
हार मोतियों का हज़ार बार भी टूटेगा तो उसे तुम हज़ार बार जोड़ोगे, बार-बार जोड़ो! सुजन अगर रूठ जाएँ, तो बार-बार मनाओ क्योंकि उनसे प्यास बुझती है।
पर जिससे प्यास बुझती ना हो, उससे बस आदतवश जुड़े हो, भ्रमवश, धारणावश जुड़े हो, इसलिए जुड़े हो कि बीस साल से जुड़े…

कि सुंदर लड़की आ गई या हैंडसम लड़का आ गया और तुम बिलकुल कँपने लग गए, हिलने-डुलने लग गए। जो तुम्हें अपना शरीर दिखा करके प्रभावित करना चाहे, तुम पर हावी होना चाहे, उसका प्रतिरोध आवश्यक है। कोई साधारण तौर पर सुंदर हो और तुम्हारे सामने आ जाए, उसकी तो…

देखते नहीं हो बहुत सारी जो एडल्ट ड्रेसेस (बड़ों के कपड़े) होती हैं, वो बिलकुल वैसी ही होती हैं जैसे एक साल, दो साल के बच्चों के झबले। एक साल, दो साल के बच्चों के कपड़े देखे हैं कैसे होते हैं? बहुत सारी एडल्ट ड्रेसेस बिलकुल वैसी ही होती हैं।…

अगर कोई महिला ठीक-ठाक भी होती है तो उसको बिगाड़ने का काम उसका प्रेमी या उसका पति कर देता है। देखिए, महिला को सम्मान मिलना चाहिए उसके ज्ञान से, उसके गुणों से, उसकी आंतरिक शक्ति से। लेकिन आप जब उस महिला को महत्व देना शुरू कर देते हो इस वजह…

कोई गर्मी का मौसम हो, तुम शरीर खुला रखो, बात समझ में आती है। तुम कहीं नदी में, स्विमिंग पूल (तरण ताल) में नहाने जा रहे हो, तुम कपड़े उतार दो, बात समझ में आती है। या तुम सिर्फ़ अपनी सुविधा के लिए कम कपड़े पहनो तो भी बात समझ…

जिसी स्त्री के नितंब बड़े हों, स्तन बड़े हों, चर्बी खूब हो कोमल-कोमल, तुम्हारी भाषा में, वो पुरुष को तत्काल पसंद आ जाती है। उसमें सुंदरता की कोई बात नहीं है; उसमें प्राकृतिक व्यवस्था है गर्भाधान की। वह प्राकृतिक व्यवस्था है कि पुरुष की आँखें ढूँढ़ती ही ऐसी स्त्री को…

पुरुषों ने खूब बहती गंगा में हाथ धोए हैं। स्त्री वैसे ही आतुर रहती है कि कोई ज़रा तारीफ़ कर दे, तो उन्होंने कहा “इसको फँसाने का तो बढ़िया तरीका है, ज़रा-सी तारीफ़ कर दो।”
एक बात बताना, तुमने आज तक कितनी शायरी, कितनी कविताएँ, ग़ज़लें, नग़में पढ़ीं जिसमें स्त्री…

प्रश्नकर्ता: मैं दिखने में इतनी सुंदर हूँ मैं क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: सबसे पहले तो यही समझ लो कि इतनी सुंदर हो नहीं। ये इतना विचित्र है कि क्या इस पर बोलें। सुंदर माने क्या? कैसे पता चलता है कि कोई सुंदर है?
श्रोतागण: दूसरे बोलते हैं।

प्रश्नकर्ता: एक विचार बरक़रार ही रहता है कि 'क्या लोग सोचते हैं या क्या है छवि?' कभी थोड़ा कम दिखता है पर रहता ही है। फिर ये क्यों है, ऐसा सब के साथ तो नहीं है, जैसे अभी कोई छोटा कुत्ता है, तो उसके लिए तो मैं नहीं सोच रहा…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या प्रेम किसी से भी हो सकता है?
आचार्य प्रशांत: एक व्यक्ति वह होता है जो किसी और से कोई संबन्ध रख ही नहीं सकता क्योंकि वह बहुत स्वकेंद्रित होता है। यह मन का सबसे निचला तल है, स्वकेंद्रित मन। वह किसी से कोई रिश्ता रख ही…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रेम क्या है और हम प्रेममय जीवन कैसे जी सकते हैं? बिना प्रेम का जीवन और प्रेममय जीवन में क्या अंतर होता है और उस अंतर को हम कैसे देख सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: बिना प्रेम का जीवन ऐसा है जैसे सूखा पत्ता उड़ रहा है हवाओं…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप कह रहे हैं कि खुद के प्रति प्रेम होना चाहिए। आपके अनुसार हमें अपने आंतरिक कष्ट से मुक्ति की कोशिश करनी चाहिए। एक तरह से ये स्वार्थ तो गहन अहंकार हुआ।
आचार्य प्रशांत: हाँ, तो वो गहन अहंकार चाहिए, गहन माने गहरा। गहरा अहंकार है जहाँ,…

