
Gatay, Gatay, Paragatay….
I will miss you so much, Pardon me, I will have to die. We played together for long, Now I’m going home to the Sky.
I will miss you so much, I’m going to where I belong. It breaks my heart to leave you, I tried hard…

एक बार फिर,
हाँ, फिर से एक बार,
नफरत हो गई है
अपनी कल्पनाओं से,
उन्मुक्त उड़ने, स्वच्छन्द सोचने वाले हृदय को
सीना फाड़ कर निकलने
और सामनें रख कर,
उस की उद्दंडता के लिए
उस के टुकड़े कर देने
की इच्छा है एक बार फिर
(पर क्या यह काम…


जो कुछ लिखा तूने, उसे मिट के मिटा
जो पास है तेरे, उसे खुद से बचा
जो बोया है तूने, उसे जड़ से हटा
जो बोया नहीं तूने, उसे अपना खून पिला
जो तेरी कमाई है, उसे आग दे लगा
जो कमाया नहीं तूने, उसे कभी न गँवा
जो याद…

आप को: जन्मदिन मुबारक
और धन्यवाद
बताने का
कि कविता
रजनीगंधा का फूल
हो सकती है
पर
अभी
‘आप की फरमाइश’ पर
कविता
लिखूँ कहाँ से
जब
घड़ी के काँटे भी सो जाना चाहते हैं
और
नल से गिरता पानी
ध्यान जमने
देता नहीं
पहले तो
ज़रा यह नल बंद…

पाते स्वयं को विचित्र युद्ध में
रक्षा करते शत्रु जनों की
टूटते न नींद न संग्राम
मोहलत नहीं चार पलों की
इधर भटकते उधर जूझते
गिरते पड़ते आगे बढ़ते
जब गीत न अर्पित कर पाओ
तो ग्लानि न लेना ओ मन
तुम्हारी व्यथित साँसों का
शोर ही संगीत है
हरिताभ…

मेरे लिए यही है मेरा काम।
हर वीडियो, हर ब्लॉग एक चुम्बन है निरभ्र आकाश का अपनी धरा को।
इसीलिये बरसात चाहता हूँ। चंद बूँदों से मन नहीं भरता। हर नया पोस्टर, एक मत्त उच्छ्वास। देखो कि पृथ्वी के भाल पर अंकित हुआ तुम्हारा कोमल स्पर्श, और फिर निहारते रहो…

Are you looking for me?
Look a little closely!
Am I in the Stupa, am I in the Shrine?
You really want me, or just images of mine?
… a little closely!
The crowds in the Ashram are all misled,
What you call as Yoga is such a dread,…

मन शांत
सब के सोने पर मेरा एकांत
एक बार फिर वही आदिम नींद पलकों पर आए
एक बार फिर वही इच्छा मन पर छाए
कि सोऊँ ऐसे कि फिर जागूँ न जगाए ।
पर मेरा नीरव चैन जागृति की भेंट चढ़ जाना है
तुमने सदा सूरज और सुबह को…

बेकार ही है
एक कविता से बहुत अपेक्षा करना।
पहले तो
बामुश्किल अस्तित्व में आएगी
आनंद पीड़ा के दुष्प्राप्य क्षणों से प्रजात
इस पल से निकला अनंत का टुकड़ा अज्ञात
अकुलायेगी, बेचैन…
आहिस्ता से उभर आएगी।
तपते युद्धरत दिवस का सांध्य-विश्राम
परिचितों की भीड़ में एक अपरिचित अनाम
कभी एक…

मैं बड़ी लगन से
जतन कर रहा हूँ
खूब छुप-छुप के,
इसीलिए अब
कविता काफी कम लिखता हूँ ।
मैं पैने कर रहा हूँ
चुपके से
अपने हथियार
तुम्हारे ही बीच रह कर
रंग-बिरंगा वेश पहन कर
हूँ तुम में से एक
(अभी)
सतर्क हूँ मैं
खुद को भी नहीं…

मेरे ऑफ़िस में रोशनी खूब है
सफ़ेद,
जैसे चाँद की होती है ।
कई चाँद निकले रहते हैं दिन में भी,
हमारी आज्ञा पर।
आँखें जलती हैं।
और मज़े की बात तो यह है कि
दरवाज़ों और खिडकियों के काले शीशों से बाहर देखो
तो लगता है कि
चाँद निकला…

यहाँ विशुद्ध अंधकार भी तो नहीं है ।
गौर से देखो तो मालूम पड़ता है
कि- हाँ कुछ चीज़ें हैं, यहाँ आसपास ।
दिखाई बस इतना पड़ता है
कि और दिखाई देने की व्यग्रता
या इतना दिखाई पड़ जाने का अवसाद
तुम्हें लिखने पर विवश कर दे ।
देखते रहो…

मुश्किल है
खाने की मेज़ पर, बस के अन्दर
या बस टहलते हुए
बतियाना
दिशाओं से फूट-फूट पड़ते
अंधेरों की चर्चा में
आँख यूँ चमकाना
जैसे
हमने (बस तुमने और मैंने)
इन्हें अभी-अभी पकड़ा हो ।
कभी मायूस होना
और चर्चा को गंभीरता के साथ
मौका देना
आपसी निगाहों को…

