
स्वामी विवेकानंद अनूठे हैं, बहुत कम तुमने साधु-संत-सन्यासी देखे होंगे जो इतने सुघटित सुडौल शरीर के हों, जितने विवेकानंद थे।
खेल की, कसरत की उनकी दिनचर्या में बंधी हुई जगह थी। और यही नहीं कि बस व्यक्तिगत रुप से खेलते थे, अपने साथियों से कहें – व्यायाम आवश्यक है।
जिस…

प्रश्नकर्ता: प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार असफल होने के बाद मैं अब सांसारिक प्रयासों से अनासक्त हो गया हूँ। क्या अध्यात्म में मुझे शरण प्राप्त हो सकती है ताकि मुझे सांसारिक प्रयत्न फिर करने ही ना पड़ें?
आचार्य प्रशांत: *रॉंग नंबर*। ऐसे थोड़ी है की इधर से पिट गए, उधर से…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, दैनिक जीवन में कभी-कभी थक जाता हूँ, जिस कारण अपने कार्यों को अच्छे से कर नहीं पाता। मेरी मदद करें!
आचार्य प्रशांत: क्या काम है जो करना चाहते हो?
प्रश्नकर्ता: जैसे कि बहुत पढ़ना होता है।

प्रश्नकर्ता: जैसे राबिया और हसन के वक्त में राबिया ने कहा कि सत्य बताने का एक टाइम आएगा और तभी तुम उस बात को जानोगे क्या इसकी तुलना ऐसे हो सकती है कि जब तक अपना वक्त नहीं आता, अच्छे वक्त की चाभी नहीं मिलती।
आचार्य प्रशांत: बहुत बुरा वक्त…

आचार्य प्रशांत: अहंकार कहता है कि मैं जैसा हूँ, वैसा होते हुए मुझ में ये पात्रता है कि जो मैं चाह रहा हूँ, वो मुझे मिल जाए। अहंकार में इतनी समझ और इतना लचीलापन नहीं होता कि उसे दिखाई दे कि वो बित्ता भर का नहीं है, और मांग…

वक्ता: सर, आपने जो कुछ भी बताया, जो कुछ भी हमने जाना, सीखा, उससे फायदा क्या हो गया? हासिल क्या हुआ? वाकई हासिल कुछ नहीं होगा, कुछ भी हासिल नहीं होगा। जो तुम्हारा शक है, वो बिल्कुल ठीक है, तुम्हें ठीक ही शक है कि कुछ हासिल नहीं होगा और…

प्रश्न:सर, द्वैत की जो संकल्पना है, उसमें अगर एक सिरे के प्रति तीव्रता ज़्यादा होगी तो दूसरा सिरे के होने की भी संभावना ज़्यादा होगी?
वक्ता:सवाल ये नहीं हैं कि, “संभावना क्या है? कितनी मिलेगी?”। द्वैत का जो तथ्य है, उसे समझिये।

श्रोता: सर, मैंने देखा है कि मेरी ख़ुशी दुसरे मेरे बारे में क्या सोचते हैं उस पर निर्भर करती है। ऐसा क्यों होता है?
वक्ता: और क्या हो सकता है? क्या तुम्हें और कुछ होने की भी उम्मीद है?

वक्ता: (प्रश्न पढ़ते हुए) जब हम दूसरों से अपनी तुलना करते हैं और दूसरों से प्रभावित भी हो जाते हैं, तो क्या यह हमेशा ग़लत है?
नो! जस्ट फ़िफ्टी-फ़िफ्टी। (नहीं! बस ५०-५०)
पहले तुम लोगों का रहता था कि नहीं बेकार की बातें हैं। कहते थे, कुछ बातें तो

वक्ता: पहले मैं तुमसे सवाल पूछूँगा: दूसरों के सामने अपने को सही सिद्ध करना ज़रूरी क्यों हैं?
श्रोता १: सर, अगर कोई कुछ गलत कह रहा है, तो बुरा लगता है।
वक्ता: बुरा क्यों लगता है?




पारस में अरु संत में, बड़ो अन्तरो जान। वो लोहा कंचन करे, ये कर दे आप समान।।~कबीर साहब प्रश्नकर्ता: जैसा कि आप कहते हैं, कि जितना जल्दी हो सके अपने को पूरा अर्पण कर दो, या ख़त्म कर दो, पर यदि इसे समझेंगे और करेंगे, तो अपने अपूर्ण स्थिति…

संघर्ष में हम सभी हैं; ज़िंदगी युद्ध तो है ही। दूसरे को क्या दिखाना चाहते हो? अपनी चोट, अपनी हार या अपना हौसला? अपना हौसला दिखाओ न दूसरे को!

