वक्ता: अगर अच्छे या बेकार का तुम पर कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा तो ज़्यादातर चीज़ें जो तुम परिणाम के लिए करते हो वो तुम करोगे नहीं। देखो, बदलाव टुकड़ों में नहीं होता। यह कहना बहुत आसान है कि मैं ऐसा हो जाऊँ कि मुझ पर दूसरों के कहे का फ़र्क न पड़े। दूसरे हँसे तो भी मैं वही करता रहूँ जो मैं कर रहा हूँ और दूसरे तारीफ़ करें तो भी मेरे करने में कोई अंतर न आए। लेकिन उसमें एक पेंच है वो यह है कि अगर दूसरे हँसे नहीं या दूसरे तारीफ़ न करें तो तुम वो ज़्यादातर काम करोगे ही नहीं जो तुम करते हो। समझो बात को। तुम कहते हो कि मैं कुछ करता हूँ और उस काम के अंत में मुझमें यह अंतर न पड़े कि लोग क्या कहेंगे। पर तुम पर अगर अंतर न पड़ता होता लोगों का कि क्या कहेंगे तो तुम ये काम करते ही नहीं। तो तुम जो मांग रहे हो, वो असंभव है। क्योंकि पूरी ज़िन्दगी तुम काम ही वही सब करते आए हो जो तुम्हें दूसरों से तारीफ़ दिलवाए, मान्यता दिलवाए, दूसरों से कुछ दिलवाए या दूसरों से तुम्हारी रक्षा करें। तुम्हारे सारे कामों का जो केंद्र है वो आत्म नहीं है, तुम्हारे सारे कामों का जो केंद्र है वो क्या है? वो संसार है। तो इतनी सी मांग करना कि मैं काम तो करूँ पर उस पर परिणामों का फल न पड़े। यह मांग असंभव मांग है। तुम्हें इससे बड़ी मांग करनी पड़ेगी। बड़ी मांग क्या है? छोटी मांग है कि मैं करूँ वही जो कर रहा हूँ पर जब परिणाम निकले तो मुझ पर कोई असर न पड़े। इससे बड़ी मांग करनी पड़ेगी। इससे बड़ी मांग क्या है? कि मैं वो करूँ ही न जो मैं कर रहा हूँ। पर जैसे ही यह मांग करोगे तो एक शर्त आएगी कि तुम जो हो वो तो वही करेगा जो वो कर रहा है। तो तुम अगर चाहते हो कि दूसरों के कहे का तुम पर कोई असर न पड़े तो तुम्हें अपने होने को ही बदलना पड़ेगा।