पाते स्वयं को विचित्र युद्ध में
रक्षा करते शत्रु जनों की
टूटते न नींद न संग्राम
मोहलत नहीं चार पलों की
इधर भटकते उधर जूझते
गिरते पड़ते आगे बढ़ते
जब गीत न अर्पित कर पाओ
तो ग्लानि न लेना ओ मन
तुम्हारी व्यथित साँसों का
शोर ही संगीत है
पाते स्वयं को विचित्र युद्ध में
रक्षा करते शत्रु जनों की
टूटते न नींद न संग्राम
मोहलत नहीं चार पलों की
इधर भटकते उधर जूझते
गिरते पड़ते आगे बढ़ते
जब गीत न अर्पित कर पाओ
तो ग्लानि न लेना ओ मन
तुम्हारी व्यथित साँसों का
शोर ही संगीत है
प्यास बढ़ी बुझी काया की
कभी समझे कभी उलझे
काट न मिली जग माया की
इधर निपटते उधर सिमटते
सोते जगते मानते जानते
जब गीत न अर्पित कर पाओ
तो ग्लानि न लेना ओ मन
तुम्हारी स्तब्ध आँखों का
मौन ही संगीत है
मृत्युशैय्या पर विदग्ध स्वजन
तलाश रही जादुई जड़ी की
खोजा यहाँ माँगा वहाँ
आस लगाई दैवीय घड़ी की
देखो प्रिय के प्राण उखड़ते
बदहवास यत्न निष्फल पड़ते
जब गीत न अर्पित कर पाओ
तो ग्लानि न लेना ओ मन
तुम्हारे विवश आँसुओं का
प्रवाह ही संगीत है
न्यायालय के भरपूर नियम
तुम पर झड़ी इल्ज़ामों की
प्रमाण साक्ष्य और तर्क नहीं
तुम कहते कृष्णों रामों की
अपराधी और दोषी कहलाते
कैद में जाते धक्का खाते
जब गीत न अर्पित कर पाओ
तो ग्लानि न लेना ओ मन
तुम्हारी विकल बेड़ियों का
राग ही संगीत है
~ आचार्य प्रशांत (2018)

एक बार फिर,
हाँ, फिर से एक बार,
नफरत हो गई है
अपनी कल्पनाओं से,
उन्मुक्त उड़ने, स्वच्छन्द सोचने वाले हृदय को
सीना फाड़ कर निकलने
और सामनें रख कर,
उस की उद्दंडता के लिए
उस के टुकड़े कर देने
की इच्छा है एक बार फिर
(पर क्या यह काम…


जो कुछ लिखा तूने, उसे मिट के मिटा
जो पास है तेरे, उसे खुद से बचा
जो बोया है तूने, उसे जड़ से हटा
जो बोया नहीं तूने, उसे अपना खून पिला
जो कमाया नहीं तूने, उसे कभी न गँवा
जो याद…