दिए का हवाओं से जूझना
प्रेरणास्पद लगा,
मुझे भी, तुम्हें भी ।
चींटी का अथक परिश्रम,
मन भाया,
मेरे भी, तुम्हारे भी ।
तिनके का डूबते को सहारा देना,
हौसला बँधा गया,
मेरा भी, तुम्हारा भी ।
दिए का हवाओं से जूझना
प्रेरणास्पद लगा,
मुझे भी, तुम्हें भी ।
चींटी का अथक परिश्रम,
मन भाया,
मेरे भी, तुम्हारे भी ।
तिनके का डूबते को सहारा देना,
हौसला बँधा गया,
मेरा भी, तुम्हारा भी ।
संघर्षों की गौरवशाली गाथाएँ,
पिघला गईं,
मुझे भी, तुम्हें भी।
पर,
जब हम दिए के जीवट की प्रशंसा कर रहे थे,
चींटी को देखकर आश्चर्य प्रकट कर रहे थे,
तिनके के प्रति आभार व्यक्त कर रहे थे,
इतिहासपुरूषों के समक्ष सर झुका रहे थे,
ठीक उसी वक्त,
कहीं कोई दिया दम तोड़ रहा था,
चींटी हज़ारवीं बार ज़मीन पर गिर रही थी,
तिनका स्वयं भी डूब चुका था
और,
कहीं कोई अकेला, अपनी अकेली लड़ाई,
हार रहा था ।
~ प्रशान्त (मई 4, ’97, रात्रि 12:45)</p
अपनी कल्पनाओं से,
उन्मुक्त उड़ने, स्वच्छन्द सोचने वाले हृदय को
सीना फाड़ कर निकलने
और सामनें रख कर,
उस की उद्दंडता के लिए
उस के टुकड़े कर देने
की इच्छा है एक बार फिर
(पर क्या यह काम…


जो कुछ लिखा तूने, उसे मिट के मिटा
जो पास है तेरे, उसे खुद से बचा
जो बोया है तूने, उसे जड़ से हटा
जो बोया नहीं तूने, उसे अपना खून पिला
जो तेरी कमाई है, उसे आग दे लगा
जो कमाया नहीं तूने, उसे कभी न गँवा
जो याद…