क्व निरोधो विमूढस्य यो निर्वन्धं करोति वै।
स्वारामस्यैव धीरस्य सर्वदासावकृत्रिमः।।
~ अष्टावक्र गीता (अध्याय 18 श्लोक 41)
अनुवाद: जो आग्रह करता है, उस मूर्ख का चित्त निरुद्ध कहाँ है? आत्मा में रमण करने वाले धीर पुरुष का चित्त तो सदैव स्वाभाविक रूप से निरुद्ध ही रहता है ॥ 41॥
आचार्य प्रशांत: मन के निरोध की कोशिश वैसे ही है जैसे मैं चल-चल के रुकने की कोशिश करूं। मन को रोकने की कोशिश वैसी ही है जैसी कि मैं खुब सोचूं कि कैसे न सोचा जाए। मन को रोकने की कोशिश वैसे ही है जैसे कोई कुत्ता अपनी दुम को पकड़ने की कोशिश करे और लगातार चक्करों में घूमता रहे। मन को रोकने की कोशिश वैसे ही है जैसे मैं कोयला लेकर के किसी दीवार को साफ़ करने की कोशिश करूं।
हम क्यों भूल जाते हैं कि कोशिश करने वाला कौन है?
हम क्यों भूल जाते हैं कि हर कोशिश के पीछे उसके वृत्ति अपने आप को ही क़ायम रखने की है। कृपा करके यह कतई ना भूलिए कि मन जब ये भी कह रहा हो कि मुझे विलीन होना है, तब वो ये कह कर के ज़िन्दा रहना चाहता है। जब मन ये भी कहता है कि मैं समर्पित होना चाहता हूँ, मैं घुल जाना चाहता हूँ, मैं खत्म हो जाना चाहता हूँ। तो वो आपसे यही कह रहा होता है कि समर्पित होकर ज़िन्दा रहना है। अब घुल कर के बचे रहना है। अब विलीन होकर भी अस्तित्व में रहना है।