आज
तुम सोती हो
यहाँ मेरे सामने
मैं
तुम्हें बहुत ध्यान से देख रहा हूँ
तुम जानोगी भी नहीं
कि
तुम्हारी आँखों में नींद है
और मेरी आँखों में
तुम्हारे लिए
सपने ।
आज
बुरा होकर भी
बहुत अच्छा है
क्योंकि
कल आज में ही तो छुपा है ।
मैं…

कब तक घिसटूँ
ढ़ोते हुए
अपने मस्तक पर
बोझ तुम्हारे पाँवों का
(तुम्हारे चरण तो मेरा उद्धार करने वाले थे, है न?)
तुमने मुझे सहारा दिया,
पर मेरे पाँव काट कर
तुमने मुझे शब्द दिए
पर उनके अर्थ छीन कर
तुमने मुझे रास्ता दिखाया
पर उस रास्ते में कांटे भी…

विजयादशमी का डंडा
हर साल संभालता है
अनगिनत शरीरों को।
विजयादशमी का डंडा बनाये रखता है भीड़ का प्रवाह
बस एक ही दिशा में
वह पूरा ध्यान रखता है
छिटक न जाए एक भी श्रद्धालु
दाएँ या बाएँ।
विजयादशमी का डंडा
मैला हो चुका है
इतना हाथों के स्पर्श से…

आकाश,
टुकड़ों में मेघाच्छन्न है
या तो पूरी तरह
या बिल्कुल नहीं।
खुले आकाश का सबसे चमकदार सितारा
मेघों को दूर से निहारता है
जैसे पड़ोस का बच्चा मुझको-
भय, संदेह से व्याकुल आँखों से,
कुछ दूरी पर खड़े रहकर।
आषाढ़ के काले बादलों का छोर
बस उनके पीछे चमकती…

मैंने पूछा डूबते हुए सूरज से
तुम्हें देख वह पक्षी क्यों घर लौटता है ?
मैंने पूछा उड़ते हुए पक्षी से
क्यों तुम व्यर्थ गगन गुंजाते हो?
मैंने पूछा विस्तृत श्याम गगन से
क्यों तुम मेघों के पीछे मुँह छुपाते हो ?
पूछा मैंने मेघों से
क्यों तुम धरती पर…

दिए का हवाओं से जूझना
प्रेरणास्पद लगा,
मुझे भी, तुम्हें भी ।
चींटी का अथक परिश्रम,
मन भाया,
मेरे भी, तुम्हारे भी ।
तिनके का डूबते को सहारा देना,
हौसला बँधा गया,
मेरा भी, तुम्हारा भी ।
इतिहास के पन्नों पर छपी,
संघर्षों की गौरवशाली गाथाएँ,
पिघला गईं,
मुझे भी,…

मुझ से तुम्हारा परिचय,
सिमट कर रह गया
बस एक क्षण तक का,
और बसी है मेरी आँखों में,
बस उसी क्षण की,
एक,
छवि तुम्हारी ।
और,
संतुष्ट हूँ मैं।
उस एक क्षण से
आगे जाना भी नहीं चाहता
क्योंकि डरता हूँ
आगे जाने में
छिन न जाए मुझ…

वह
हँसने की चाह में कितना रोता है
वह
समझता है कि
हँसा जा सकता है
हर बात पर और हमेशा
कुछ यही बात
समझाता है
वह सब को
लोग नहीं समझते
पर वह
समझाता रहता है
तब तक
जब तक
या तो लोग हँस नहीं देते
या
वह
वह…

तुम प्रणाम करते हो
उसे रोज़ सवेरे
सर झुका कर
क्योंकि
डर है तुम्हें
झुलसा न दे तुम्हें वह कहीं।
तुम्हारा प्यारा चन्द्रमा
हो जाता है अदृश्य,
तारे अस्तित्वहीन
उस के समक्ष ।
फिर भी
वह तुम्हें कुछ भला नहीं लगता
क्योंकि
तेज बहुत है उस में
और
दोपहर को…

जाड़े की सुबह को,
बैठा हूँ मैं बाहर धूप में,
जब एक भूरा कुत्ता और काला कौवा
आकर कुछ इस तरह बैठ जाते हैं-
मेरे ठीक सामने तो नहीं-
पर किसी कोण से लगातार दिखाई देते रहते हैं।
भूरा कुत्ता बहुत कुछ सड़क पर पड़ी
गंदगी जैसा लगता है-
जिसे…

बस यूँ ही अनायास,
उदासी सी छा गयी थी,
सूरज के डूबने के साथ ही,
और मैं – मुरझाया, उदास
देखता था गहरा रही रात को
तारों की उभर रही जमात को ।
प्रत्येक पल युग सा प्रतीत होता था,
परितः मेरे सारा जग सोता था,
पर मैं, यूँ ही…

