मेरे ऑफ़िस में रोशनी खूब है
सफ़ेद,
जैसे चाँद की होती है ।
कई चाँद निकले रहते हैं दिन में भी,
हमारी आज्ञा पर।
आँखें जलती हैं।
और मज़े की बात तो यह है कि
दरवाज़ों और खिडकियों के काले शीशों से बाहर देखो
तो लगता है कि
चाँद निकला हुआ है बाहर ही ।
मेरा ऑफिस मुझे चाँद बन ठगता है ।


