चुपै चुप ना होवई जे लाइ रहा लिव तार
– जपुजी साहिब(पौड़ी १)
अनुवाद: मौन धारण करने से मन चुप नहीं होता और ना ही प्रभु से मिलाप होता है , चाहे मन लगातार ध्यान में लगा रहे!
वक्ता: चुपै चुप ना होवई, इसमें हमें कोई समस्या नहीं हैं| बात सही है कि मौन धारण करने से भी मन चुप नहीं होता, वो हमारा अनुभव है| कुछ भी कर लो मन चुप नहीं होता, शांत नहीं होता| समस्या दूसरे भाग में आ रही है, इसी कारण कई लोगों ने आज ये प्रश्न लिखा है|
दूसरा भाग कहता है कि तुम कुछ भी कर लो, तुम शांत हो जाओ, तुम मौन धारण कर लो, तुम अंतर में समा कर शब्दहीन हो जाओ, तब भी बात बनेगी नहीं| चुप तुम्हें तब भी उपलब्ध नहीं होगा|
तो बड़ी ठेस लग रही है| ‘चुप हो जायेंगे, अंतःस्थल में समा जायेंगे, तब भी नहीं मिलेगा? इतना क्या दुरूह है पाना?अरे! जितनी तुम्हारी शर्तें थीं सब कर तो दीं पूरी, अब आओ| अपनी ओर के काम हमने पूरे कर दिए, अब तुम अपना काम करो, व्यापार ही तो है| हम चुप हो गये, हमने सारे नियम कायदों का पालन कर दिया, आचरणबद्ध जो जो काम किये जा सकते थे हमने कर दिये, अब तो हमारी उम्मीदें पूरी करो’|
नानक जैसे लोग इस मुर्खता में नहीं फंसते| कहते हैं, ‘तुम कुछ भी कर लो, तुम सौ सिद्धियाँ प्राप्त कर लो, तुम अपनी नाड़ी रोक लो, तुम मुर्दे ही हो जाओ, तुम अखंड मौन धारण कर लो के जी महोदय ने पिछले आठ वर्षों से एक शब्द उच्चारित नहीं किया किया है, तुम्हें तब भी नहीं मिलेगा’| तो बुरा सा लग रहा है ये पढ़ने में| ‘हम इतने गए-गुज़रे हैं, हमारी कोई हैसियत ही नहीं है, हम सब कुछ कर लें तुम तब भी नहीं मिलोगे’| बिल्कुल यही कह रहे हैं नानक, ‘तुम्हारी कोई हैसियत ही नहीं, तुम जितने काम कर सकते हो वो सब निष्फल ही जाने हैं या ये भी कह लीजिये कि उनका एक ही फल होना है- कि तुम्हारी बेचैनी और बढ़ेगी|