प्रश्नकर्ता: जैसे मैं GATE की…
श्रोता १:…
वक्ता: क्या उम्मीद है?
श्रोता: सर,…
श्रोता १: सर, हम सही हैं, फिर भी गलत बन जाते हैं।
वक्ता: तुम…

दिल में जिसको बैठाना था उसकी जगह और बहुत कुछ बैठा लिया। अब सरकारी नौकरी का लालच बैठा हुआ है दिल में, क्यों? सब जानते हैं क्यों! गाड़ी मिल जाएगी, सरकारी बंगला मिल जाएगा, कोई निकाल नहीं सकता। कोई निकाल नहीं सकता बड़ा आनंद रहता है, अज़ीम-ओ-शान-शहंशाह। ग्यारह बजे जाओ,…

यह सब अय्याशियाँ होती हैं, “मन कर रहा है, मन नहीं कर रहा है, आज दिल तन्हा सा है, उदास सा है।“ यह क्या है? मन गया भाड़ में! इधर काम रखा हुआ है, जो ज़रूरी चीज़ है वह करेंगे न, मन का क्या है!
मनचलों के लिए दुनिया की…

मुक्तिका उपनिषद् है, उसमें राम ही कह रहे हैं, ‘एक उपनिषद् को कोई पढ़ ले वो तर जाएगा।‘ अच्छा एक में काम नहीं होता तो चलो जो १० या ११ प्रमुख उपनिषद् हैं उनको पढ़ लो! अच्छा उनसे भी काम नहीं होता तो लो मैं सूची दिए देता हूँ १०८…

सबसे पहले यह समझो कि दूसरे तुम में कमज़ोरी देख रहे हैं न, इसीलिए तुम पर चढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। अगर वह तुममे कमज़ोरी देखेंगे ही नहीं तो तुम पर चढ़ने की कोशिश भी नहीं करेंगे। बात यह नहीं है कि उसने जो भी कहा है वह सही…

समय तुम्हें इसलिए दिया गया है ताकि समय से आगे जा सको। शरीर तुम्हें इसलिए दिया गया है ताकि शरीर से आगे जा सको। शरीर इसलिए नहीं दिया गया है कि शरीर ही को बचाए पड़े हो, “और दो-सौ साल जिएँगे!” जाते-जाते अपना थोड़ा सा अंश छोड़ गए कि, “इसकी …

जिनके दिल नहीं टूटते उनके लिए जीवन में कोई प्रगति संभव नहीं है। जो अपनी असफलता को भी चुटकुला बनाए घूमते हैं, जिन्हें लाज ही नहीं आती, उनके लिए जीवन में कोई उन्नति, उत्थान संभव नहीं है।
इंसान ऐसा चाहिए जो लक्ष्य ऊँचा बनाए। और लक्ष्य फिर ना मिले तो…

जिस साल मेरा चयन हुआ था, पाँच लाख बैठे थे और सीट थी मुश्किल से, मेरे ख्याल से, ढाई-सौ, तीन-सौ। वो जो पूरी प्रक्रिया है वो बनी ही ऐसी है कि उसमें से हज़ार में से नौ-सौ-निन्यानवे लोग अचयनित ही निकलेंगे और यह बात तुमको पहले से पता होती है…

जितनी ज़िन्दगी जी चुके हैं ये देखा है कैसे पालक झपकते बीत गयी है? अभी स्कूल में थे, कॉलेज में थे, और अभी बच्चे थे आप, यूँ ही मैदान में, गलियों में दौड़-भाग रहे थे। अभी-अभी! ये जो समय बीता है ये कैसे बीता है? ये चुटकी बजाते बीता है।…

दुनिया के सामने इंसान की तरह खड़े होना सीखो भाई! केंचुए की तरह थोड़े ही कि किसी के भी पाँव के नीचे आ गए। इस चेहरे पर तेज होना चाहिए, आँखों में ताक़त झलकनी चाहिए, कुछ बोलो तो उसमें साहस और संकल्प हो, आवाज़ काँपे नहीं, थरथराए नहीं। एक ज़िंदगी…

जब तुम अपने-आप को बेरोज़गार कहना शुरू कर देते हो, आंतरिक पतन होने लगता है। और वैसे ही पतन होने लगता है उन गृहणियों का जिनके ऊपर अब गृहस्थी की कोई खास ज़िम्मेदारी नहीं है, फिर भी वह घर पर ही बैठी हुई हैं।
मैं समझ सकता हूँ आप काम…

अगर आप अपने लक्ष्यों में बार-बार असफलता पाते हैं तो इसकी वजह संकल्पशक्ति, विल पावर इत्यादि का अभाव नहीं है। इसकी वजह ये है कि आपके लक्ष्य हैं ही ग़लत। सही लक्ष्य तो प्रेम-प्रसंग की तरह होता है, वह पकड़ लेता है, आप उसे फिर छोड़ना भी चाहोगे वो आपको…

