सफलता की दौड़ में ही असफलता का भाव निहित है || आचार्य प्रशांत (2016)

प्रश्न:सर, द्वैत की जो संकल्पना है, उसमें अगर एक सिरे के प्रति तीव्रता ज़्यादा होगी तो दूसरा सिरे के होने की भी संभावना ज़्यादा होगी?
वक्ता:सवाल ये नहीं हैं कि, “संभावना क्या है? कितनी मिलेगी?”। द्वैत का जो तथ्य है, उसे समझिये।
सफ़लता कब चाहिए आपको?
श्रोता १:जब हम सफ़ल नहीं हैं।
वक्ता:जब आप सफ़ल नहीं हैं। जितनी गहराई से आप में असफ़लता का, सफ़लता की कमी का भाव होगा, जितना ज़्यादा आपको ये एहसास होगा कि अगर आपने पाया नहीं तो आप छोटे रह जायेंगे, उतनी ज़्यादा कशिश से आप सफ़लता के पीछे दौड़ते हैं। बस बात इतनी सी है।
सफ़लता की दौड़ में ही असफ़लता का भाव निहित है।
सवाल ये नहीं है कि, “दौड़ने से सफ़लता मिल भी तो सकती है?”। यहाँ पर बात कार्य-कारण की नहीं हो रही है। बात ये हो रही है कि “आप दौड़ ही क्यों रहे हैं?”, और ये प्रश्न आपके मूल्यों का नहीं है; ये प्रश्न दौड़ने के तथ्य का है — कि कोई कब दौड़ता है। आप कब दौड़ते हैं। आप किसी चीज़ का पीछा कब करते हैं।