प्रश्नकर्ता: हाल ही में परिवार में किसी अतिप्रिय व्यक्ति का देहाँत हुआ। मन को आघात लगा जब परिवार से संबंधित कई तथ्य उजागर हुए। मैने जाना कि दशकों साथ रहने के बाद भी एक परिवार के लोगों में आपसी नज़दीकी नहीं होती। क्या परिवार की संस्था ही अप्रेम पर आधारित…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हमारे जो ये सम्बन्ध होते हैं, उसमें हम ये दावा तो करते हैं कि बेशर्त प्रेम है, पर एक इंसान कोशिश करता रहता है कि प्रेम सम्बन्ध टूटे नहीं और एक इंसान बार-बार निराशा से सम्बन्ध तोड़ देता है, कि मुझसे और हो नहीं रहा। वो ये…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम! मेरा प्रश्न वृत्तियों के ऊपर है। गौतम बुद्ध कहते हैं कि वृत्तियों को बिना राग और द्वेष जगाए होशपूर्वक देखने मात्र से वृत्तियाँ क्षीण हो जाती हैं। परंतु मैं कितना भी प्रयास कर लूँ तब भी राग और द्वेष से निर्लिप्त नहीं हो पाता। इसका कारण…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रेम और मोह में क्या फ़र्क होता है?
आचार्य प्रशांत: प्रेम ऐसा है कि जैसे कोई चार दीवारों में क़ैद है और क़ैद उसे अखरने लगी है, बाहर की हवा प्यारी लगने लगी है, और बाँसुरी पर दी हुई तान हवा पर बहती हुई, उसकी दीवारों के…

प्रश्नकर्ता: यह जो आशिक लोग होते हैं, एक-दूसरे से बेबी-बेबी वाली भाषा में बात क्यों करते हैं? एक दूसरे को बेबी-बेबी, सोना, या चुन्नू-मुन्नू बोलना, यह क्यों होता है?
आचार्य प्रशांत: वजह तो बिलकुल सीधी है। बेबी क्या होता है? बच्चा! बच्चे का मतलब है वह जिसके पास चेतना…

प्रश्नकर्ता: सर, पूछने में शर्म आ रही है पर पूछना ये चाहता हूँ कि कामवासना बहुत परेशान करती है। क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: ये शर्म ही परेशानी है। तुम्हारी जो हालत है, उस बर्तन की तरह है जिसे नीचे से आँच दी जा रही है और ऊपर से बिल्कुल ढँककर…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या वासनाओं का दमन आवश्यक है?
आचार्य प्रशांत: दबाना भी एक विधि है। शम- दम ये भी आवश्यक होते हैं। वासनाएँ तो भीतर बहुत समय तक बनी रहेंगी, निर्बीज नहीं हो जाओगेl और तुम ये इंतज़ार नहीं कर सकते कि जब वासनाएँ समूल नष्ट हो जाएंगी सिर्फ…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मन में ये चलता रहता है कि आसपास के लोग क्या सोचते हैं। नफरत से डर लगता है। ये शायद देह की असुरक्षा का ही भाव है। इसका संबंध कामवासना से भी है, कामवासना को लेकर एक असहजता रहती है हमेशा से। बाहर प्रकट नहीं होने…

प्रश्नकर्ता: उस तक जाने का रास्ता वही बताए, उसी ने शायद मुझे आपसे मिलवा भी दिया। साक्षात्कार के दौरान आपने कुछ ग्रंथों के पढ़ने के लिए कहा था जिनमें अष्टावक्र गीता, विवेक चूड़ामणि मुख्य थे। उनका पठन मैंने कर लिया है और आजकल रामकृष्ण परमहंस जी की कथामृत पढ़ रही…

प्रश्नकर्ता: जो जीवन का सबसे कीमती समय होता है, जब हमें ज़िन्दगी बनानी होती है और ज़िन्दगी के बड़े-बड़े निर्णय करने होते हैं, ठीक उसी अवधि से गुज़रते हुए, ठीक उसी दरमियान हमें कामवासना सबसे ज़्यादा क्यों सताती है? एक बार अधेड़ हो गए, बूढ़े हो गए फिर कौन-सा बड़ा…