ना संसार से डरो, ना सरकार से डरो, ना डरो दुनिया के तानों से, ना डरो अधूरे अरमानों से, डरो तो बस ज़िंदगी के बर्बाद चले जाने से। घड़ी की टिक-टिक को अपना दोस्त बना लो, हर घण्टे-दो- घण्टे पूछा करो अपने-आप से, “अपने समय का जो मैं ऊँचे-से-ऊँचा, बढ़िया-से-बढ़िया…

जिसने तुमको चोट पहुँचाई उसने तुमको इसीलिए चोट पहुँचाई न कि तुम्हें वो चोट पहुँचाए और तुम आंतरिक रुप से आहत हो जाओ? तो दुश्मन को तुम्हारा करारा-से-करारा जवाब क्या हो सकता है? उसके उद्देश्य को पूरा मत होने दो।
वह सोच रहा था कि वो तुमको गाली दे देगा…

कल की सुबह अलग हो सकती है अगर आप आज की रात बदल डालें। आज की रात तो बदलने में कोई रुचि दिखा नहीं रहे, कल की सुबह यूँही अलग कैसे हो जाएगी भाई? कैसे?
बिलकुल एक नया भविष्य आ सकता है अगर तुम वो ना रह गए हो जो…

परीक्षाओं में सफल होने के, चयनित होने के किसके आसार ज़्यादा हैं, एक अशांत मन के या एक शांत परीक्षार्थी के? और शांति और स्पष्टता हमेशा साथ-साथ चलते हैं।
अगर जीवन में स्पष्टता होगी, तो फिर परीक्षाओं में भी चयन होने की संभावना बढ़ जाएगी।
यह लो, आध्यात्म का व्यवहारिक…

दुनिया के बाप रहो! ना सिर्फ़ तुम्हें चोट नहीं लगनी चाहिए बल्कि तुम में इतनी करुणा होनी चाहिए कि मारने वाले से भी पूछो, “हाथ तो नहीं टूट गया तेरा?”
पहली बात तो फ़ौलाद जैसा होना चाहिए तुमको कि कोई तुम्हें मार भी रहा है तो तुम्हें कुछ नहीं हो…

कुछ साल मिले हैं जगने के लिए, उसके बाद तो खूब सोना है। तो यह तुम कैसे आदत अभी पाले हुए हो कि, “ज़रा और सो लें एक घण्टा, दो घण्टा”?
भीतर एक चेतना होनी चाहिए, लगातार एक गूंज होनी चाहिए कि, “लंबे पाँव पसार कर के अनंत समय के…

सफलता ऐसे नहीं देखी जा सकती कि कौन कहाँ पहुँचा। सफलता ऐसे नापिए कि किसने कितनी चुनौतियों का सामना किया आगे बढ़ने के लिए। व्हाट आर द ऑड्स (चुनौतियाँ क्या थीं), बाधाएँ क्या थी? तुम जितना भी आगे बढ़े हो, उतना आगे बढ़ने के लिए तुमने कितना जीता है, कितना…

ज़िंदगी में पहले कुछ बन जाओ, कोई आंतरिक मक़ाम हासिल कर लो, फिर तुम्हें समझ में आएगा न कि रिश्ता किससे बनाना है। अब रिश्ता बना लिया छब्बीस की उम्र में ही, तुम्हारा लक्ष्य हो सकता है ज़िंदगी में ऊँचा उठना; जिससे तुमने रिश्ता बना लिया उसे ना उठने से…

ज़िन्दगी में पहले कुछ बन जाओ, कोई आंतरिक मक़ाम हासिल कर लो, फिर तुम्हें समझ में आएगा न कि रिश्ता किससे बनाना है। अब रिश्ता बना लिए छब्बीस की उमर में – तुम्हारा लक्ष्य हो सकता है जीवन में ऊपर उठना हो, जिससे तुमने रिश्ता बना लिया है उसे ना…

ज़िंदगी में इतनी बड़ी चुनौती अपनाकर तो देखो कि वो तोड़ ही डाले तुम्हें, और फिर पाओगे तुम कि टूटने के बाद भी बचे हो। कुछ है तुम्हारे भीतर जो ऐसा जुड़ा हुआ है कि टूटता नहीं। सबकुछ टूटने के बाद जो बचा रहता है वो असली है। उसका कुछ…

खाली समय मिला है तो क्या करना है? “चल न! मोहल्ला घूम कर आते हैं, बाज़ार देखकर आते हैं”, या कहीं नहीं जाना तो, “चल न, टीवी देखते हैं।“ ख़ुद को नहीं देखना है!
अपनी हालत क्या है, उससे बिलकुल बचकर रहना है। अपनी हालत का कुछ पता नहीं, टीवी…

