मन शांत
सब के सोने पर मेरा एकांत
एक बार फिर वही आदिम नींद पलकों पर आए
एक बार फिर वही इच्छा मन पर छाए
कि सोऊँ ऐसे कि फिर जागूँ न जगाए ।
पर मेरा नीरव चैन जागृति की भेंट चढ़ जाना है
तुमने सदा सूरज और सुबह को सत्य माना है
तुम नींद ख़त्म होने का जश्न मनाओगे
जब मेरा सन्नाटा गहरा और गहरा रहा होगा
ठीक तब तुम मुझे आ जगाओगे।


