मैं चुप हूँ,
वे सब बोल रहे हैं;
क्या बोल रहे हैं?
हह! अब बोल रहे हैं तो बस –
बोल रहे हैं।
पुरुषार्थ को अकड़, भावना को दुर्बलता
तथा चरित्र को फिज़ूल बता,
क्या,
वे अपनी पोल भी नहीं खोल रहे हैं?
~ आचार्य प्रशांत (1995)
मैं चुप हूँ,
वे सब बोल रहे हैं;
क्या बोल रहे हैं?
हह! अब बोल रहे हैं तो बस –
बोल रहे हैं।
पुरुषार्थ को अकड़, भावना को दुर्बलता
तथा चरित्र को फिज़ूल बता,
क्या,
वे अपनी पोल भी नहीं खोल रहे हैं?
~ आचार्य प्रशांत (1995)

एक बार फिर,
हाँ, फिर से एक बार,
नफरत हो गई है
अपनी कल्पनाओं से,
उन्मुक्त उड़ने, स्वच्छन्द सोचने वाले हृदय को
सीना फाड़ कर निकलने
और सामनें रख कर,
उस की उद्दंडता के लिए
उस के टुकड़े कर देने
की इच्छा है एक बार फिर
(पर क्या यह काम…

जो कुछ लिखा तूने, उसे मिट के मिटा
जो पास है तेरे, उसे खुद से बचा
जो बोया है तूने, उसे जड़ से हटा
जो बोया नहीं तूने, उसे अपना खून पिला

जो कमाया नहीं तूने, उसे कभी न गँवा
जो याद…
पर
अभी
‘आप की फरमाइश’ पर
कविता
लिखूँ कहाँ से
जब
घड़ी के काँटे भी सो जाना चाहते हैं
और
नल से गिरता पानी
ध्यान जमने
देता नहीं
पहले तो
ज़रा यह नल बंद…