प्रश्नकर्ता: स्त्री रूप के प्रति अत्यधिक आकर्षित हो जाता हूँ ऐसा क्यों होता है?
आचार्य प्रशांत: देखो आकर्षित हम सभी रहते हैं। बात इतनी ही है कि हम जिसके भी प्रति आकर्षित रहते हैं वो एक आकार, रूप, नाम, व्यक्ति, वस्तु, चीज, इंसान ऐसा कुछ होता है। कुछ भी हो…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सेक्स की लत का क्या इलाज़ है?
आचार्य प्रशांत: इसका होना—किसी भी चीज़ का होना—जिसको आप निकृष्ट समझते हैं या गलत समझते हैं उतनी बड़ी समस्या नहीं है जितना कि उसको गंभीरता से ले लेना। तुम अपने-आपको बहुत महत्व देते हो, तुम अपने-आपको न जाने क्या समझते…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपको सुनने के बाद जीवन में काफ़ी सुधार महसूस किया है लेकिन कामवासना की स्थिति में अभी भी असहाय रहता हूँ, ऐसा क्यों?
आचार्य प्रशांत: असहाय स्थिति तो रहेगी। जीव हो, इंसान पैदा हुए हो, संरचना ही तुम्हारी ऐसी है कि जवान होवोगे तो वासना पकड़ेगी। वह…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जीवन का अधिकांश समय कामवासना में व्यतीत किया है। किशोरावस्था से लेकर अब तक कामवासना से मन ग्रसित रहा। जीवन की सारी व्यग्रता, उदासी या मन की किसी भी व्यग्र कर देने वाली स्थिति में वासना को ही द्वार बनाया खाली होने के लिए या कुछ क्षणों…

प्रश्नकर्ता: बहुत समय से मेरे मन में ये सवाल था, आज पूछना चाहता हूँ: सेक्स, अच्छा या बुरा?
आचार्य प्रशांत: बस सेक्स! ना अच्छा ना बुरा! साँस लेते हो तो पूछते हो अच्छा या बुरा? पानी पिया, अच्छा या बुरा?
प्र: धर्म ग्रंथों में क्यों कहा गया है कि ब्रह्मचर्य…

आचार्य प्रशांत: ज़रा भीतर जाकर के देखा करो, थोड़ा वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखो, ज़रा खोजी का चित्त रखो। नहीं हैं चीज़ें वैसी जैसी दिखाई पड़ती हैं। नहीं है दुनिया वैसी जैसी तुम्हें प्रकट होती है। और चीज़ें तो वैसी दिखाई भी नहीं पड़ती जैसी कि वो चीज़ भी है, ख़ासतौर पर…

प्रश्न: भगवान, बाहर से कुछ नहीं मिलेगा, ये जानते हुए भी अभी आशा समाप्त नहीं हो रही। आकर्षण बना रहता है, खासकर नारी का आकर्षण। शारीरिक रूप से कोई आवेग नहीं उठते, लेकिन चित्त में तो आवेग उठते रहते हैं।
क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत जी:

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आज से छह साल पहले एक लड़की की ओर आकर्षित हुआ। मेरे प्रेम की गुणवत्ता वही थी जो सामान्यतया मेरी उम्र के किसी भी लड़के की होती है। किन्तु उसी लड़की का पिछले वर्ष किसी दूसरे लड़के से प्रेम-सम्बन्ध हो गया। मैं पिछले पाँच वर्षों से सिविल…

प्रश्न: आचार्य जी प्रणाम। आचार्य जी, आपके सत्संग में आना अच्छा तो लगता है, पर आने के लिए बड़ा प्रयत्न करता पड़ता है। दूसरी ओर जब प्रेमिका मिलने के लिए बुलाती है, तो उतना प्रयत्न नहीं करना पड़ता।
ऐसा क्यों?

प्रश्न: आचार्य जी, प्रणाम।
प्रेम क्या है? हम किसी स्त्री से प्रेम क्यों करते हैं? स्त्री-पुरुष के मध्य जो आकर्षण होता है, उसका क्या कारण है? स्त्रियों के प्रति जो सकारात्मक या नकारात्मक विचार आते हैं, उनका कारण क्या है?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मुझे स्त्री के शरीर का इतना आकर्षण क्यों रहता है?
आचार्य प्रशांत: तुम्हारी मूल समस्या ये नहीं है कि तुम उत्तेजित इत्यादि हो जाते हो। तुम्हारी मूल समस्या ये नहीं है कि तुम बहक जाते हो। तुम्हारी मूल समस्या है कि तुम खाली हो।

प्रश्न: आचार्य जी, जब मैं किसी से जुड़ जाती हूँ, तो उसके ही ख़यालों से मन भर जाता है। और अगर सामने वाला मुझपर ध्यान न दे, तो बुरा लगता है। मैं खुद में मज़बूत कैसे बनूँ, कि दूसरे पर आश्रित न रहना पड़े?
आचार्य प्रशांत जी:

