तो हम अपने जीवन से यही सीख लेंगे। किसी ग्रंथ किसी शास्त्र की हमें कोई…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, दैनिक जीवन में कभी-कभी थक जाता हूँ, जिस कारण अपने कार्यों को अच्छे से कर नहीं पाता। मेरी मदद करें!
आचार्य प्रशांत: क्या काम है जो करना चाहते हो?
प्रश्नकर्ता: जैसे कि बहुत पढ़ना होता है।
आचार्य प्रशांत: क्या पढ़ना रहता है?
प्रश्नकर्ता: जैसे मैं GATE की…

आचार्य प्रशांत: कौन से श्लोक हैं, जिसपर बात करें?
प्रश्नकर्ता: पहला खण्ड, पाँचवा श्लोक, केनोपनिषद।
यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥५॥
(केनोपनिषद, खण्ड १, श्लोक ५)
हिंदी अनुवाद: मन से जिसका मन नहीं किया जा सकता; अपितु मन जिसकी महत्ता से मनन करता है, उसी…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं ध्यान नहीं करती। आँखें तो बंद हैं ही, और बंद करके क्या फ़ायदा? कोई साधना भी नहीं करती। साधना और साध्य यदि दो हैं तो गोल-गोल चक्कर काटने से क्या फ़ायदा? बस सत्संग देखना-सुनना, साहित्य पढ़ना, राम कथा, भागवत कथा भाव से सुनना-देखना—इन सब में शांति…

बस्स कर जी हुण बस्स कर जी
काई गल असां नाल हस्स कर जी।
तुसीं दिल मेरे विच वस्सदे सी, तद सानु दूर क्यों दसदे सी,
घत्त जादू दिल नु खस्सदे सी, हुण आइयो मेरे वस कर जी।
तुसीं मोयां नूं मार ना मुक्कदे सी, नित्त खिद्दो वांङ कुट्टदे सी,…

प्रश्नकर्ता: सत्य और माया, दोनों अच्छे लगते हैं। बहुत चंचलता होती है। कोई उपाय बताएँ।
आचार्य प्रशांत: एक माया बुरी लगती है, एक माया अच्छी लगती है—ये मत कहो कि सत्य भी अच्छा लगता है और माया भी अच्छी लगती है। सत्य के सामने बुरा लगना ठहर सकता है, बंद…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कल से जो हिन्दुओं की परंपरा का एक प्रमुख उत्सव माना जाता है, नवरात्रि, वो शुरू हो रहा है। शक्ति के नौ रूपों की आध्यात्मिक उपयोगिता क्या है? शिव-शक्ति को माना जाता है कि एक ही उनका स्वरूप है, फिर ये नौ अलग-अलग स्वरूप क्या दर्शाते हैं?…

प्रश्नकर्ता: अक्सर ऐसा सुनने में आता है कि किसी के पास कोई सिद्धि है और किसी के पास कोई शक्ति है। आध्यात्मिक जगत में ऐसे चर्चे बड़े सुनने को मिलते हैं। जीवन में मुमुक्षा जागृत हो या समाधि प्राप्त हो, इन सब में इन सिद्धियों का क्या महत्व होता है?…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं जब बहुत से लोगों, जैसे मजदूर, रिक्शेवालों इत्यादि से मिलता हूँ, देखता हूँ, तो लगता है मुझे ही चिंता रहती है, इन लोगों को मैंने कभी चिंतित होते हुए नहीं देखा। वो कहते हैं कि कल की कल देखेंगे। ऐसा लगता है कि वो तो बिना…