Sant Vani

Acharya Prashant

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Sant Vani

पारस में अरु संत में, बड़ो अन्तरो जान। वो लोहा कंचन करे, ये कर दे आप समान।। ~कबीर साहब प्रश्नकर्ता: जैसा कि आप कहते हैं, कि जितना जल्दी हो सके अपने को पूरा अर्पण कर दो, या ख़त्म कर दो, पर यदि इसे समझेंगे और करेंगे, तो अपने अपूर्ण स्थिति वाले मन से ही करेंगे; क्योंकि कदम उठाने के बाद भय लगने लगता है, और पुनः वापसी की स्थिति में भाग जाते हैं। समर्पण करते भी हैं तो इसी अपूर्ण मन से, तो भय लगता है और जो कदम उठाया भी होता है, उसे वापस खींच लेते हैं। आचार्य प्रशांत: कदम उठाने के बाद तुम वही नहीं रह जाते, जो तुम कदम उठाने से पहले थे। अपने बाहरी आकार, रूप, रंग पर न जाओ। तुम्हारा हर कदम तुम्हें बदल रहा है, वो बदलाव तुम्हें दिखाई नहीं देता आँखों से, पर तुम्हारा हर क़दम तुम्हें बदल रहा है। जितनी बार तुम उचित दिशा में क़दम उठाओगे, उतनी बार आगे की राह और आसान हो जाएगी। तुम्हारा एक-एक क़दम निर्धारित कर रहा है कि अगला क़दम आसान पड़ेगा या मुश्किल। केंद्र की ओर जो भी क़दम उठाओगे, वो अगले क़दम का पथ प्रशस्त करेगा। और केंद्र से विपरीत जो भी क़दम उठाओगे, वो केंद्र की ओर लौटना और मुश्किल बनाएगा।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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