इंसान,
लगता है बहुत आक्रामक होते जा रहे हो तुम,
गिद्ध सी तुम्हारी पैनी नज़र
तेंदुए सा तुम्हारा हमला,
सिंह सा प्रहार,
अपराजेय तुम,
शक्तिशाली, सामर्थ्यवान ।
सिद्धांत?
मात्र दो :
सफलता का कारक बहुधा अविश्लेषित रहता है।
प्रहार करे जो प्रथम, सफल भी बहुधा वही रहता है।
अतः हे…



समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रिय:।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्।।29।।
samo ’haṁ sarva-bhūteṣhu na me dveṣhyo ’sti na priyaḥ
ye bhajanti tu māṁ bhaktyā mayi te teṣhu chāpyaham
The same am I to all beings: to Me, There is none hateful or dear. But…

Love is not a mental or physical need. Love is not for the faint-hearted. Love is not for those who fear the loss of relationships, reputation, possessions or life. Love is not for those who are afraid of family, society, or uncertainty. Love is not for those who seek sanction from tradition or culture.

A guide to handling difficult periods, adapting to unexpected changes, learning from experiences, seeking support, and continuing forward with confidence and patience.

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The UGC regulations are only a spark. The explosive material is something far more intimate: the unexamined conviction, lodged in the deepest chamber of the collective psyche, that birth determines worth and that this determination carries divine sanction. The atmosphere itself is the disease; the regulation is at best a painkiller. India’s foundational scriptures contain the strongest possible arguments against caste. The Upanishadic view begins where hierarchy ends.

ग्रेटर नोएडा। जीबीयू में आयोजित एक कार्यक्रम में पहुंचे आचार्य प्रशांत ने कहा कि महाशिवरात्रि केवल अनुष्ठान का पर्व नहीं, बल्कि यह मनुष्य को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने कहा कि शिव को केवल मूर्ति या रूप में सीमित कर देना उनकी व्यापकता को संकुचित करना…

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Jesus stands for the Truth and Truth is omnipresent.
He is present here, and right now, in the hearts of those who love him.
Jesus is not a mere mortal. Jesus is the source of light; the root of all flowers and beauty. In one form, he disappears. In another,…



The Truth cannot be objectified as a thing, place, person, or book. So, don't be too quick to accept your own assessments, judgments, likes, dislikes, and experiences. Whatever you're seeing is seen by "you" — the Ego — and you are no absolute. Everything must be available to enquiry, investigation, and questioning — and questioning cannot happen if you declare that you’ve already come to the Truth. Never believe that the journey has ended or that the ego itself is the Truth.


हमारा मिजाज हमेशा दूसरों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। नतीजे आपकी उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहे। इसलिए अब आपको मनोबल बढ़ाने वाले किसी प्रेरक वक्ता की ज़रूरत है। जैसे ही वह व्यक्ति चला जाता है, आपकी ऊर्जा भी थम जाती है। लेकिन जीने का एक और तरीका भी है। अपने भीतर गहराई में, मुझे एक ऐसा बिंदु मिलता है जिसे कोई बाहरी परिस्थिति छू नहीं सकती। जो कुछ भी होता है, वह सतह पर ही घटित होता है। वह स्थिर, उदासीन और तटस्थ बना रहता है। तब आप सचमुच स्वतंत्र होते हैं।

Questioner(Q): What is the process of clarity? Is it just listening with immersion and no resistance? What is Truth? How we decide it?
Acharya Prashant (AP): Listening without effort, plus if there is Truth in what you hear, there is change and transformation, and that Truth becomes the master. We…


अध्यात्म की रोशनी जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ती है, तो राजनीति पर भी पड़ेगी ही पड़ेगी। ऐसा कुछ नहीं है कि आध्यात्मिक आदमी राजनीति के प्रति अंधा हो जाता है। बल्कि हक़ीक़त तो यह है कि राजनीति को आध्यात्मिक लोगों की बहुत सख़्त ज़रूरत है, क्योंकि राजनेता ताक़त की ऐसी गद्दियों पर बैठते हैं, जहाँ से वो आपके जीवन को बहुत तरीके से प्रभावित करते हैं। राजनेता अगर आध्यात्मिक नहीं है, तो देश रसातल में जाएगा। राजनीति त्यागनी नहीं है, सही राजनीति करनी है।https://acharyaprashant.org/en/articles/raajneeti-mein-adhyatm-kyon-zaroori-1_795988a15

How did the Buddha look then? Who is the Buddha? Let’s try to understand with the story of Gautama Buddha, The ‘Shakya Muni Buddha’ as we call him. So, who was he? Let’s look at his central characteristics. One, someone who is well versed in the knowledge of his time. Buddha had deep scriptural knowledge. He was born in a Hindu Kshatriya family, he was a prince and ever since his childhood he was quite talented. So, one thing about him is that he was quite well-read. Second thing is, he was deeply interested in knowing the depths of life. He did not want to remain merely at the superficial levels, so he would observe a lot, he would think a lot. https://acharyaprashant.org/en/articles/todays-buddha-1_4d1b6bf