प्रश्नकर्ता: एक विचार बरक़रार ही रहता है कि 'क्या लोग सोचते हैं या क्या है छवि?' कभी थोड़ा कम दिखता है पर रहता ही है। फिर ये क्यों है, ऐसा सब के साथ तो नहीं है, जैसे अभी कोई छोटा कुत्ता है, तो उसके लिए तो मैं नहीं सोच रहा कि वो मेरे बारे में क्या सोचता है, या मेरे से कोई कमज़ोर है जिससे मुझे बिलकुल कोई डर ही नहीं है, तो उसके बारे में तो मैं नहीं सोच रहा कि मेरे बारे में क्या सोच रहा है; या जैसे कोई ख़ूबसूरत लड़की हो, उसके बारे में तो ज़रूर सोचूँगा पर मेरी नज़र में जो बदसूरत है, मेरे को जिससे कोई लेना-देना नहीं है, जिससे सेक्सुअल अट्रैक्शन (यौन आकर्षण) नहीं है जैसे, तो वहाँ पर वो चीज़ नहीं रहेगी। तो मतलब ये है और डर है और कुछ सामने वाले को इस्तेमाल करने का विचार है। समझ नहीं आ रहा है सर कि क्या है ये?
आचार्य प्रशांत: समझ तो गए ही हो, समझ तो गए ही हो! जो तुमने बात बोली वो सब समझदारी की है, कि जिसके साथ स्वार्थ जुड़ा होता है उसी की कद्र करते हो और उसी से डरते हो।
प्र: पर फिर भी वो है ही!
आचार्य: क्योंकि स्वार्थ है और स्वार्थ है तो डर है। इतना समझ लिया कि स्वार्थ बराबर डर? अब आगे बढ़ो, अब पूछो कि उस स्वार्थ से मुझे हाँसिल क्या हो रहा है? डर तो हाँसिल हो रहा है, ये तो स्पष्ट है, नुकसान स्पष्ट है, "लाभ कौन सा है जिसकी मुझे आशा है?" ये भी पूछो। क्या वो लाभ इतना बड़ा है कि उसकी ख़ातिर डर बर्दाश्त किया जाए? अगर है इतना बड़ा, तो डर बर्दाश्त करो, बेशक़! नहीं है, तो काहे का डर!
प्र: हाँ, ज़्यादा-से-ज़्यादा क्या होगा! मतलब, फिज़िकल पेन (शारीरिक दर्द) ही होगा।

