यहाँ विशुद्ध अंधकार भी तो नहीं है ।
गौर से देखो तो मालूम पड़ता है
कि- हाँ कुछ चीज़ें हैं, यहाँ आसपास ।
दिखाई बस इतना पड़ता है
कि और दिखाई देने की व्यग्रता
या इतना दिखाई पड़ जाने का अवसाद
तुम्हें लिखने पर विवश कर दे ।
देखते रहो आसमान की ओर, रात भर,
वो विचित्र चाँद, वो बिखरे तारे,
ये क्या इसलिए निकलते हैं कि


