आचार्य प्रशांत: उपनिषदों की, बल्कि अधिकांश आध्यात्मिक ग्रंथों की भाषा उनके रचनाकारों की ही तरह थोड़ी-सी विशिष्ट है। वो उन्हीं शब्दों का प्रयोग करते हैं जिन शब्दों का प्रयोग हम और आप करते हैं क्योंकि भाषा में, शब्दकोश में शब्द तो वही हैं। लेकिन उन साधारण शब्दों का भी प्रयोग जब किसी तत्वज्ञानी, किसी ऋषि द्वारा किया जाता है, तो उन शब्दों में, अर्थ के दूसरे आयाम उतर आते हैं।
जैसे कि जब कहा जाए कि "परमेश्वर ने हिरण्यगर्भ को देखा" तो हमारी सामान्य भाषा में देखने से आशय होता है आँखों से देखना, इंद्रियों से देखना। साधारण आँखों के अनुभव को हम कहते हैं देखना। आँखों से जो अनुभव हुआ, उसको हमने कह दिया देखा। लेकिन कोई आध्यात्मिक ग्रंथ जब कहे कि देखा तो थोड़ा सावधान होकर पढ़ना होगा। वहाँ पर देखने से आशय होता है समझना, देखी जा रही वस्तु के अतीत (पार) होना, देखी जा रही वस्तु के पीछे होना, एक तरह से साक्षी होना।
जैसे अंग्रेजी भाषा में सीइंग (देखने) के दो अर्थ होते हैं, अन्य भाषाओं में भी होते हैं। जब आप किसी से कहते हैं "ओह आई सी," तो इसका मतलब ये नहीं होता है कि अभी-अभी आपने आँख खोलकर देख लिया। इसका क्या अर्थ होता है? इसका अर्थ होता है कि आप उस मुद्दे को समझ गये। वैसे ही जब आप किसी को हिंदी में भी समझाते हैं, आप कहते हैं, "देखो कमल, बात ऐसी नहीं है।" कमल आपके सामने खड़ा है; उसे आप कोई बात समझाना चाह रहे हैं। आप कह रहे हैं, "देखो कमल, बात ऐसी नहीं है।" तो स्थिति ऐसी थोड़े ही हैं कि कमल फिलहाल आँखें बंद करके खड़ा है, और आप उससे कह रहे हैं, "कमल, आँखें खोलो।"
उसे आप क्यों कह रहे हैं, "देखो"? "देखो" से क्या आशय है? कि समझो। ये जो बाहर की आँखें हैं, माँस की आँखें, इनसे तो सभी देख रहे होते हैं; ज़रा अंतर्दृष्टि का उपयोग करो। उसको हम कहते हैं 'देखो'। और अंतर्दृष्टि के उपयोग में भी देखने से क्या आशय है? कि तुम जिस विषय की बात करी जा रही है, उसके बारे में कल्पना कर लो? तुम उसके बारे में आसक्त हो इसीलिए कोई कहानी गढ़ लो?


