सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्। सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहता्॥
वह परम पुरुष समस्त इंद्रियों से रहित होने पर भी उनके (इंद्रियों के) विषय-गुणों को जानने वाला है। सबका स्वामी-नियंता और सबका बृहद् आश्रय है।
~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय ३, श्लोक १७)
आचार्य प्रशांत: वह परम पुरुष, वह शुद्ध-मुक्त चेतना इंद्रियों द्वारा लाए गए विकारों से और सूचनाओं से मुक्त है यद्यपि वह उनको ग्रहण करता है।
विकार क्या हैं?
चेतना में दो तरह से विकार आते हैं। पहला, शरीर की तरफ़ से। चेतना कहती है 'मैं शरीर हूँ', और शरीर सम्बंधित जितने भी भाव होते हैं, दोष होते हैं, गुण होते हैं वो चेतना के भी गुण-दोष भाव बन जाते हैं। शरीर छोटा होता है, चेतना कहने लग जाती है 'मैं छोटी हूँ'। शरीर दुर्बल होने लग जाता है, चेतना कहने लग जाती है 'मैं दुर्बल हूँ'। तो एक तो शरीर की तरफ़ से चेतना में विकार आते हैं।
दूसरा, चेतना में विकार आते हैं संसार की ओर से, माने इंद्रियों की ओर से। इन्द्रियाँ संसार को देखती हैं और चेतना में पहुँचाती हैं और चेतना सोख लेती है संसार की ओर से उसे जो भी संदेश मिल रहे हैं, दृश्य मिल रहे हैं, अनुभव मिल रहे हैं, प्रभाव मिल रहे हैं; चेतना उनको सोख लेती है।


