आचार्य प्रशांत: अभी ऋषिकेश में था तो वहाँ एक यूरोपियन महिला सत्रों में आती थीं और जो कुछ भी वो कहती उसमें ये बात लौट-लौट कर आती कि उन्हें गंगा बहतु पसंद है। मैंने पूछा कि आप अपना स्थान छोड़ कर यहाँ क्यों रहती हैं? तो कई बातें बोलें, पर जितनी भी बातें बोलें, उनके केंद्र में गंगा रहे; गंगा बहतु पसंद है।
अब ये सारी बातें हमारी होती थीं ऋषिकेश की गंगा के तट पर। एक कैफ़े था, हम उसमें बैठते थे। थोड़ी ऊँचाई पर, वहाँ से सीधे नीचे गंगा बह रहीं हैं, बड़ा मनभावन दृश्य होता था। वादी जैसा माहौल, आस-पास मंदिर, स्वच्छ जल, रेत, पत्थर, नीरभ्र आकाश, और उससे एक संतुलित दूरी पर बैठे हुए हम। कोई संदेह ही नहीं कि गंगा बड़ी नैनाभिराम लगें। और उन्हें गंगा से प्रेम था, बहुत-बहुत देर तक देखती ही जा रहीं हैं गंगा को। सूर्यास्त के समय प्रायः सत्र हुआ करते थे, तो ढलता हुआ सूरज प्रतिबिबिंत हो रहा है, बड़ा सुन्दर। और वो कहें कि 'गंगा जितनी बार बुलाएगी, ऋषिकेश आऊँगी'।
फिर एक रोज़ मैंने पूछ ही लि या, मैंने कहा कि कुछ वर्ष पूर्व यहाँ उत्तरांचल में बाढ़ आयी थी और तब ऐसी नहीं थी गंगा, तब नज़ारा ही दूसरा था, रौद्र रूप था। तब आप सुरक्षा-पूर्वक तट पर बैठकर के सूर्यास्त का आनदं नहीं ले सकते थे, तब जान के लाले पड़े हुए थे।
जहाँ पर आप अभी खड़ी हुईं हैं, वहाँ तक तो पानी की तीव्र धार थी, क्या तब भी पसंद आती गंगा?
कदाचित इस प्रश्न पर उन्होंने पहले कभी विचार किया ही नहीं था, तो थोड़ा अटपटा-सा लगा उनको। तो बोली कि “नहीं वो तो यदा-कदा की बात है, गंगा का प्राकृतिक रूप तो यही है और बड़ा सुन्दर है।”
मैंने कहा, “जिसे आप प्राकृतिक रूप कह रही हैं वो शायद बस एक अवस्था है, जो बदल जाती है। आप यहाँ दूर खड़े हैं, यहाँ सब कुछ मधुर है, आपके शरीर को पूरी सुरक्षा मिली हुई है, मन को शांति का अनुभव मिला हुआ है, यहाँ से आप चन्द कदम और आगे बढ़ जाएँ, धारा के बीच में चलें जाएँ तो मन डगमगाने लग जाएगा। जैसे-जैसे शरीर डगमगाएगा धारा के आवेग से, वैसे-वैसे मन भी डगमगाने लगेगा; शान्ति विलुप्त।”

