नए का आकर्षण, नए की आशंका || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)

श्रोता १: कुछ भी नया सामने आता है तो या तो ये लगता है कि नया है, तो असंभव है, होगा नहीँ, या ये लगने लगता है कि बहुत मुश्किल है, हमारी काबिलियत के बाहर है, इसलिए छोड़ दो| या तो रिजेक्शन आ जाता है या डर आ जाता है या निराशा आ जाती है| कुछ नया दिखा तो या तो उसको नकार ही दिया, अस्वीकृत या डर ही गये, या उससे निराश हो गये| क्या इनके अलावा भी जीने का कोई तरीका है?
वक्ता: चलो देखते हैं| तुम कब किसी नई बात को, नई घटना को, नए व्यक्ति को नकारते हो? अगर वो नया है तो एकदम नया ही है; तो आप नकार कैसे सकते हो? आप उसे मना कैसे कर सकते हो? रिजेक्ट कैसे कर सकते हो? आप से जो बात कही गयी और आप उसको अस्वीकृत कर रहे हो, ये अस्वीकृति कैसे होती है? इसका प्रक्रिया क्या है? मन में क्या घटना घटती है? तुम्हारे पास एक नयी बात आई और तुमने कहा, ‘ये ठीक नहीँ, मैं इसे अस्वीकृत कर रहा हूँ’| ये कैसे होता है?
श्रोता १: उसमें हमें रुचि नहीं |
वक्ता: अभी वो नयी है, तुम्हें उसमें रुचि या अरुचि का पता कैसे चलेगा?
श्रोता २: वो मेरी मानसिकता से मेल खा रहा है या नहीँ|
वक्ता: हाँ| अब दिक्कत ये है कि अगर पुराना पहले ही बैठा हुआ है, तो नया अभी आया ही कहाँ? मैं पुराने के बारे में ही सोच रहा हूँ, तो नया आया कहाँ अभी?
