वो कहानी है ना की अप्सरा आई एक। अब ऋषि बैठे थे, अपना कुछ कर रहे थे। पान चबा रहे होंगे, जो भी। कुछ ज़रूरी थोड़ी ही है हर समय पढ़ ही रहे हो। तुमने बड़ी छवि बना रखी है कि पढ़ ही रहे होते हैं। दातून कर रहे थे, कुछ कर रहे थे, बैठे थे। अब वो आई और पहले तो नाचने लगी। उन्होंने कहा बढ़िया है, नाच। हमारी गईया भी नाचती है, तू भी नाच। तो वो मुस्कुरा दिए होंगे तो उसका ज़रा सा प्रोत्साहन मिल गया। उसको लगा मुस्कुरा रहा है तो फंस रहा है। उसको नहीं पता था कि दांतुन कर रहे हैं इसलिए दाँत दिखा रहे हैं। सुबह-सुबह का वक्त था, तब तो मज़े से नाची। फ़िर धूप चढ़ने लगी, अब उसके पसीना छूट रहा है। ऋषि पर कोई अंतर ही नहीं पड़ रहा। वो कभी मुंह धो रहे हैं, कभी नाश्ता कर रहे हैं, कभी पांव खुजा रहे हैं, कभी बालों में तेल चल रहा है, कभी कोई आया होगा, शिष्य आया होगा, कहा होगा, चल भाई मीच दे। ये सब हो रहा था। तो उसने कपड़े उतारने शुरू किए एक-एक करके। अभी इलेक्ट्रोमैग्नेट का करंट बढ़ाया जा रहा है। कह रहे हैं बढ़िया है, कपड़े उतर रहे हैं पसीना छूट रहा है ना बेचारी के, धूप बढ़ गई है। हर पन्द्रह-बीस मिनट पर एक वस्त्र उतरता जा रहा है। और उधर सूरज चढ़ता जा रहा है। कह रहे हैं ठीक है, अच्छी ही बात है। उन्होंने एक शिष्य को लगा भी दिया जा भाई चल पंखा चला, बेचारी को बहुत गर्मी लग रही है। उतारती गई उतारती गई अंततः उसने जो अंतः वस्त्र थे, वो भी उतार दिए। पूरी नंगी खड़ी हो गई। कह रहे हैं बढ़िया है, हमारे यहां के सारे जानवर तेरे ही जैसे लगते हैं। कतई नंगे हैं वो भी। अब उस बेचारी के पास उतारने को कुछ बचा ही नहीं था। तो ऋषि बोले ये जो तुमने खाल ओढ़ रखी है, ये भी उतार दे। ये भी तो वस्त्र ही है। बड़ा अपमान लगता है फ़िर अप्सराओं को।