प्रश्नकर्ता: योग तो कालातीत है, पर उसके सामने समकालीन चुनौतियाँ क्या हैं?
आचार्य प्रशांत:
योग के सामने कोई चुनौतियाँ नहीं होती। योग तो मन की सहायता हेतु है। मन चुनौतियों से घिरा हुआ है, मन की सहायता के लिए योग है।
आपने कहा, “समकालीन चुनौतियाँ”, काल ही मन के लिए होता है। काल के अनुसार मन के सामने चुनौतियाँ बदलती जाती हैं। अलग-अलग समय में मन के लिए अलग-अलग तरह के विक्षेप होते हैं, राग होते हैं, द्वेष होते हैं, समस्याएँ होती हैं।
मन योगस्थ हो सके, मन हृदय से मिल सके, आत्मा में लय हो सके – इसके सामने आज क्या चुनौती है? आज का आदमी सहजता से योगस्थ क्यों नहीं हो पा रहा है? पतंजलि शुरुआत करते हैं। कहते हैं, “योगश्चित्त वृत्ति निरोधः।”
चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है। निरोध हो सके चित्त की वृत्तियों का, इसके लिए आवश्यक है सर्वप्रथम कि चित्त की वृत्तियों का पता तो चले। चित्त की वृत्तियाँ, वृत्ति रूप में, समस्या रूप में, सामने खड़ी तो हों!
आज के समय को देखें तो वृत्तियों के संदर्भ में दो बातें साफ़ नज़र आएँगी।