अगर यही बात है कि काम चुनना है कि, “काम क्या करें?” वह काम चुनो जिसमें तुम सबसे कमज़ोर हो। लेकिन अगर ऐसा काम चुनोगो तो तनख्वाह भी कम मिलेगी तो अधिकांश लोग वह काम चुनते हैं जिसको बोलते हैं, ‘मेरी स्ट्रेंथ (शक्ति)।‘ जबकि आध्यात्मिक दृष्टि से देखो तो तुम्हें…

तुम वही हो न जो रात में टिकटॉक पर बैठते हो और दो घण्टे लगा देते हो सोने से पहले? ये तुम्हारे समय की कीमत है! तुम्हारे समय की कीमत होती, तो तुम सोशल मीडिया पर इतना समय कैसे लगा रहे होते? तुम्हारे समय की कीमत होती तो तुम अपने…

सागर पार करके लंका पहुँचने हेतु पुल बन रहा था। उसमें यह सब वानर, भालू सब लगे हुए थे, हनुमान तो थे ही, इंजीनियर थे नल-नील, यह सब। और वहाँ एक फुदकी गिलहरी, वो भी लगी हुई है साथ में पूँछ उठाए। वह क्या कर रही है? वह बालू के…

युवा होने का अर्थ होता है कि सुडौल शरीर हो, चौंड़ी छाती, मज़बूत कंधे और विराट ह्रदय। दुनिया की समझ, दुनिया की सारी क्रांतियाँ जवान लोगों ने करी हैं। और ‘क्रांति’ से मेरा मतलब पत्थरबाजी और हुल्लड़ नहीं है। क्रांति बहुत समझदार लोगों का काम होती है, क्रांति का मतलब…

आचार्य प्रशांत: सिर्फ़ इसलिए कि तुम्हें शरीर मिला है इंसान का तो तुम इंसान नहीं हो गए।
इंसान बस वो है जो चुनौतियों के सामने बिलकुल छाती खोल कर खड़ा हो जाए। कहे, “आओ!” जैसे सुबह हो गई हो, ऊर्जा आ गई हो शरीर में कि सामने चुनौती खड़ी हो…

जीवन परिवर्तन के लिए जिसको मैं कहता हूँ ठंडी उर्जा, शाश्वत उत्साह चाहिए। एक भीतर ऐसी हार्दिक प्रेरणा चाहिए जो दसों साल थमे नहीं, कमे नहीं, मिटे नहीं। गर्म जोश में वो बात होती ही नहीं है। गर्म जोश के खिलाफ़ तो सावधान रहा करिए, वो फ़िल्मी होता है।
“मैं…

एक ज़िंदगी है, दबे-दबे जीने में क्या मज़ा है भाई? तुम किस चीज़ को सुरक्षित कर रहे हो? जीवन माने समय ही तो होता है न? डरे-डरे समय बिता रहे हो, तो तुमने सुरक्षित किस चीज़ को रख लिया है? समय डर में बिता दिया तो तुमने बचा क्या लिया?…

आचार्य प्रशांत: हिंदुस्तान में जानते हो न दस-लाख लोग आवेदन भरते हैं और चयन होता है दो-सौ का। ऐसे ही चलता है न? कितना प्रतिशत हुआ ये? प्रश्नकर्ता: एक-प्रतिशत भी नहीं हुआ। आचार्य: कितना हुआ? तुम्हें अध्यात्म की नहीं, मैथ्स (गणित) की ज़रूरत है। ऐसे नहीं किसी भी काम में…

सही लक्ष्य की खातिर जियो। दिल में एक सही उद्वेश्य होना चाहिए। उसके बाद किसी पॉजिटिव थिंकिंग की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। ये चीज़ इतनी ज़बरदस्त मिल गई है, प्यार हो गया है इससे, अब मजबूर हैं इसके सामने। अब चाहें भी पीछे हटना तो हट नहीं सकते। जब ऐसा हो…

तुम्हारा बस काम क्या है? तुम बस कह दो कि, “तू मुझे अधिक-से-अधिक यह दिखा सकता है न हो कि मैं कितना गिरा हुआ हूँ, कितना गिरा हुआ हूँ, कितना गिरा हुआ हूँ मैं मान लूँगा। पर मैं काम करता रहूँगा, मैं जितना भी गिरा हुआ हूँ वहाँ से मैं…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं अनुशासित नहीं रह पाता और मेरे मन में कामुक विचार छाए रहते हैं। अभी आपने जो बताया कि उलझना ही ठीक नहीं, तो मुझे ये समझ नहीं आता कि अगर मैं इन कामुक विचारों से न उलझूँ, तो मुझे फिर मुक्ति कैसे मिलेगी?
आचार्य…