वक्ता: जब आकर्षण नहीं है, परन्तु फिर भी जुड़ाव है, सम्बंधित हैं, तो उसको समझना कि जुड़ाव है। आकर्षण नहीं है, पर जुड़ाव तब भी रह सकता है, आदत के फल स्वरूप। कि जैसे दो शरीर, एक दूसरे के साथ गले मिले हुए थे और तब ही मर गए। अब…

श्रोता:मेरे अन्दर एक डर है कि या तो मेरे लिए प्रशंता अद्वैत संस्था है या गर्लफ्रेंड है। अगर मैं शादी के रास्ते पर निकल रहा हूँ तो फिर मैं इस संस्था से हटूंगा, इसका बहुत डर है। और दूसरी ओर निकल रहा हूँ, तो ज़ाहिर सी बात है कि…

आचार्य प्रशांत: अभी ऋषिकेश में था तो वहाँ एक यूरोपियन महिला सत्रों में आती थीं और जो कुछ भी वो कहती उसमें ये बात लौट-लौट कर आती कि उन्हें गंगा बहतु पसंद है। मैंने पूछा कि आप अपना स्थान छोड़ कर यहाँ क्यों रहती हैं? तो कई बातें बोलें, पर…

प्रश्नकर्ता: मैंने आमतौर पर देखा है कि मैं लड़कियों से सामने से बात नहीं कर पाता हूँ। पर किसी और माध्यम से कर लेता हूँ, जैसे वाट्सैप मैसेज आदि के द्वारा।
आचार्य प्रशांत: अपने सामने जब तुम किसी अपने-जैसे को पाते हो, तो उसको देखना कुछ हद तक अपनेआप को…

श्रोता १: कुछ भी नया सामने आता है तो या तो ये लगता है कि नया है, तो असंभव है, होगा नहीँ, या ये लगने लगता है कि बहुत मुश्किल है, हमारी काबिलियत के बाहर है, इसलिए छोड़ दो| या तो रिजेक्शन आ जाता है या डर आ जाता है…

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ग्रेटर नोएडा। जीबीयू में आयोजित एक कार्यक्रम में पहुंचे आचार्य प्रशांत ने कहा कि महाशिवरात्रि केवल अनुष्ठान का पर्व नहीं, बल्कि यह मनुष्य को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने कहा कि शिव को केवल मूर्ति या रूप में सीमित कर देना उनकी व्यापकता को संकुचित करना…



Questioner(Q): What is the process of clarity? Is it just listening with immersion and no resistance? What is Truth? How we decide it?
Acharya Prashant (AP): Listening without effort, plus if there is Truth in what you hear, there is change and transformation, and that Truth becomes the master. We…


प्रश्नकर्ता: पिछली बार चंडीगढ़ तरफ़ से आया था जी,। आप से जुड़ा था। तबजब मैं अकेला आया था, बिलकुल हताश, परेशान था। आज मेरीमेरे साथ श्रीमती जी भी आईं हैं। मेरा प्रश्न यह है जी, जैसे संतों ने कहा है—
प्रेम-गली अति सांकरी, तामे दो न समाहिं। जब मैं था…


लड़का-लड़की पंद्रह साल के हुए नहीं कि माँ-बाप बन सकते हैं, फिर? बहुत अक्ल आ जाएगी उनमें? और फिर जो बच्चा पैदा हो उसको सिखाएँ कि, “यह देवी-देवता हैं, हमने पैदा किया है।“ वह देवी-देवता ने नहीं पैदा किया है, वह पैदा इसलिए हो गया था क्योंकि देवी जी बहकी…
आचार्य: हाँ, तो…
कुछ बुरा नहीं है नारी…
देह है,…
The UGC regulations are only a spark. The explosive material is something far more intimate: the unexamined conviction, lodged in the deepest chamber of the collective psyche, that birth determines worth and that this determination carries divine sanction. The atmosphere itself is the disease; the regulation is at best a painkiller. India’s foundational scriptures contain the strongest possible arguments against caste. The Upanishadic view begins where hierarchy ends.
कृष्ण का खुद ऊँचा होना, कृष्ण के पूरे जीवनवृत्त में, उनकी ज़िंदगी की जो पूरी कहानी है उसमें और श्री कृष्ण की प्रेमकथा में एक सूत्र है जो साझा पिरोया हुआ है। गीता की ऊँचाई, कृष्ण के जीवन की ऊँचाई, और कृष्ण के प्रेम की ऊँचाई तीनों एक हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि कृष्ण बहुत ऊँचे हों और उनका प्रेम निचले तल का हो जाए। ये संभव नहीं है।